पूर्वांचल के एक ख़ित्ते की दारुण गाथा!

Posted by Afaq Ahmad
July 1, 2017

Self-Published

पूर्वांचल के एक ख़ित्ते की दारुण गाथा:

ख़स्ताहाल गौरा चौकी और क़ुर्ब-ओ-जवार:

1992 के जिस गौरा चौकी को हमने क़रीब से देखा है वो आज का गौरा चौकी नहीं था!

जब मैं दस साल का भी नहीं रहा हूँगा…मुझे होश है कि गौरा में गड्ढों में सड़कें हुआ करती थीं—ये मेन रोड की बात कर रहा हूँ, गौरा से गाँवों को जोड़ने वाली सड़कों की तो बात ही छोड़ दीजिए…या तो गाँव के गाँव संपर्क मार्गों से विधिवत कटे हुए थे या इन सड़कों का निर्माण ऐसे होता था कि दो टू व्हीलर यानि मोटरसाइकिल वाले भी अगर किसी रोड से एक साथ गुज़रते तो सामने से आ रहा साइकिल वाला लुढ़ककर खेतों या गड्ढों की शोभा बढ़ा रहा होता!

…ना अब झाऊ-बगीयावा रहा ना ही भगेलू की विवादास्पद ज़मीन पर लगे पेड़ और गढ़ई…मकान ऐसे बेतरतीब ढंग से बनते चले गये कि सब गड्ड-मड्ड-सा लगने लगा है! मुझे वो दिन याद हैं जब बारिश होने पर इसी ‘भगेलू की गढ़ई’ में गिरई मछली फंसाने के लिए केंचुआ का चारा लगाकर कटिया लगती थी और बारिश में भगेलू से सरपट मसकनवां रोड के गड्ढे पानी से लबालब भर जाया करते थे! आज इस सड़क पर गड्ढे तो नहीं दिखते पर लोगों के दिलों में पैसे के फावड़े ने खुदाई कर गड्ढे बना लिये हैं जो हमें पिछली कई सदियों से भरते नज़र नहीं आ रहे! लोगों को कहते सुना है कि यही भगेलू की ‘डिस्प्यूटेड’ भूमि का मसला हल हो जाये तो गौरा चौकी चमक जाएगा…शायद सच ही तो कहते हैं ये लोग कि अभी जब कोर्ट से हल्की-फुल्की राहत मिलते ही कैसे 24 घण्टे के अंदर अधकचरे निर्माणाधीन आड़े-तिरछे मकान बने दिख गये थे और गौरा चौकी चमकती क्या ऊपर से बाज़ार की शोभा “कानी” लगने लगी है! भगेलू के इस भूमि की ऐसी मारा-मारी, ऐसी छीना-झपटी मची हुयी है कि लगता है इस पर खड़ा वही पुराना बगीचा ही बेहतर था और पानी से उफनती वो गढ़ई! …इसलिए कभी-कभी मन में आता है यहां कोई सामाजिक सेवा केंद्र ही खुल जाता या पार्क ही बन जाता या बस अड्डा ही हो जाता तो ज़मीन हड़पने की सारी लूत-लूट ही ख़त्म हो जाती और गौरा वास्तव में कुछ चमकती हुई भी दिखती!

झाऊ-बगिया में हम बहुत क्रिकेट खेले हैं-अब ये बाग़ पूरी तरह से सफ़ाचट है-यहां अब गन्ने के सीज़न में गन्ना तौलने-बिकने का कांटा ज़रूर लगता है। एक वक़्त था जब 2004 में बभनान चीनी मिल द्वारा बभनजोत ब्लॉक में खुले गन्ना तौल केंद्रों पर गन्ने की घटतौली और पैसे का समय पर भुगतान न होने को लेकर हमने बिगुल फूंका था पर जनता का अपेक्षित सहयोग न मिल पाने के कारण उस आंदोलन को ठंडे बस्ते में डालना पड़ा था…तबसे हमें लगता नहीं कि किसानों की इस समस्या को लेकर किसी स्थानीय या देसी-विदेशी नेता ने मिल पे कोई चढ़ाई की हो! ख़ैर!!

