चीन को हमारी जरुरत है

Posted by sonali suthar
July 18, 2017

Self-Published

चीन को हमारी जरुरत है

अभी कुछ दिनों से वापिस चीनी सामान के विरोध वाली पोस्ट्स पढने को मिल रही है और उन तमाम पोस्ट्स पर फिर वही कमेंट्स कि चीनी सामान का बहिष्कार किया जाना संभव नहीं है क्यूंकि हमारे मोबाइल , चार्जर , लैपटॉप , बैटरी सबकुछ चाइना से ही इम्पोर्टेड है और हमारी दैनिक जरुरत का हिस्सा है , वगेरह – वगेरह | मैं भी मानती हूँ कि आज की तारीख में पूर्ण बहिष्कार संभव नहीं है , लेकिन अगर वास्तव में पूर्ण बहिष्कार तक पहुंचना है तो आंशिक से ही शुरुआत करनी पड़ेगी क्योंकि ये हम सब को पता है कि जब तक कोई अपने पैरों पर खड़ा होकर कदम उठाना नहीं सीखता तब तक वो दौड़ भी नहीं सकता | अब जो लोग कहते हैं कि संभव नहीं उनके लिए एक छोटा सा उदाहरण देना चाहूंगी ,

मेरी 8 साल की छोटी बहन है प्रिंसी , उसको चाहे यूनिट टेस्ट में ही अच्छे नंबर आये हो गिफ्ट चाहिए होता है | तो ऐसे ही किसी यूनिट टेस्ट के बाद प्रिंसी अपने बड़े पापा यानि कि मेरे पापाजी के साथ जाती है अपने लिए गिफ्ट लेने , कोई 10-20 खिलौने देखने के बाद उसने एक पसंद किया | फिर अचानक से उसे पता नहीं क्या सूझी कि वो दुकानदार से पूछती है कि भैया ये चाइना का है क्या ? भैया ने कह दिया मेरे यहाँ तो सारे ही खिलौने चाइना के ही हैं | प्रिंसी ने बोल दिया कि बड़े पापा आप ऐसा करो मुझे ड्राइंग बुक और कलर्स दिला दीजिये क्योंकि मुझे चाइना का नहीं लेना | पापाजी के उससे कारण पूछने पर उसने बताया कि “ अरे बड़े पापा, ये जो चीन वाले हैं ना ये पाकिस्तान की मदद करते हैं और ये चीन और पाकिस्तान मिलकर हमारे देश के सैनिकों को मार देते हैं , इसलिए मुझे नहीं लेना चीन का सामान |”

एक 8 साल के बच्चे के लिए खिलौने क्या होते हैं ये हम सब समझते हैं | एक छोटी सी बच्ची अपने देश के लिए अपने खिलौने छोड़ सकती है , तो मैं और आप उससे तो ज्यादा ही समझदार हैं ना !! आज चीन हमें 1962 याद दिलाने की हिम्मत कर रहा है तो उसमें उससे ज्यादा दोष हमारा है क्योंकि सस्ते के चक्कर में हमने उसे एक आर्थिक शक्ति बना दिया है |

मुझे ना ही ज्यादा अर्थशास्त्र का ज्ञान है और ना ही राजनीति का लेकिन फिर भी जितनी मेरी समझ है उसके हिसाब से मैं किसी भी चाइना बहिष्कार की पोस्ट पर किये जाने वाले प्रश्नों का उत्तर देने की कोशिश कर रही हूँ | india-china-l

प्र. हम जो फ़ोन उपयोग में ले रहे हैं उसकी बैटरी , उसका चार्जर या फिर वो फ़ोन सिर्फ चीन में ही बनता है , तो उसका बहिष्कार कैसे संभव हैं ?

उ. पूर्ण बहिष्कार अभी संभव नहीं है ये मैं भी मानती हूँ लेकिन जहाँ पर विकल्प उपलब्ध है वहां पर तो भारतीय या फिर कोई और मित्र राष्ट्र की कंपनी से लिया जा ही सकता है और मुझे पता है कि अधिकतर मैन्युफैक्चरिंग चीन में ही होती है लेकिन एक फ़ोन जिसकी कंपनी चीन में ही रजिस्टर्ड है और एक फ़ोन जिसकी कंपनी भारत में रजिस्टर्ड है , इन दोनों में से हम भारत की कंपनी को चुनते हैं तो उसकी कमाई का बहुत कुछ हमारे देश को मिलेगा | अब इस पर ये तर्क भी दिया जाता है कमाई का हिस्सा तो चाइना की कंपनी भी देती ही है , जो लोग मारवाड़ी हैं उन्होंने तो सुना ही होगा कि “ पराया पूत कदेई न्याल कोणी करे ” तो इस पर इतना समझा जा सकता है कि अगर चीन की कंपनी से हमें थोड़ी सी कमाई हो भी रही है तो भी ज्यादा फायदा फिर भी चीन को ही होगा |

प्र. हम चीन का सामान नहीं लेंगे तो फिर चीन भी हमारा सामान नहीं लेगा या फिर हम सिर्फ अपने देश का ही लेंगे तो फिर ग्लोबलाइजेशन जैसे कांसेप्ट का क्या अर्थ रह जायेगा ?

