जेनोसाइड

Self-Published

इस इंटरव्यू में एक बड़ा कलाकार, बड़ा मंच और बड़ा पत्रकार, लेकिन 49.25 मिनिट पर अचानक से कोकरोज का जिक्र आता है और फिर जिस तरह कोकरोज का विश्लेषण किया जाता है की उस से नफरत क्यों की जाती है, इसी व्यख्यान के दौरान दर्शक ठहाके मार के हस रह होते है, व्यक्तिगत रूप से एक तरह से अंचभित करता है की यंहा कोकरोज का जिक्र आना जरूरी था ? लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी और एक तथ्य के कई कथन हो सकते है तो इस अंदाज से ये एक सामान्य सी बात होनी चाहिये.

लेकिन अगर जेनोसाइड के नियमो का अध्ययन करेगे तो एक तरह के समुदाय के प्रति समाज में इस तरह नफरत फैला दी जाती है की जब दंगे हो और जेनोसाइड की घटना को अंजाम दिया जाये तो ये नफरत एक आम इंसान के इंसानियत के जज्बात को उभरने ना दे और एक आम इंसान इस कत्लेआम में शरीक ना होकर भी इसे स्वीकार कर ले और इसके खिलाफ कभी कोई आवाज ना उठाये. रवांडा जेनोसाइड में पीड़ित वर्ग तुत्सी को कोकरोज के नाम से पुकारा जाता था.

इसी तरह अगर सागरिका घोष की नई किताब इंदिरा द मोस्ट पावरफुल प्राइम मिनिस्टर का ये इंटरव्यू देखे तो 17.00 से लेकर 21.00 मिनट के दरम्यान सागरिका घोष ये कहती है की 1980 के बाद श्रीमती इंदिरा गांधी का झुकाव हिंदू वोट बैंक की तरफ बहुत ज्यादा था एवं स्वयं श्रीमती गांधी हिंदू आस्था में बहुत ज्यादा यकीन रखने लगी थी, ये एक सामान्य सा कथन है एक आम नागरिक की तरह एक नेता भी अपनी निजी आस्था के प्रति समर्पित हो सकता है.

लेकिन अक्सर ब्लूस्टार में भिंडरावाले को ही दोषी बनाकर पेश किया जाता है इस संदर्भ में कभी भी श्रीमती इंदिरा गांधी और उनके बयानों का अध्ययन नही किया गया, यही हिंदू वोट बैंक जिसे सागरिका घोष अपने इंटरव्यू में बता रही है ये एक मुख्य कारण था सिख जेनोसाइड का, जंहा श्रीमती गांधी की हत्या के बाद हजारो की संख्या में निःथै सीखो को चुन चुन कर इस बर्बरता से मार गया था की सिख समुदाय की आने वाली पीडिया इसे डर के रूप में याद रखे.

जेनोसाइड अलग अलग समय पर अलग अलग जगह पर हुये है, और आज इसका विस्तार से अध्ययन किया गया है की आखिर ये किस तरह होते है और किस तरह इन्हे अंजाम दिया जाता है.

दूसरे विश्व युद्ध में यहूदी समुदाय का जेनोसाइड जिसे होलोकास्ट के नाम से भी जाना जाता हैं, इसके बाद पूरे विश्व में ये क़यास लगाने शुरू हो गये थे की ये जेनोसाइड आखिर होता किस तरह हैं, इससे बेहतर सवाल होगा की इसे अंजाम किस तरह दिया जाता हैं क्युकी ये क़ुदरती घटना नहीं हैं, ये मानव समाज का सच हैं जहाँ समय रहते दो समुदाय के बीच का तनाव, अति उग्र होता हैं और जेनोसाइड की घटना हकीकत में आती हैं. इसके आगे भी एक सवाल था की इसे कैसे रोका जाये लेकिन रोकने के लिये, पहले उन कारणों का अध्ययन जरूरी हैं जो जेनोसाइड की वजह हैं. इसी के पश्चात जानकारों ने सभी घटनाओं का अध्ययन करके ये निष्कर्ष निकाला की, जेनोसाइड यकायक नहीं होता, ये समाज के दो समुदाय मुख्यतः बहु स्ख्यंक समाज की तल्ख़ हैं जो अक्सर तनाव पैदा करती रहती हैं ये कभी कम होती हैं और कभी अति उग्र, ये कभी जमीन दोष होती हैं तो कभी सड़क पर अपना नंगा नाच दिखा रही होती हैं.

