काश इस दुनिया को डार्क इज़ डिवाइन आन्दोलन की ज़रूरत नहीं होती

Posted by Shashankraj Singh in Body Image, Hindi, Society
July 4, 2017

लंगड़ा, कल्लू, नाटा, भैंगा, हकला, पतला, मोटा- ये सब हम बचपन से ही सुनते आए हैं और सुनते जा रहे हैं। हर रोज़ हम अनेक बार, सहर्ष इसको अपने व्यवहार और भाषा में अपना लेते हैं वो भी बिना सोचे कि कितना सही है ऐसा सुनना और कहना। सालों से टेलीविज़न पर किसी कॉमेडी शो में लोगों को हंसते देखते हैं और हंसी का विषय किसी व्यक्ति की शारीरिक बनावट, उसकी बोली, उसका धर्म, उसका उच्चारण या उसका रंग होता है। लोगों को इसमें कुछ गलत भी नज़र नहीं आता और इन सभी बातों को आत्मसात कर लिया जाता है। इन्हें जीवन का एक ऐसा हिस्सा मान लिया गया है जिनके बिना शायद हंसी हो ही नहीं सकती। जब रंगों की बात आती है तो हंसी का ये दायरा शायद और व्यापक हो जाता है। हम क्यूं भूल जाते हैं कि महात्मा गांधी से लेकर मार्टिन लूथर तक की लड़ाई रंगभेद से थी, किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह या पक्षपातपूर्ण रवैये को आप हास्य का नाम नहीं दे सकते।

पता नहीं क्यों पर इस विषय पर कभी इस तरीके से नहीं सोचा जैसे आज के वर्तमान परिदृश्य ने सोचने पर मजबूर किया है। मसलन तनिष्ठा चटर्जी के रंग को लेकर उनके मज़ाक उड़ाए जाने का मसला हो या टेलीविज़न पर गोरे होने वाले सौंदर्य प्रसाधनों या फिर शादी के विज्ञापन में गोरी बहु की प्राथमिकता हो। इसके अलावा भी बहुत से मामले हैं, जैसे आपके रंग के कारण आपको किसी विशेष राजनीतिक पार्टी से जोड़ देना हो या अंग्रेजी में बात न करने के कारण मज़ाक उड़ाया जाना हो वगैरह। हम सबके मज़ाक का स्तर शरू से ही ऐसा था पर शायद लगा कि 21वीं सदी में कुछ बदलाव होगा। ऐसा नहीं है कि इस विषय को लेकर मैं भी शुरू से ही संवेदनशील था, मैंने भी लोगों के नाम के आगे कई नकारात्मक विशेषण लगाकर पुकारा या संबोधित किया है। पर शायद ऐसा मैंने विरोध में ही किया था, शायद उनके गलत व्यवहार की प्रतिक्रिया में जो कि गलत था।

रंगों की समझ जो बचपन में सिखाई और बतलाई गई वही जीवन में एक बिना परखी समझ बन गयी। कितना अजीब है ना कि कोई अपने आप से घृणा करने लगे, खुद को लोगों से कमतर आंके। ऐसा वातावरण किसी व्यक्ति के लिए बन जाना या उसको बढ़ाने में हमेशा सहयोग देना एक मनोरोगी समाज का उदाहरण है। सच मानिए पर किसी को भी अलग-अलग अनचाहे विशेषणों से पुकारा जाना कहीं से भी अच्छा नहीं लगता, चाहे वह मज़ाक में हो या प्यार में। सुंदरता को तुच्छ सामाजिक सोच के धागे से बांधना और उस बंधन को मज़ाक का नाम दे देना ना केवल आपकी सुंदरता की समझ को बल्कि आपकी मानवता की समझ को भी शून्य दर्शाता है।

शारीरिक रंग के प्रति पक्षपातपूर्ण व्यवहार सिर्फ सुंदरता की समझ तक सीमित नहीं है बल्कि इसका फैलाव वर्ग असमानता तक है। जीवन का बढ़ना खुद को समझने की प्रक्रिया है पर ऐसा सामाजिक माहौल पैदा करना जो किसी के अंदर कमतर होने का एहसास पैदा कर दे, उसके स्वतंत्र रूप से विकसित होने की प्रक्रिया पर विराम लगाता है। इस प्रक्रिया में आप खुद को समझते है और दूसरों में भी खुद को देखते हैं। ऐसी अतार्किक सोच को तब और बल मिलता है जब इन विषयों को किसी प्रसिद्ध व्यक्ति द्वारा उछाला जाए या उस पर हंसा जाए।

इस सन्दर्भ में डोनाल्ड ट्रम्प का उदाहरण एकदम उपयुक्त होगा जब उन्होंने सार्वजनिक मंच से किसी दिव्यांग पत्रकार की नक़ल की थी। उसके जवाब में हॉलीवुड अभिनेत्री मेरिल स्ट्रीप ने अपने बेहद संवेदनशील भाषण में यह कहा- “दूसरे को अपमानित करने की इच्छा जब सार्वजनिक जीवन के किसी नामी व्यक्ति के माध्यम से व्यक्त होती है तो वह हर किसी की ज़िंदगी में चली जाती है। क्योंकि यह सबको ऐसा करने की इजाज़त या छूट देता है। अपमान का जवाब अपमान से मिलता है, हिंसा- हिंसा को जन्म देती है। जब ताकतवर लोग अपनी जगह का इस्तेमाल दूसरों पर धौंस जमाने के लिए करते हैं तो हम सबकी हार होती है।”

मेरिल स्ट्रीप की इन बातों पर उन सभी कलाकारों को गौर करने की ज़रूरत है जिन्हे लोग चाहते हैं और उनकी बातों का अनुसरण करते हैं। यही अभिनय से जुड़ा उनका उनका सामाजिक दायित्व होगा। आज दुनिया भर में डार्क इज़ डिवाइन नाम के आंदोलनों ने जन्म लिया है, जिसका प्रयास रंगभेदी असमानता को हटाना है। लोगों को समझाना है कि ये सच है कि दुनिया रंग विहीन नहीं हो सकती। काश हमे पैदा होने के बाद ये बताया जाता कि हर रंग अपने आप में बहुत खूबसूरत है, कोई किसी से कम नहीं है, तो शायद दुनिया में डार्क इज डिवाइन नाम के आंदोलनों की ज़रूरत नहीं होती।

फोटो आभार: Dark Is Divine

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