चलती जिंदगी , रुका सफर : Story Of 3rd Gender

Posted by Manipal Dahiya
July 18, 2017

“चलती जिंदगी , रुका सफर : Story of 3rd gender (” known but unknown ” peoples of our society )  


मुझे किसी काम से चंडीगढ़ जाना हुआ ।

सुबह लेट उठा तो ट्रेन से जाने का टाइम जा चुका था और बस भी भागते हुए बड़ी जद्दोजेहद के बाद पकड़ी। दिल्ली से निकली बस ने दिल्ली हरियाणा के बॉर्डर को पार करते हुए NH1 पर अपने सफर ली उड़ान भरी ।चूँकि ये दिल्ली से चंड़ीगढ़ का लम्बा सफर था तो ऐसे में बस बीच में एक 2 बार खाने पीने की दुकानों या ढाबो पर रुककर चलती है।

जैसे ही मुरथल, या “ढाबो का शहर ” के नाम से मशहूर जगह पहुंचे तो वहाँ लोगो ने रुकने की फ़रमाइश की । बस ड्राइवर ने अब कुरुक्षेत्र से पहले न रुकने की हिदायत देकर बस रोक ही दी ।जैसे ही बस वहाँ से चली तो बस में एक “किन्नर ” जिसे अंग्रजी में 3rd Gender कहते है वह बस में चढ़ा और अपने अनोखे अंदाज़ में हथेली बजा कर लोगो से पैसों के लिए मांग करने लगा ।
मेरे पास आया तो मैने भी जेब से 20 ₹ निकाल कर दे दिये मुझ से इस किन्नर जात को मना नहीं कर पाता। पैसे देकर मैं फिर से गाने सुनने में मस्त हो गया और किन्नर आगे बढ़ गया ।

थोड़ी देर बाद मुझे अपने हाथ पर कुछ महसूस हुआ कुछ पानी की बूँद गिरने जैसा।
किन्नर सीट के सहारे खड़ा है तो मैंने सोचा उसकी बोतल से पानी की बूँद गिरी है । लेकिन फिर से कुछ ऐसा-सा ही हुआ। अबकी बार सब कुछ मेरी आँखों के सामने हुआ । ये पानी की बूँद नही बल्कि किन्नर की आँख से गिरने वाले आँसू की बूँद थी यह।

मैंने अपने कानों से इयर फ़ोन हटा कर मामला जानने के कोशिश की तो पता चला की किन्नर आपने छुट्टे पैसों को नोट में बदलने के लिए बस कन्डक्टर को बोल रही है और कन्डक्टर भी ऐसा करने को तैयार लग रहा है और वहीँ पास ही में एक नोजवान युवक शायद काफी देर से बड़बड़ा रहा है ।

” पता नहीं कहाँ कहाँ से आ जाते है भीख मांगने और ऊपर से इनके खुले पैसें के “नोट ” भी हम ही बना कर दें । जाने भगवान ने ऐसे लोगो को क्यों बनाया ,इनको शर्म नही आती क्या ? “
और भी पता नही क्या- क्या अभद्र शब्द कह रहा था ।।

आम तौर पर ये किन्नर लोग तेज तर्रार होते हैं और किसी को जवाब देंने से नहीँ चुकते । लेकिन न जाने क्यों यह अपनों भावनाओं में बह रही है । किन्नर की आँखों में अब आँसू टपक टपक सुख चुके है और अब यह बोलना शुरू करती है।

” मैंने आपसे और किन्नरों की तरह पैसों के लिए जबरजस्ती तो नहीं की । फिर भी तुम ऐसा बोल रहे हो। मैं अभी बाकी किन्नरों की भांति बेइज्जत कर बददुआ तो नही दूँगी ,
वैसे भी तुम जैसे लोग इज्जत – बेइज़्ज़त होना कहाँ समझ पाएंगे ।
क्या पता तुम्हे हमारी क्या जिंदगी है ,
कभी मांग कर देखो किसी बस में ट्रेन या भरे बाजार में पैसे ।
कभी बिन बुलाए जाकर देखो किसी शादी में या जिसके घर बच्चा हुआ हो ,
कैसा महसूस होता है ?
कैेेसा लगता है जहाँ लोग किन्नरों को भी लोग घूर कर गन्दी नज़र से देखते है।
क्या बोल रहे थे की क्यों बना देता है भगवान ऐसे लोगो को। हम अपनी मर्जी से किन्नर तो नहीं बनी न।
न ही तुम अपनी मर्ज़ी से पुरुष ।
लेकिन आज भी मैं तुम जैसी छोटी सोच रखने वाले लोगो से खुद को ऊपर जरूर मानती हूँ ।

एक दिन जी कर देखो मेरी जिंदगी ।
भगवान ने न मर्द बनाया न औरत न तो कोई परिवार न रिश्तेे न नाते। पेट पालने के लिए दर-बदर भटकना पड़ता है। खाने का हिसाब होता है न ही पिने का। कैसे कैसे हालात में दिन काटना पड़ता है ।
पढ़ना चाहो तो भी नहीं पढ़ सकते । नौकरी के लिए कोई हमे रखने को तैयार नही।
।यहाँ तक लोग हम से बात करने में बेज्जती मेहसुस करते है।
दिल की बातें,शौक ,चाहतें सब अंदर ही दबा कर रखनी पड़ते है और तुम्हे लगता है मुझे शर्म नही आती ?
कभी कभी तो कैसे खुद से घिन आती है जब बाजार में 2-4 नही पूरा बाजार घूर रहा होता है और लोग फायदा तक उठाने की सोचते हैं और तुम्हे लगता है मुझे शर्म नही आती ?

कुछ पैसे मांगे ही तो थे छीने तो नहीँ न।क्या हम लोगों के नसीब में 2 वक़्त की रोटी भी नही ।
कहते कहते वो फिर से सुबकने लगती है और8
लड़खड़ाती आवाज में एक ही बात बोलती है

” हम लोगों की जिंदगी तो चल रही है लेकिन सफर जैसे थम सा गया है ।”

अब किन्नर ही नही न जाने बस में कितने लोग भावुक हो गए हैं और अबकी बार लोगों ने पैसे खुले नही बंदे नोट इक्कठे किये हैं ।

वक़्त मिले तो जरूर सोचिए
” जरुरी नही हर किसी को भीख दी जाये लेकिन इन
बदनसीब किन्नरों के लिए कुछ तो जरूर सोचना चाहिए । “

मणिपाल दहिया ” मन”
– MANIPAL DAHIYA “#MANN” 

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