डर के आगे जीत है का सामना मैंने तब किया जब एक आदमी को हस्तमैथुन करते हुए देख पूरे पब्लिक प

Posted by Gunwanti paraste
July 15, 2017

Self-Published

गुणवंती परस्ते

हाल ही में मुंबई में ईशा चिटनिस के साथ रेल्वे स्टेशन में जो घटना घटी, वो काफी शर्मनाक थी, ईशा की हिम्मत की और तकनीक का सही इस्तेमाल करके ईशा ने यह बात सबके सामने लायी. ईशा की हिम्मत की मैं तारीफ करना चाहूंगी, क्योंकि मैं खुद इस तरह की शर्मनाक छेड़खानी से गुजर चुकी हूं और मेरी तरह रोज लड़कियां इस तरह की छेड़खानी से गुजरती होंगी. पर लड़कियां कहीं न कहीं डर और बदनामी की वजह से खामोश रह जाती. गंदी और अश्लिल हरकतें करनेवालों को जिल्लत महसूस नहीं होती पर लड़कियों को ही बदनामी के डर से चुप रहना पड़ता है.

हस्तमैथुन क्या होता है यह बात जब मुझे पता भी नहीं थी तब इस दौर से मैं गुजर चुकी हूं. मैं गुणवंती परस्ते पुणे की रहनेवाली हूं, यह घटना मेरे साथ जब घटी तब मैं 17 साल की थी, तब मुझे इस बारे में ज्यादा पता नहीं था. मैं अपना कॉलेज खत्म करके घर वापस लौटने के लिए अपनी सहेलियों केसाथ बस स्टॉप से गुजर रही थी, तब मुझे अजीब सी हरकत का अहसास हुआ, एक शराबी आदमी अपनी पैंट की चेन खोलकर अपने प्राइवेट पार्ट को हिलाते हुए नजर आया, जब मैंने उस आदमी के चेहरे की तरफ देखा तो वो मुझे गंदे इशारे कर रहा था. यह छेड़खानी मेरी लिए बिल्कुल नई थी, मेरे अबोध मन को बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि कोई पुरूष इस तरह से भी गंदी हरकत कर सकता है. बस आने तक मैं अपनी सहेलियों के बीच काफी चुप और डरी सहमी थी. बस में बैठने के बाद किसी भी तरह से घर पहुंचने की मुझे जल्दी थी.

घर पहुंचने के बाद मुझे याद नहीं कि मैं कब सो गई और उस दिन डर की वजह से खाना भी नहीं खाया था. तीन दिन तक मुझे 102 डिग्री बुखार था. मेरे घरवाले मेरी तबीयत को लेकर काफी परेशान थे कि अचानक मेरी तबीयत इतनी क्यों बिगड़ गई. डॉक्टर को भी समझ नहीं आ रहा था कि बुखार उतरने का नाम क्यों नहीं ले रहा है. मेरी करीबी सहेली को पता नहीं उस वक्त कैसे भनक पड़ गई कि शायद मैं किसी बात से काफी डरी हुई हूं. तब उसने मुझसे पूछा कि क्या बात है गुणवंती, तुम क्या किसी बात  से परेशान हो क्या? तुम मुझे अपनी सहेली मानती हो तो अपनी परेशानी मुझे बेझिझक बता दो. मैंने उस दिन घटना उसे बता दी, उसने मुझे समझाया कि तुम उस हादसे को भूल जाओ और इस तरह की छेड़खानी से डरने के बजाय ऐसे पुरूषों को कड़ा जवाब देने की हिम्मत रखो. तब जाकर मुझमें काफी हिम्मत आयी.

इस घटना को गुजर कुछ ही दिन गुजरे थे कि हस्तमैथुन करके अश्लिल हरकतें करनी वाली घटनाएं मेरे साथ दो से तीन बार वापस घटी. उस वक्त मुझे इस बात की समझ हो गई थी कि इस बात को कैसे नजरअंदाज करना है, जबकि मैं इस छेड़खानी को नजर अंदाज करके खुद को अंदर अंदर से कोस रही थी कि क्या मुझमें हिम्मत नहीं है कि मैं पलट कर छेड़खानी करनेवाले पुरूषों को जवाब दे सकी. छेड़खानी की घटना से इतनी परेशान हो चुकी थी कि एक दिन वापस घर लौटते समय जब में पुणे के डेक्कन में बस स्टैंड में बस की राह देख रही थी. एक खाली बस के अंदर एक आदमी एक अकेला बैठा हुआ, मेरी तरफ घूर रहा था और जोर जोर से अपना हाथ हिला रहा था. मैं वहां से हटकर दूसरी जगह जाकर खड़ी हो गई तो वो आदमी दूसरी बस में आकर सामने खड़ा होकर हस्तमैथुन करने लगा. तब मेरे सब्र का बांध टूट गया और मैंने मेरे पैर से सैंडल निकालकर उसके प्राइवेट पार्ट पर फेंककर दे मारी और पब्लिक प्लेस में होने का फायदा उठाते हुए जोर जोर से उस व्यकित् को गाली गलौज करने लगी और चिल्लाने लगी. जिससे डरके वो वहां से भागने लगा, तभी वहां खड़े लोगों ने मेरा चिल्लाना सुना और मेरी तरफ मदद के लिए तो मैंने उस भागते हुए आदमी की तरफ इशारा किया कि वो हस्तमैथुन करके मेरे तरफ देखते हुए अश्लिल हरकतें कर रहा था. पब्लिक ने उसको भाग कर पकड़ना चाहा तब तक वो वहां से भाग चुका था. लेकिन उस दिन से मैंने छेड़खानी करनेवाले हर पुरूष को जवाब देना और विद्रोह करना सीख लिया था. मेरे अंदर एक नया आत्मविश्वास पैदा हुआ कि डर के जीनेवाले हमेशा घुट घुट कर जीते हैं और निडर होकर जीनेवाले हर मुश्किल का सामना कर जाते हैं.

 

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