अध्ययन से पता चलता हैं की जेनोसाइड की घटना के ८ स्तर हो सकते हैं. मसलन जेनोसाइड एक ऐसी प्रक्रिया हैं जो आठ चरणों में विकसित होती हैं, जरूरी नहीं की जेनोसाइड की प्रत्येक घटना में ये ८ चरण सिरे बंद तरीके से लागू हो लेकिन प्रत्येक चरण में, ऐसे निवारक उपाय भी हैं जो जेनोसाइड की घटना को रोक भी सकते हैं जेनोसाइड की घटना में जरूरी नहीं हैं की ये सभी चरण चरण एक श्रेणीबंद रूप में हो, ये भी हो सकता हैं की २-३ चरण एक साथ में अपनी निशानदेही कर रहे हो. जानकारों ने इन सभी चरणों की हकीकत के साथ-साथ इनका नाम भी दिया हैं.

१. वर्गीकरण: ये जेनोसाइड का पहला चरण हैं जहाँ सभी तरह के समाज या देश में, नागरिक को जातीयता, जाति,धर्म या राष्ट्रीयता के जरिए लोगों को “हम और वह” कहकर या दर्शा कर मुख्य समाज से अलग / बाँट दिया जाता हैं. यहाँ, अक्सर बहुताय पक्ष “हम” की हामी में होता हैं और अल्प स्ख्यंक “वह” की और इस बटवारे को बहुताय पक्ष द्वारा ही लागू करने की कोशिश होती हैं. मसलन जर्मन और यहूदी , हुटु और तुत्सी रवांडा और बुरुंडी द्विपक्षीय समाज हैं जहाँ समाज में एक पक्ष बहुताय हैं और दूसरा अल्प मत में, इस तरह के समाज में सबसे ज्यादा नर संहार होने की संभावना बनी रहती हैं ये घटना इतनी बारीकी से होती हैं की समाज को पता भी नहीं चलता की इस तरह से समाज को बांटा जा रहा हैं. और इस तरह समाज को खंडित करने का क़यास पिछले कई साल या दशक से भी हो सकता हैं. यहाँ, इस चरण को समझकर और थोड़ी सी मुस्तैदी और भाई-चारे इसे यहाँ रोक दिया जाये, तो जेनोसाइड की घटना को बहुत हद तक रोका जा सकता हैं.

२. सांकेतिकता: ये जेनोसाइड का दूसरा चरण हैं,  यहाँ समाज को “हम” और “वह” शब्दों से परिभाषित करने के बाद, एक समुदाय की सांकेतिक पहचान की निशानी दी जाती हैं जिससे समुदाय की पहचान मुख्य वर्ग से हट कर की जा सके इसमें समुदाय को एक अलग नाम देना, उनके रंग या पोशाक, भाषा, इत्यादि सामाजिक निशान देही से इस तरह की पहचान को संभव किया जाता हैं. कई बार समुदाय की अलग से पहचान करने के लिये जबरन उनकी पोशाक में अलग तरह के चिन्ह का इस्तेमाल भी किया जा सकता हैं मसलन नाज़ी शासन द्वारा यहूदी समुदाय की पोशाक मेंपीले रंग के सितारा रूपी चिन्ह को अनिवार्य कर दिया था वही रवांडा में हुतू समाज की पहचान के लिये कार्ड दिये गये थे और वही अल्प स्ख्यंक समुदायतुत्सी को इन पहचान पत्र से दूर रखा गया था. अगर हम भारत देश की आजादी के बाद १९८४ और २००२ की जेनोसाइड की घटना का अध्ययन करे तो ८४ में सिख समाज अपनी पोशाक से समाज में अलग पहचान रखता ही था वही २००२ की घटना में मुस्लिम समाज की पोषक और खासकर भाषा ने इनकी अलग से पहचान करने में काफी मदद की थी. यहाँ, इस चरण तक हो सकता हैं की जेनोसाइड की घटना अपना उग्र रूप इख्तियार कर ले.

