नितीश कुमार ने कुछ गलत नहीं किया.

Posted by Deepak Bhaskar
July 28, 2017

Self-Published

किस बात के लिए इतना हंगामा किया जा रहा है. नितीश कुमार ने क्या गलत कर दिया है. नैतिकता, सामाजिक न्याय, ये सब की दुहाई किसलिए? कब से भारत की राजनीति में नैतिकता का संचार हो गया था. नितीश ने वही किया जो हम सब रोज करते हैं. जहाँ जिसने परमानेंट करने की उम्मीद दे दिया, हम सब उनके साथ, उन्ही को वोट देकर जीता भी देते हैं. कबसे हम नैतिक हो गए हैं? कब से हम सामाजिक न्याय के लड़ाका बन गए? अपनी नियुक्ति के लिए हम सबने सामजिक न्याय का सहारा लिया. किस अच्छे व्यक्ति को हमने छोड़ दिया. सामाजिक न्याय के नाम पर हमने सिर्फ अपना हित साधा है. क्या हमने अच्छे लोगों पर कभी SC/ST कमिसन का गलत इस्तेमाल नहीं किया?  क्या हमने कभी दहेज़ के कानून का गलत इस्तेमाल नहीं किया? यह किसने नहीं माना की व्यवस्था ब्राह्मणवादी है, पिछड़े, दलित, आदिवासी, औरतों का तिरस्कार इस समाज के DNA में है. लेकिन हमने कब यह प्रयास किया की “मेरा नहीं” हम सब का कल्याण हो. जब हम अपने भाई, बीवी, दोस्त, सम्बन्धी की नौकरी के लिए सामाजिक न्याय की तिलांजलि दे रहे थे, तब हमें ये ख्याल क्यूँ नहीं आया था की कोई हमारे ही समाज का व्यक्ति बिना किसी प्रोफेसर के जान पहचान वाला भी हो सकता है, वो सिर्फ इंटरव्यू देने भर की हिम्मत रखता होगा. जब हम अपने गॉडफादर के गोदी में बैठे थे तो अब नितीश को क्यूँ गाली दे रहे हैं. जब हम आज कुर्मी हो गए हैं, यादव हो गए हैं तो फिर सामाजिक न्याय कहाँ है? जब हमारा सिलेक्शन अनारक्षित वर्ग में तो हुआ इतना गौरवान्वित क्यूँ हो रहे थे हम? क्या हम भी यह मान चुके थे की आरक्षित वर्ग में जगह पाना गौरव की बात नहीं? टॉप करने पर हम क्यूँ चिल्ला रहे थे, क्या हम मान बैठे थे की जिसका रैंक कम है वो मेरिट में कम है? क्यूँ टीना डाबी पर गर्व कर रहे थे, की अहम् प्रूव कर रहे थे की देखो हम भी मेरिट वाले हैं? क्यूँ प्रूव कर रहे थे? तब हम संघ-संघ क्यूँ चिल्लाते रहते हैं.

संघ से दिक्कत है तो बनाइये अपना संघ, ऐसा संघ जिसमें सिद्धांत हो, समग्रता हो, अगर नहीं तो मान लीजिये कि वो संघ है और हम सब बिखरे हुए लोग. वहां अपनी विचारधारा के लिए लोग सर्वस्व त्याग देते हैं और हमको को शादी करनी है, गाड़ी खरीदनी है, चार बेडरूम का घर बुक करना है, क्लास-वन नौकरी करनी है, यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर बनना है. कभी हमने सोचा की जिस संघ के पास हम नौकरी मांगने जाते हैं उनके पास क्या है, वो न तो नौकरी करते हैं, न शादी, न बच्चे, न घर, न ही धन, एक प्रचारक अलग-अलग घर में जाकर खाते है, लोगों से मिलते हैं, उन्हें समझाते हैं, अपनी विचारधारा प्रेषित करते हैं. वो भी तो विश्विद्यालय में प्रोफ़ेसर बन सकते हैं लेकिन उन्हें इनसे लेना देना नहीं. संघ के पास ३००० के आस-पास फुल टाइम डेडिकेटेड सदस्य हैं और आपके पास? हमारी सामजिक न्याय की लड़ाई, हमारी अपनी नौकरी, नेतागिरी, संसद में पहुँचने का जरिया बन गया है. और उनका! इस राष्ट्र को, उनके हिसाब का राष्ट्र बनाना.