…गौरा का इकलौता सरकारी अस्पताल अब PHC से बगल के बुक्कनपुर में CHC में तब्दील हो गया है पर इससे होना-जाना कुछ नहीं है—एक अदद MBBS डॉक्टर और वो भी मुँह फुलाये हुये…एक एक्स-रे तक की मशीन नहीं है बुक्कनपुर के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर…अल्ट्रा-साउंड कराना हो या ब्लड चेक कराना हो तो बाहर लूटने वाले बैठे हैं…किसान-ग़रीब-मज़दूर के एक्स-रे, अल्ट्रा-साउंड, ख़ून के सैम्पल की जांच वग़ैरह को लेकर लूट का ऐसा गोरखधंधा चल रहा है कि मोटी रक़म ख़र्च कर मरीज़ ठीक हो भी जाए तो तीमारदार की जेब पर पड़ी डकैती के बाद वो ख़ुद बीमार हो जाता है! इंसान जाये तो जाये कहाँ—थोड़ा-सा सीरियस केस नज़र आया नहीं, सरकारी अस्पताल दिवालिया है ही…फ़ौरन मरीज़ को गोण्डा ज़िला अस्पताल के लिये रिफ़र कर दिया जाता है, अब मरीज़ रास्ते में ही दम ना तोड़ दे उसे गौरा चौकी के ‘इसी’ नवनिर्मित नर्सिंग होम में एडमिट करा दिया जाता है और फिर शुरू होता है लूट-खसोट का एक लंबा सिलसिला…

…गौरा से जितनी ही मोहब्बत है उतनी ही नफ़रत यहाँ की सड़कों के धूल-धक्कड़ से है…जनता का क्या वो तो झाड़ू लगाकर सारा कूड़ा-करकट, मल-मूत्र सड़क पर फेंक देती है…जनता-जनार्दन का ये कारनामा मेरे बचपन से ही चला आ रहा है, चूंकि पहले सड़क कंक्रीट की नहीं थी, कच्ची-पक्की सड़कों पर बारिश पड़ते ही कूड़ा-करकट आपस में समा जाते थे और धूल-धक्कड़ से राहत मिली रहती थी, अब पूरा का पूरा धूल, करकट, गंदगी सड़क पर पसरा रहता है और हवा इसे हमारी साँसों में घोल रही है…कहने को तो काग़ज़ पर स्वीपर-सफ़ाईवाला होगा; पर हमें दिखा कभी नहीं—इसका जवाब किसके पास है ये ना जनता को पता है और ना वो पता करना चाहती है—जनता तो चुनाव के समय बस अपने पसंदीदा उम्मीदवार को वोट डाल आती है—वही प्रत्याशी जो मुद्दत से ‘राजनीति खेता’ आया हो और इनका ख़ून चूसता आया हो…जनता को बदलाव नहीं चाहिए, बस अपना ख़ून चुसवाने वाला पिशाच नेता चाहिए!!!

बचपन में सड़क किनारे पानी की सप्लाई के लिए सीमेंटेड बम्बू ज़मीन के अंदर ठूंसे गये थे; पर शायद वो जबरन किया गया था या पैसा बनाने के लिए ठेके पर उठाया गया था क्योंकि अब तो ये बम्बू कबके भठ गये होंगे, ज़मीन के अंदर ही टूट-फूट गये होंगे…दरअसल मंशा ही नहीं थी कि गौरा में सड़क के किनारे नाले बनें और घरों से निकलने वाले, बारिश में सड़क के किनारे जमा होने वाला पानी इन नालों के रास्ते दूर जाकर गिराया जाए…अब तो ऐसा लगने लगा है कि गौरा विधानसभा का पूरा वजूद ही जुगाड़ पर टिका हो!