३. अमानुषिक: ये जेनोसाइड का तीसरा चरण हैं जहाँ एक समूह जो “हम” की हामी भरता हैं वह दूसरे समूह को जिसे “वह” कहकर मुख्य समाज से अलग कर दिया गया हैं, इस अल्प समाज के नागरिक को मानव या इंसान मानने से इनकार कर देता हैं. इस तरह इनकी तुलना जानवर, कीड़े या रोग / बीमारी की तरह की जा सकती हैं. रवांडा जेनोसाइड में पीड़ित वर्ग तुत्सी को एक कीड़े का नाम से पुकारना, इसी चरण का उदाहरण था. वही जर्मनी में नाज़ी सरकार द्वारा कई इस तरह के कानून को अपनाया गया जहाँ यहूदी समाज को मुख्यतः समाज से अलग-थलग कर दिया गया. मनो विज्ञान भी इस चरण को साबित करता हैं की एक आम मानव के लिये किसी दूसरे मानव की हत्या करना मानवीय और जज्बाती द्रष्टिकोण से संभव नहीं हैं, अगर फिर भी यहाँ कत्ल किया जाता हैं तो संभव हैं की कत्ल करने वाला नागरिक अति हताशा का शिकार हो जाये, लेकिन जब प्रचार और भाषण के द्वारा बहु स्ख्यंक समाज में इस धारण को प्रचलित किया जाता हैं की समाज का अल्प स्ख्यंक समुदाय मानव समुदाय श्रेणी में ही नहीं आता तो मनोविज्ञान का ये नियम एक तरह से खारिज कर दिया जाता हैं. समाज की यही नफरत मुख्यतः जेनोसाइड का कारण बनती हैं. मसलन १९८४ और २००२ के दंगो में एक समानता थी की दोनों जगह पर पीड़ित समुदाय के नागरिक को आग लगाकर जला कर मारने की घटना सबसे ज्यादा देखी गयी और पीड़ित समुदाय के नागरिको ने बाद में ये बयान भी दिये की यहाँ आग लगाकर जलाने के बाद, बहुताय समाज के नागरिक वहां जशन में नाच रहे थे. मनोविज्ञान की द्रष्टिकोण  से इस तरह के अमानवीय अपराध तभी संभव हो सकता हैं जब पीड़ित नागरिक को मानव / इंसान ही ना समझा जाये.

४. संगठन: जेनोसाइड का ये चोथा चरण हैं, बयान करता हैं की बिना किसी मजबूत संगठन की भागीदारी के इस तरह की जेनोसाइड घटना को अंजाम देना मुश्किल हैं. यहाँ संगठन, अपने लडाको को अक्सर युद्ध रणनीति के तहत ट्रेनिंग भी देता हैं और अक्सर जेनोसाइड में इस्तेमाल होने वाले हथियार भी इन्हें इसी संगठन द्वारा दिये जाते हैं. इस संगठन में आम तोर पर राज्य व्यवस्था की भागी दारी भी देखी जा सकती हैं जो नागरिक की रक्षा, अपने इस कर्तव्य निर्वाह से पीछे हट जाती हैं. मसलन रवांडा में तुत्सी जेनोसाइड में MNRD और Interahamwe संगठन की भागीदारी होना वही जर्मनी की होलोकास्ट के लियेनाज़ी सरकार. कुछ इसी तरह १९८४ पूरे उत्तर भारत में अंजाम दिये गये सिख विरोधी दंगो के लिये कांग्रेस पार्टी और २००२ के गुजरात दंगो में उस समय की मोदी राज्य सरकार पर आरोप लगाया जाता हैं की इनकी निशान देही पर ही इन दंगो को अंजाम दिया गया.

जेनोसाइड की इन तमाम घटनाओं में एक समानता और देखने में आ रही हैं की जहाँ-जहाँ भी इस तरह दो समुदाय की मौजूदगी में, अल्प समाज का जेनोसाइड किया गया, इन सभी जगह पर ज्यादातर देशों में लोकतंत्र स्थापित हैं और चुनाव द्वारा चुनी गयी सरकार ही व्यवस्था की देखभाल करती हैं, लेकिन इन्ही चुनी हुई सरकार पर जेनोसाइड को अंजाम देने के आरोप लगते रहते हैं, तो क्या चुनावी जीत भी जेनोसाइड का एक मक़सद हो सकती हैं. शायद हाँ.

जेनोसाइड के पहले ४ चरण, समाज में उस मानसिकता को जन्म देने के लिये काफी है जहाँ बहुसंख्यक समाज,अल्प मत के समाज के नागरिक को मानव या इंसान मानने से मना कर देता है और उनके खिलाफ एक विद्रोह के आगाज की हामी भर रहा है. यहाँ बहुसंख्यक समाज का बहुत बड़ा हिस्सा वास्तव में जेनोसाइड की प्रक्रिया में भाग नहीं लेता लेकिन वह भी इस तरह की कट्टर मानसिकता से वंचित नहीं है जिस के तहत वह जेनोसाइड की हो रही घटना के खिलाफ विरोध दर्ज करवाने से (एक तरह से) मना कर देता है. अब जेनोसाइड के आखिरी के चारचरण  जो वास्तव में जेनोसाइड की घटना को अंजाम देते है.

