क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण की लड़ाई लड़ रहा है बैंगलोर

Posted by Mridul Saxena
July 4, 2017

Self-Published

अंग्रेजी माशूका की तरह है और क्षेत्रीय भाषा माँ समान है |

बैंगलोर में रहते हुए करीब 2 साल हो चुके हैं अब मुझे, हाल ही में बैंगलोर मेट्रो में हिंदी भाषा के उपयोग पर काफी विरोध हुआ और वो अभी भी जारी है। हिंदी भाषा का मेट्रो स्टेशन, स्टेशन परिसर और मेट्रो के अंदर उपयोग होने से यहाँ के मूल निवासी यानि कन्नड़ लोगों में काफी रोष है। उनका कहना है कि सरकार द्वारा हिंदी भाषा को बैंगलोर में ज़बरदस्ती ‘थोपा’ जा रहा है। दलीलें काफी हैं कुछ वाजिब और बहुत सी वाहियात, लोगों के बीच फिर से एक मुद्दा है और ये रोष अपने प्रमुख मुद्दे से भटक कर उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय लोगों तक आ पहुँचा है |

असल मुद्दे की बात करें तो वो ये है कि कर्नाटका के लोग मेट्रो में हिंदी के प्रयोग को केंद्र सरकार की साज़िश समझ रहे हैं और ये एक प्रकार से उनकी भाषा यानी कन्नड़ भाषा के प्रचार प्रसार में एक बाधा स्वरुप है। देश में पुरानी परंपरा है, किसी भी मुद्दे का राजनीतिकरण करना और यहाँ भी असल मुद्दा कई और मतभेदों को जन्म दे रहा है।

एक उत्तर भारतीय होने पर भी मैं कन्नड़ लोगों के साथ खड़ा होना चाहता हूं, वजह मेरे उत्तर या दक्षिण भारतीय होना नहीं है, बल्कि अपनी भाषा के प्रति सम्मान है। भारत की विविधता ही उसकी पहचान है और इसमें धर्म, संप्रदाय, संस्कृति ही नहीं भाषा का भी उतना ही अहम महत्व है। देश की क्षेत्रीय भाषाओं के प्रति कुंठित नजरिया आज भाषाओं के अस्तित्व पर सवाल उठा रहा है। अंग्रेज़ी का प्रखर उपयोग और अपनी भाषा के साथ अंग्रेज़ी को मिलाना शायद भाषा के भविष्य को और भी धुंधला बना रहा है।

अंग्रेज़ी को हमने वैश्विक भाषा के तौर पर स्वीकारा है पर ये भाषा धीरे-धीरे हमें हमारी जड़ों से अलग कर रही है। यहाँ पर ये कहना मूर्खता होगी कि हमें अंग्रेजी का बहिष्कार करना चाहिये पर अंग्रेज़ी का दर्ज़ा हमेशा ही दूसरी भाषा का ही होना चाहिये। वीकिपीडिया के अनुसार 53% भारतीय हिंदी भाषा का प्रयोग करते हैं, पर असल में देखा जाये तो इनमें से ज़्यादातर लोग इसके बिगड़े हुए स्वरुप का प्रयोग कर रहे हैं। यही हाल देश में बोली जाने वाली अन्य भाषाओं का भी है, और यही कारण है कि कर्नाटका में अपनी भाषा के संरक्षण को ले कर लोग आज सड़कों पर उतरे हैं।

कुछ वर्षों पूर्व हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव जी से एक प्रश्न किया था कि हिंदी भाषा कि वर्त्तमान स्तिथि क्या है और भविष्य कितना उज्वल है? जवाब में उन्होंने चार शब्द बोले, “मर रही है भाषा ।” ये उस समय भी उतना ही सटीक जवाब था जो की आज की स्तिथि दर्शा रही है | आज लोगों ने अपनी सुविधा अनुरूप भाषा को तोडना मरोड़ना शुरू कर दिया है। एक वाक्य में अगर आठ शब्द हैं तो दो शब्दों की मिलावट को सामान्य बना दिया हैं | चिंता इस बात की है कि आज ये दो शब्द कल चार शब्दों में भी तब्दील होंगे। भाषा का शुद्ध रूप बोलने में बहुत से लोग शर्मिंदगी महसूस करते हैं, और शायद जो करते हैं वो उपहास का कारण बनते हैं।

वजह ये है कि यहां मज़ाक एक पुरानी भाषा के साथ हो रहा है, लोगों का रोष किसी व्यक्ति विशेष या स्थान विशेष के ख़िलाफ़ नहीं है | अपनी भाषा के प्रति प्रेम और सम्मान दर्ज करने का ये तरीका है। माना की और भी कई तरीके हो सकते हैं भाषा के उत्थान के मगर बिना किसी को आहत किये और बस बाहरी भाषा का विरोध कर के अगर ये अपनी क्षेत्रीय भाषा को जन लोकप्रिय बनाने का प्रयास करते हैं तो इसका विरोध करना बिलकुल भी उचित नहीं है। भारत की विविध भाषाएँ इसके असीम इतिहास का आइना है और इनके संरक्षण एवं प्रचार प्रसार से ही हम आने वाली पीढ़ियों को इस देश की सम्प्रभुता का एहसास करवा सकते हैं |

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