…कई बार रोडवेज़ बस चली—लखनऊ-कानपुर के लिए; ‘नेता’ को अपनी बस चलवानी थी…सो कई रोडवेज़ बसें चलनी बंद हो गईं और अब बची है वही एक खोंड़ारे-कानपुर वाली इकलौती रामभरोसे खटारा रोडवेज़ बस जिसमें खचाखच भरे यात्रियों के बीच यात्रा करना एक दुश्वार गुज़ार अमल है!

…और शायद ये गौरा के हर घर की कहानी है कि फलां लड़का कमाने लगा है-तुम कब कमाओगे, फलां लड़के ने अपना घर पक्का-चमकदार करा लिया है-तुम कब करोगे, फलां तुम्हारे साथ का पढ़ा लड़का मुंबई में है, गोवा में है, सऊदी-बहरीन में है, क़तर-कुवैत में है—‘पलस्तर’ में, ज़री-ज़रदोज़ी में, सोफा के काम में, AC के काम में वग़ैरह-वग़ैरह के काम में क़िला फ़तह कर लिया है—मोटी रक़म कमा रहा है…और इस “फलां” लड़के के बारे में अपने घर वालों से इसके चमत्कार का बार-बार नगाड़ा सुन-सुनकर जब “वो” पक जाता है तो उसी “फलां” लड़के का-सा बनने “वो” भी घर से फ़ुर्र हो जाता है…बाद में जब “वो” और “फलां” लड़का आपस में मिलते हैं तब पता चलता है कि घर पर रगड़-रगड़ कर सुनायी जाने वाली वो कहानी कितनी सच्ची थी…सब खोखला था—घर पर जो सुनाया गया वो सब ‘हाइपोथेटिकल’ था, मनगढ़ंत था…कोई मोटी कमाई ना कमा रहे “वो” और “फलां” लड़का, वो तो अपने ‘सेठ’ के हाथों रोज़ हलाल होता है, रोज़ मारा-गरियाया जाता है…घर पर कुछ बताता नहीं, अपने मन की पीड़ा और व्यथा को छिपा लेता है और इस तरह घर पर सुनायी जाने वाली ये कपोल-कल्पित कथाएं ‘सत्य’ बनी रहती हैं!

…इन कथाओं में से इक्का-दुक्का अपवाद निकल आएंगे जो आज प्लास्टर ऑफ़ पेरिस (पलस्तर), ज़री-ज़रदोज़ी, AC-फ़र्नीचर वग़ैरह में कड़ी मेहनत-मशक़्क़त कर अच्छे मुक़ाम पर हैं, पैसा भी ख़ूब कमा रखा है…मुटिया-चर्बिया भी गये हैं, पर आप अगर इनसे जाकर पूछेंगे तो ये शर्तिया पढ़ने-लिखने की ही नज़ीर देंगे और ये कहते हुए अपने बाल-बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाते हुए नज़र आ रहे हैं कि हम पढ़-लिख नहीं पाए, निरा-जाहिल रह गए—कम से कम हमारे बच्चे तो पढ़-लिख जाएं…क्योंकि इतना माल कमाने के बावजूद उन्हें पता है कि ‘पढ़ाई-लिखाई का महत्व’ क्या है?!

आख़िर कब तक माँ-बाप अपनी ग़रीबी और दरिद्रता से अभिशप्त होकर गौरा और क़ुर्ब-ओ-जवार में लड़कों की पढ़ाई बीच में छुड़वाकर उन्हें भारत के बड़े शहरों में भेजते रहेंगे…अगर ये सिलसिला नहीं रुका तो नेता आपके ऊपर राज करता रहेगा, आपसे लूटे पैसों से अपनी प्रॉपर्टी में इज़ाफ़ा करता रहेगा और वो ये नहीं चाहेगा कि नेता के बाल-बच्चों को छोड़कर किसी भी घर-परिवार का लड़का-लड़की बाहर कमाने नहीं बल्कि पढ़ने के लिए जाएं क्योंकि इनके शिक्षित होने से समाज में जागरूकता आयेगी और नेता का सियासी साम्राज्य ध्वस्त होगा!