५. ध्रुवीकरण (Polarization): जेनोसाइड के इस चरण तक, समाज को दो भाग में बाँट दिया जाता है और समाज में किसी भी अप्रिय घटना मसलन रवांडा में तत्कालीन राष्ट्रपति का हवाई जहाज़ अकस्मात में मौत जिसकी जवाबदेही हुतू समाज तुत्सी समुदाय पर डालता है , नाजी सरकार द्वारा यहूदी समुदाय को प्लेग की बीमारी फैलाने वाले रेट से जोड़ना और तारीख ९ नवम्बर १९३८ को एक यहूदी नौजवान द्वारा एक नाजी सरकार के वरिष्ठ अधिकारी का कत्ल किये जाना जिसे नाइट ऑफ़ ब्रोकनग्लास के नाम से जाना जाता है, अगर हम १९८४ के सिख विरोधी दंगों पर ध्यान दे तो श्रीमती इंदिरा गाँधी की हत्या का होना और २००२ में गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के एक स्लीपर कोच को आग के हवाले करना, ये सब इस तरह की घटना थी जहाँ बहुसंख्यक समाज इस अपराध के लिये पूरे के पूरे अल्प समाज को जवाबदेह  बता रहा था. और इसके पश्चात, सभी तरह के प्रचार माध्यम रेडियो, टीवी, अखबार, इत्यादि  से समाज के एक समुदाय के खिलाफ नफरत का प्रचार किया जाता है, जहाँ हर तरह के शब्द का इस्तेमाल किया जाता है जिससे समाज के बहुस्ख्यंक समाज के नागरिक को अपने साथ जोड़ा जा सके. सारी घटनाओ के सारांश से ये भी यकीनन है की इस तरह की हर  जेनोसाइड की घटना में राज्य व्यवस्था किसी ना किसी तरह से चरमपंथियों से जुड़ी होती है या सहानुभूति रखती है. और इसी के कारण राज्य की कानून व्यवस्था, जेनोसाइड की घटना को रोकने से (एक तरह) मना कर देती है. मसलन, एक तरह से राज्य व्यवस्था बहुसंख्यक समाज के चरमपंथियों के अधिग्रहण हो जाती है और सबसे पहले बहुसंख्यक समाज के उन उदारवादी नागरिकों को जबरन केद या मार दिया जाता है, जो वास्तव में इस तरह के जेनोसाइड में शामिल ना होकर इसे रोकने का अधिकार और सोच रखते है. इस चरण में, समाज / देश की पूरी कानून व्यवस्था को अपंग कर दिया जाता है.

६. तैयारी (उपक्रम / Preparation): जेनोसाइड के इस चरण में, पीड़ित समाज के नागरिक को उनके जातीय या धार्मिक चिन्ह से पहचान की जाती है, जिससे इन्हे मुख्य समाज से अलग किया जा सके. सरकारी कागज़ या और किसी माध्यम से इनके रहने की सूची जारी की जाती है, मसलन जेनोसाइड के इस चरण में जिस समुदाय को घात लगा कर मारना है उनकी तमाम जानकारी इकट्ठा कर ली जाती है. रवांडा में तुत्सी समाज की पहचान बिना कार्ड के नागरिक के रूप में होती है और यहूदी समाज की पहचान, उनकी पोशाक में मौजूद पीले रंग के सितारे से की जाती है. इन दोनों घटनाओ से ये कहा जा सकता है की जेनोसाइड का चरण २ सांकेतिक पहचान इस चरण से जुड़ा हुआ है, मसलन जेनोसाइड की तैयारी पहले से ही शुरू कर दी जाती है बस समाज में किसी अप्रिय घटना का इंतजार किया जाता है. इसी तर्ज पर १९८४ के सिख विरोधी दंगों में, सरकारी कागज़ो से सीखो के घर की निशान देही की गयी और ऐसा भी कहा जाता है की इस निशान देही के चलते सीखो के घर / व्यवसाय इत्यादि जगह पर विशेष निशान / चिन्ह /रंग लगाये गये वही २००२ के गुजरात दंगों में मुस्लिम बस्ती का हिन्दू बस्ती से अलग होना, इस पहचान को और भी आसान बना देता था.

