नारीवाद और नारी

Posted by Abhishek Kumar Singh
July 22, 2017

Self-Published

BBC Hindi पर हाल में ही स्त्रीवाद पर एक लेख पढ़ा जिसमें लेखक या लेखिका (मैंने ध्यान नहीं दिया) ने आलोक धन्वा जी की कविताएं डाली थी।

बीबीसी पर यह सामान्य  बात है , स्त्रीवाद से जुड़ा कोई भी आलेख आता है तो ‘आलोक धन्वा ’जी की कविताएं बीच-बीच में चिपकाए जाती है  गोया कोई मसीहा हो।

आलोक जी का नाम  सुनते ही मुझे असीमा भट्ट जी के साथ उनका प्रसिद्ध दुर्व्यवहार​ याद आ जाता है।

एक ,23 साल की लड़की का जीवन ,

शातिर और घुटे हुए अपराधियों की तरह (खुद महाकवि 45 वर्ष के उस समय) ,बर्बाद करने वाले इस “कलमठग” की “स्त्रीस्वतंत्रता” के आख्यान गढ़ती , लफ्फाजियों को उद्धृत या शेयर करने वाले लोग “दोगलापन” शब्द की सीमा से भी नीचे गिर गए हैं।

वे” भागी हुई लड़कियां” लिख कर दुनिया को मुग्ध कर देते हैं। लेकिन अपने स्तर पर जब भागी हुई लड़की की कहानी झेलने की बात आती है, तो तुरंत उनके भीतर का सामंत जाग जाता है  और वे असीमा से पूछ बैठते हैं कि बताओ, तुम कितने मर्दों के साथ सोई।

विडंबना ही है , कि

किस तरह ‘स्त्रीवाद स्त्री विमर्श’ पर तमाम रचनाएं करने वाला, हिंदी साहित्य का यह दिग्गज खुद की ही पत्नी पर इतने लांछन लगाता रहा और अत्याचार करता रहा।
हालांकि यह प्रकरण काफी पुराना लेकिन यह तब तक प्रसंग में रहेगा जब तक उनकी स्त्रीवादी रचनाएं लोग कॉपी पेस्ट करते रहेंगे।

‘संवेदनशील’ कवि पति और उनके दोस्तों ने तो असीमा को इतना धमकाया कि वह कानूनी तलाक लेकर अपना गुजारा भत्ता भी नहीं ले सकी।

उसकी ज़िंदगी तबाह करने वाले स्वघोषित ‘मार्क्सवादी’ ‘संवेदनशील’ और‘स्त्री समर्थक‘ जब लंबे लंबे स्त्री आलेख लिखते हैं , तो स्याही भी खुद को कोसती होगी ।

असीमा कहती है ‘महान वह पुरुष होता है, जो किसी वेश्या को, उसकी गटर की ज़िंदगी से निकाल कर, उसे ‘पत्नी’ का सम्मान देता है।
ये वो लोग हैं, जो पत्नी को ‘वेश्या’ बनने के लिए मज़बूर करते हैं।’

आश्चर्य है कि जितने भी प्रगतिशील वामपंथ के मित्र हैं उन्हें धनवा के इस मानसिक बलात्कार में भी नैतिकता दिख रही थी ।

मुझे बड़ी हैरत होती है

जब मैं ,स्त्रीवादी होने का बिल्ला लगाए घूमते लोगों को, ऐसे पाखंडियों पर जबान पेट ( पैंट पढ़ सकते हैं) में डाल​ देखता​ हूं ।

फिर समझ में आता है , इन सब को, किसी न किसी सियासत से होने वाले फायदे में अपना हिस्सा भर चाहिए।

इसलिए नारीवाद का झंडा उठाए लोग समाधान नहीं सिर्फ समस्याओं की दुकान लगा कर बैठे हैं।

हालांकि आलोक धन्वा के बारे में तो यह निर्विवाद सत्य है कि यह  नारीवादी का टैग लगाकर स्त्री विमर्श करने वाले अन्य कई बुद्धिजीवियों की तरह झूठा और मक्कार है।

आलोक के पक्ष में जैसी जैसी धमकियां असीमा जी को , बड़े-बड़े प्रगतिशील धुरंधर सब जगह दे रहे थे , इससे धन्वा का दोष काफी तक स्पष्ट और सबके सामने आ गया था ।

वैसे भी स्त्रीवाद का टैग लगाकर घूमने वाले जितना सहज शोषण करते हैं ,औरतों का ,
किसी से छिपा नहीं।

स्त्रीवाद और वामपंथ” ने इस तरह का परसेप्शन बिल्डिंग किया है कि सामान्य पुरुषों का पक्ष कोई सुनता नहीं यह सुनना नहीं चाहता ।
इसे आप भले ही पूर्वाग्रह ग्रसित होकर नकार​ दें ।
पर यह अकाट्य सत्य है।

बड़े-बड़े  तीरंदाज़ ,प्रगतिशील वामपंथियों की, स्त्री-घृणा और  शोषण के किस्से ,जैसे-जैसे सोशल मीडिया की दराज़ों ,

से कब्र में दफ़्न, प्रेतों की तरह बाहर निकलत रहे हैं,
और इन में से हर एक  मुद्दे पर ‘स्त्रीवाद’ का झंडा उठाए हर जगह अपनी ललकार और गरज बेचने वालों की,

कायराना चुप्पी को देख कर एक चीज़ बिल्कुल साफ़ होती जा रही है अब।

इन सब को देख कभी कभी दिमाग में एक ही बात आती है,

“ बलात्कारियों नारीवादी या वामपंथी हो जाओ, बड़े बड़े प्रगतिशील बचाने आएंगे​।”

बुनियादी तौर पर आज हमें ‘स्त्रीवाद’ के नाम पर बेचा जा रहा यह रसायन, दरअसल स्त्रियों से कोई साबका रखता ही नहीं है,

और न ही उनकी परेशानियों या उनके हितों से इसका कोई लेना-देना है. यह सिर्फ़ और सिर्फ़ लेफ़्ट राजनीति का एक शातिर और बेईमान फंदा है,

जो औरतों लिए उतना ही बेहतर है जितना बेहतर बम विस्फ़ोट कर खून फैलाता ज़हरीला जिहाद  मुसलमानों के लिए है.।

लेकिन इतना ज़रूर है, कि आज की तारीख़ में स्त्रीवादी होने के लिए,‘ लेफ्टिस्ट’ होना ज़रूरी है क्यूँकि वैचारिक असंतुलन और भड़कावा इस विचारधारा के पनपने के लिए ज़रूरी स्पेशलाइज़ेशन है।

लेकिन अगर आप सच में स्त्री और पुरुष को बतौर इंसान बराबर मानते हैं,
बतौर इंसान बराबर मानते हैं, दोनों
के लिए बुनियादी इंसानी सम्मान, मौक़ों और सुरक्षा के लिए सोचते हैं,
तो इस न्यूनतम लैंगिक ईमानदारी के लिए ज़रूरी है
लेफ़्ट आपकी थूक में भी न बसता हो.

नोट: मैं ना स्त्रीवाद का समर्थक हूं, ना पुरुषवाद का क्योंकि मुझे यह दोनों पॉलिटिकल टूल्स लगती है जो इंसान की बराबरी को पनपने नहीं देते हैं।

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