नितीश ने वही किया जो हम सब करते. हम इस देश के युवा हैं, आदर्श का नमूना है, और दहेज़ के बिना शादी नहीं, घुस के बिना ऑफिस का कोई काम नहीं, लड़की काली तो वो इंसान नहीं, अपनी समझ नहीं, टीवी देखकर ओपिनियन बना लेने वाले लोग, आर्मी में नौकरी नहीं करना क्यूंकि घुस नहीं मिलेगा, सफाई कर्मचारी इंसान नहीं गुलाम हैं, हम ऐसे युवा हैं. जिन्हें क्लास में नहीं गए बिना नंबर चाहिए, बिना पढ़े पास होना है, पापा के पैसे से नौकरी ले लेनी है. कब हमने कह दिया की, नहीं घुस नहीं देंगे चाहे किसानी क्यूँ नहीं करना पड़े. आज हम नितीश को नैतिकता का पाठ पढ़ा रहे हैं. हम वही युवा हैं जो ट्रेन में किसी की हत्या कर देते है, फेसबुक पोस्ट के नाम पर घर लूट लेते है, दंगे करते हैं, अल्लाह हु अकबर और जय श्री राम के उद्घोष के साथ क़त्ल करते हैं. हम वही युवा हैं जो किसी लड़की के “ना” कहने पर तेजाब फेंक देते हैं. नितीश ने किसी जनता को धोखा नहीं दिया. कब किसने यह सोचा जनता विचारधारा के लिए वोट नहीं करती, वो अपनी आम जिंदगी के संघर्ष को कम करने के लिए वोट करती है. कभी ऐसा हुआ था लो की ग गरीबी से, तिरस्कार से तंग आकर क्रिस्चियन,  जातिवाद और असृप्श्यता से तंग आकर मुसलमान बनने लगे थे, क्या वो धर्म बदल रहे थे, वो तो बस एक बेहतर जिंदगी की तलाश कर रहे थे. जिस जनता के नाम पर आंसू बहा रहे हैं, ऑफिसर बन कर आपने क्या उन्हें ऑफिस के सोफे पर बिठाया. क्या हमने उनके बच्चे जिस सरकारी स्कूल में पढ़ रहे थे, उसमें पढ़ाया. उसी के नाम पर हमें सब कुछ मिल गया, हम प्रोफ़ेसर बन गए, स्कूल में शिक्षक बन गए, ऑफिस में अधिकारी, डीएम, सीएम और पीएम बन गए और वो किसान से मजदूर, मजदूर से बंधुआ मजदूर, और फिर किसी डम्पर के नीचे या मकान बनाते वक्त गिर कर मर गए. तब हमने कहाँ रामिलिला मैदान भर दिया, कहाँ सरकारें गिरा दी?

जब हम तिरंगा लेकर रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाने के लिए नारे लगा रहे थे तब क्या हम् ये कसम खा चुके थे की हम भ्रष्टाचार नहीं करेंगे. उस मैदान में गए हममे से कितने लोगों ने बिना दहेज की शादी की, अपने ऑफिस के सोफे को गरीब, मैले-कुचैले, कीचड़ से लथपथ किसान-मजदूर के लिए उपलब्ध कराया, हममे से कितने लोगों ने घुस नहीं लिया. चार-पांच नाम गिनकर हम इस मुद्दों से निपटते रहे हैं. उन चार-पांच लोगों की बलि चढाते रहे हैं. हम वो युवा हैं जो सामाजिक न्याय तो छोडिये आधारभूत न्याय का सिद्धांत भी नहीं समझते. अगर समझते तो आज भारत के सरकारी स्कूल की ये हालत नहीं होती. शिक्षा मित्र बनकर शिक्षा को मिटा नहीं देते. पटना में जाकर प्रोटेस्ट कर हमने अपनी नौकरी पक्की करवा ली और फिर क्या पैदा किया, रूबी और गणेश. कब हमने ये समझा की सरकार हम है, कोई मोदी नहीं, कोई नितीश नहीं. नितीश भी हमारी तरह के एक युवा हैं. उन्होंने वही किया जो हम ख़ुशी ख़ुशी करते. मोदी से आपको नफरत भी तो क्या हुआ, क्या हमें चाय कप dustbin में नहीं फेंकना था? मोदी-मोदी चिल्ला देने वाले हम युवा ने, कब वो किया जो उन्होंने कहा.

कितनी बार कहा गया की किसी का फैन नहीं बनना है, लेकिन क्या हम रुके, क्या हमने सोचा….समझा. नहीं न! तो ठीक है. “फॅमिली-फर्स्ट” वाले युवा हैं हम, सामाज या सामाजिक न्याय या देश का ढोंग रचना बंद कीजिये, लालू-सोनिया-राजनाथ के परिवार को देखना बंद कीजिये.  चलिए अपनी नौकरी के लिए किसी गॉडफादर को ढूंढते हैं. नितीश जी को बहुत बधाई आपने हमारे जैसे युवा की सोच को जमीन पर उतारा.

दीपक भास्कर, लेखक दिल्ली विश्विद्यालय के दौलतराम कॉलेज में राजनीति विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं.

 

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.