7. विनाश / संहार (Extermination): जेनोसाइड के इस चरण में, जनसंहार को अंजाम दिया जाता है, अल्प समुदाय के नागरिकों को समूह में कत्ल किया जाता है वास्तव में इस तरह के हत्याकांड को ही जेनोसाइड का नाम दिया जाता है.यहाँ हत्यारों के लिये विनाश है क्युकी ये वास्तव में यकीन नहीं करते की पीड़ित एक मानव / इंसान है. और जब ये राज्य व्यवस्था  द्वारा प्रायोजित किया जाता है तो अक्सर सशस्त्र बल चरमपंथियों के साथ इस हत्याकांड में साथ देते है. यहाँ, पीड़ित समुदाय की जान-माल के नुकसान के साथ-साथ हत्या को इस तरह अंजाम दिया जाता है की पीड़ित समाज दहल जाये और उसकी आने वाली पुश्तै इस जनसंहार को याद रखे इसी के अनुरूप औरतों पर बलात्कार, बच्चों का कत्ल, घर और व्यवसाय की जगह को तहस-नहस करना, इत्यादि निशान देही की जाती है ता की पीड़ित समुदाय भविष्य में इस इलाके को छोड़कर अपना कही और चला जाये. रवांडा में तुत्सी समुदाय का जेनोसाइड कुछ १०० दिन तक चला था जिसमे लाखों-लाखो की तादाद में तुत्सी समुदाय का कत्ल किया गया वही यहूदी समुदाय को व्यवस्थित ढंग से सुनियोजित तरीके से १९३९-४४ के दरम्यान गैस के चेम्बर में बंद करके, मेडिकल परीक्षण करके,इत्यादि तरीकों से जेनोसाइड को अंजाम दिया जिसमे एक अंदाज़ के मुताबिक १.५-२करोड़ लोगो की हत्या की गयी,१९८४ का सिख विरोधी दंगा कुछ ३ दिन तक बिना किसी रोक थाम के किया गया, यहाँ भी हजारों की संख्या में बेकसूर लोगो का कत्ल किया गया और यही कुछ हुआ साल २००२ के गुजरात दंगों में.

८. अस्वीकार (Denial): ये जेनोसाइड का आखिरी चरण है,जो हमेशा एक जनसंहार के बाद होता है और यह आगे के जनसंहार के निश्चित संकेतों में से एक है. जहाँ चरमपंथी किसी भी तरह के जेनोसाइड के अपराध को अस्वीकार करते है, वह कत्ल की गयी लाशों को जलाने के साथ-साथ उस हर सबूत को मिटाने की कोशिश करते है जहाँ से किसी भी तरह के जेनोसाइड के अपराध की पहचान ना की जा सके. मसलन जेनोसाइड के अपराध के बाद हो रही क़ानूनी प्रक्रिया में गवाह को धमकाना, ख़रीद फरोख़ की कोशिश, जांच की प्रक्रिया को किसी ना किसी तरह से बाधित करना, जब तक सत्ता में इनकी सरकार रहती है ये अमूमन कानून की पकड़ से दूर रहते है. रवांडा में तोयूनाइटेड नेशन भी यह मानने को तैयार नहीं था की यहाँ किसी भी तरह का जेनोसाइड हो रहा है इसी तरह से होलोकॉस्ट को भी अस्वीकार किया जाता है.

१९८४ के सिख विरोधी दंगों में आज तक किसी भी नामी व्यक्ति को सजा नहीं हुई, कानूनी प्रक्रिया चल रही है और यहाँ सिख  जेनोसाइड के ३२ साल के बाद भी पीड़ित परिवार न्याय की टकटकी लगा कर बैठे है, इनमें से कुछ अब नहीं रहे होगें और बाकी जो बच गये है उनके लिये न्याय की उम्मीद बेईमानी सी हो गयी होगी और कुछ यही हाल २००२ के दंगों का है. यहाँ, पूरे विश्व में जहाँ-जहाँ जेनोसाइड हुये, उस राज्य ने या बहुताय समाज ने इसे जेनोसाइड मानने से इनकार कर दिया और किसी अप्रिय घटना के बाद हुये प्रतिकर्म के रूप में इसे परिभाषित किया जहाँ एक पूरा समुदाय ही अपराधी की श्रेणी में खड़ा कर दिया गया हो वहां आप किस तरह किसी व्यक्ति विशेष को सजा दे सकते है, लेकिन न्याय की अनदेखी, पीड़ित समुदाय को जहाँ और ज़ख्म दे रही है वही अपराधी व्यक्ति इसे अपनी जीत समझ रहा है. किसी अपराध पर क़ानूनी सजा का ना होना, यहाँ हकीक़त उस व्यवस्था को बयान कर रही है जहाँ भविष्य में इस तरह के जेनोसाइड को दोहराने की संभावना बढ़ जाती है.

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