चंद्रशेखर आजाद की 111वीं जयंती

Posted by Alka Mishra
July 23, 2017

Self-Published

‘वन्दे मातरम ‘ के जय घोष के साथ अपने प्राणों की आहुति देने वाले साहसी एवं वीर सेनापति शहीद चंद्रशेखर आजाद को उनके जन्मदिन पर सत सत नमन है।

‘दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे,
आजाद ही हैं, आजाद ही रहेंगे’
इन दो पंक्तियों को ना ही चंद्रशेखर आजाद ने बोला है बल्कि इन्हें जिया भी है। आजादी का जुनून ऐसा था की उन्होने अपना नाम तक आजाद रख लिया था।

ब्राह्मण परिवार में जन्में चंद्रशेखर की मां चाहती थी की उनका बेटा बड़ा होकर संस्कृत का विद्वान बने पर शायद बेटे के सपने खुद से ज्यादा देश के लिए समर्पित थे। उनके दिल में आजादी की लपटे इतनी तेज थी कि अंग्रेज उनके नाम से भी खौफ खाया करते थे। 15 वर्ष की छोटी उम्र में पहली बार देश को आजादी दिलाने के लिए आजाद बापू के साथ उनके असहयोग आंदोलन से जुड़ गए । आंदोलन से जुड़े होने के कारण उन्हे गिरफ्तार भी किया गया और महज 15 साल के उम्र में ही जेल में उनपर कोड़े भी बरसाए गए । लेकिन क्रांतिकारी विचारों से लैस चंद्रशेखर को जब मजिस्ट्रेट के आगे पेश किया गया तो वहां उन्होने बहुत ही वीरता के साथ अपना नाम आजाद, पिता का नाम स्वतंत्र और पता जेल बताया। तब से वो चंद्रशेखर से चंद्रशेखर आजाद बुलाए जाने लगे।

असहयोग आंदोलन के बाद आजाद ने अहिंसा छोड़ उग्र हमले का रास्ता इख्तियार कर लिया, इसके बाद उन्होंने राम प्रसाद बिस्मिल के क्रांतिकारी संगठन ‘हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन के साथ मिलकर उन्होनेे नए तरिको से अंग्रेजो का मुकाबला शुरू किया।

उन्होंने सरकारी खजाने को लूटकर संगठन के क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए धन जुटाने शुरू कर दिए। उनका मानना था की इस धन पर भारतीयों का अधिकार है जिसे अंग्रेजों ने लूटा था। आजादी के लिए कभी जेल में गए तो कभी पहचान बदल ली और अंग्रेजो से लड़ते रहे । २७ फरवरी १९३१ को अंग्रेजों को आजाद के इलाहाबाद होने की सूचना मिली और उन्होने आजाद को चारो तरफ से घेर लिया, लेकिन तब भी आजाद बिना किसी डर व पछतावे के अग्रेजों से डट कर सामना किया लड़ाई के क्रम में आजाद गोलियों से पूरी तरह घायल हो गए थें तकरीबन आधे घंटे तक चली इस लड़ाई के बाद उनके पिस्तौल की आखिरी गोली चली , लेकिन वो सीना किसी अंग्रेज का नही था गोली खाने वाला वो सीना उस बहादूर देशभक्त का था जिन्होनें अपनी पूरी जिंदगी निस्वार्थ भारत मां को समर्पित कर दि । चंद्रशेखर आजाद इस धरती पर महज २४ बरस बिताए मगर उनके देश के प्रति प्रेम ने उन्हे अमर बना दिया ।

आज देश की आजादी , हमारी आजादी के लिए जान देने वाले चंद्रशेखर आजाद के जंमदिन शायद ही हमारे युवा पिढी को याद होगी लेकिन देश के लिए उनकी अतुलनिय है।

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