उ. ग्लोबलाइजेशन का उद्देश्य था राष्ट्रों के बीच व्यापार को सुगम बनाना , ग्लोबलाइजेशन कहीं पर भी ये नहीं कहता कि तुम अपने देश का तो नुकसान कर दो और दुसरे देश का फायदा कर दो | ग्लोबलाइजेशन केवल मात्र व्यापारिक रिश्तों को बेहतर बनाने और जो वस्तु किसी भी तरह से एक देश में उपलब्ध नहीं है उसे वहां उपलब्ध करवाने के लिए है | अब अगर हम चीन और भारत के व्यापारिक रिश्तों की बात करें तो चीन भारत से अपने कुल आयात का मात्र 0.8% आयात करता है जो कि लगभग 16.4 बिलियन डॉलर है जबकि भारत चीन से अपने कुल आयात का 2.3% आयात करता है जो कि लगभग 58.4 बिलियन डॉलर है | तो अगर चीन हमसे नहीं लेगा तो थोड़ा नुकसान होगा लेकिन अगर हम चीन का बहिष्कार करते हैं तो उसे ही ज्यादा नुकसान होगा और जब हम चीन का बहिष्कार करेंगे तब हमें खुद ही बेहतर भारतीय विकल्प उपलब्ध हो जायेंगे |

प्र. अगर चीन से हमे इतना ही नुकसान है और हमे चीन का सामान नहीं लेना चाहिए तो सरकार कुछ क्यों नहीं करती ?

उ. मैंने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि मुझे राजनीति या अर्थशास्त्र का स्पष्ट ज्ञान नहीं है लेकिन अगर सरकार नहीं कर रही है तो संभव है कि सरकार की कुछ राजनीतिक मजबूरियाँ होंगी | सरकार को दोष देना बहुत आसान है , सरकार को तो कुछ करे तो भी दोष और ना करे तो भी , लेकिन मेरा व्यक्तिगत तौर पर ये मानना है कि जब तक हम कुछ नहीं करते तब तक हमें किसी को भी दोष देने का या किसी से सवाल करने का कोई अधिकार नहीं बनता | दूसरों के क्या दायित्व है या दुसरे को क्या करना चाहिए ये बताना बहुत आसान होता है लेकिन अपने दायित्वों का निर्वहन उतना ही मुश्किल |

आज के जो हालात हैं वो यही कहते हैं कि चीन को ये एहसास होना बहुत जरुरी है कि हम भारतीयों के लिए राष्ट्र और राष्ट्रधर्म सर्वोपरि है , हम किसी सस्ते सामान की कीमत हमारे देश की आबरू या उसके सैनिक से चुकाने को तैयार नहीं हैं | अभी कुछ दिन पहले जापान की एक घटना के बारे में पढ़ा था कि जापान के संतरे थोड़े कसैले से होते हैं , अमेरिका ने जापान को अमेरिकी संतरे बेचने का ऑफर दिया था जो कि स्वाद में जापान के संतरे की तुलना में काफी अच्छे होते हैं और जापान के संतरे से सस्ते भी , लेकिन जब जापान के बाजार में अमेरिकी संतरा आया तो उसके स्वाद और कीमत का जापान के लोगों की देशभक्ति के आगे कोई मोल नहीं रह गया था क्योंकि अमेरिका का एक भी संतरा नहीं बिका वहां पर ,वो लोग अभी भी अमेरिका के हमलों को अपनी ज़ेहन से निकाल नहीं पाए हैं |

आखिर में एक ही बात कहना चाहती हूँ कि मोदी जी ने कहा था कि अच्छे दिन आएंगे लेकिन हमारे अच्छे दिनों के लिए हम एकमात्र व्यक्ति या सरकार पर निर्भर नहीं रह सकते , सरकार की बेहतरीन से बेहतरीन योजनाओं का भी , अगर हम सहयोग नहीं करे तो कोई औचित्य नहीं रह जायेगा | एक ऐसा देश जहाँ देश के लिए जान तक न्यौछावर करने वालों की कमी नहीं रही है ,उस देश को सिर्फ और सिर्फ जनता का थोड़ा सा सहयोग चाहिए बाकि जिनको सिर्फ कुतर्क करने होते हैं उनके मानसिक दिवालियेपन का इलाज किसी भी डॉक्टर के पास मौजूद नहीं है |आज चीन को हमारी जरुरत है ,एक अनुभव के लिए , जिससे कि वो सीख सके कि देशभक्ति क्या है और वो किस देश के साथ उलझने की कोशिश कर रहा है|

 

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