आज गौरा और ग्रामीणांचल में भी स्कूल तो कुकुरमुत्ते की तरह उग आये हैं पर इसकी बुनियादी वजह कमाई है…जिससे शिक्षा का स्तर क्या बढ़ता—यहां पैसे देकर बीए/एमए की डिग्री ली जा सकती है, इससे स्टूडेंट्स का मिज़ाज नक़लची हो चला है और यहीं से वो सोशलिज़्म की बजाय मटेरिअलिज़्म का पाठ पढ़ता है क्योंकि उसे अपनी डिग्री पैसे से ख़रीदी हुयी मिल रही है!

गौरा में लड़कियों की डिग्रियां शादी-ब्याह कराने के लिए बटोरी जाती हैं…कि रिश्ते आने पर लड़की के साथ इन डिग्रियों की भी नुमाइश की जा सके, मुट्ठी भर लड़कियां होंगी जो बाहर निकलीं हैं और उन्होंने पढ़ने के लिए अपनी पढ़ाई जारी रखी है नाकि शादी करने के लिए!

…मैंने जब गहन मंथन किया तो पाया कि गौरा का ग़रीब-मज़दूर-किसान जब तक मज़बूत नहीं होगा वो ना चाहकर भी अपने बच्चों की पढ़ाई बीच में छुड़वाता रहेगा क्योंकि क्षेत्र के फ़र्ज़ी सेठों से इन्हें कोई मदद मिलनी नहीं है, सेठ का लड़का ख़ुद अपने बाप के माल की बढ़ोत्तरी में हाथ बँटाता है तो वो सेठ क्यों चाहेगा कि जब उसका बच्चा उसका धंधा और माल बढ़ाने के लिए उसके साथ दिन-रात लगकर सतत प्रयत्नशील है तो इस ग़रीब का बच्चा क्यों पढ़े-लिखे…बस! इतनी सी है ये कहानी!…इसलिए क्षेत्र से जब तब ग़रीबी और दरिद्रता दूर नहीं होगी कोई भी शैक्षिक या राजनैतिक क्रांति आप भूल ही जाइये…

…गौरा के बगल गौरा गाँव, राघवपुर, बुक्कनपुर, हथियागढ़, केशवनगर ग्रंट, कूकनगर ग्रंट, फ़रेंदा, पिपरा अदाई, भावपुर, ग़ाज़ीपुर, कोल्हई ग़रीब उर्फ़ ग़ोर्रा, बढ़यां, भानपुर, बनगवां, भिखारीपट्टी, अपनाजोत, पिपरा माहिम…सब अपनी बदहाली पर आँसू बहा रहे हैं! 2004 से युवक काँग्रेस से जुड़कर मैंने इन क्षेत्रों के अनगिनत मुद्दे उठाए, सैंकड़ों ज्ञापन दिए, ब्लॉक, चौकी, थाने पर ग़रीब-बेसहारा-मजबूर-मज़लूम किसानों को भटकते-रिरियाते-गिड़गिड़ाते देखा और ये भी देखा कि इनकी आँखों के आँसू पोंछने वाला कोई नेता नहीं है…सब के सब वोटों के भिखारी और अपनी अर्थतंत्र की जड़ों को मज़बूत करने वाले महाभ्रष्ट डकैत हैं…ये नेता नहीं लुटेरे हैं और यहां की जनता इन ज़ालिम-मक्कार नेताओं की ग़ुलाम है जो आज़ादी से ही ग़ुलामी की बेड़ियों में अब तक जकड़ी हुई है क्योंकि हर नेता का अपना पर्सनल वोट फ़िक्स है…ऐसा लग रहा कि यहां मैच-फ़िक्सिंग का खेल चल रहा हो और जनता तमाशबीन बनी सब देख रही है! नेता ने अपनी तिजोरी भर ली है, नेता के पास गाड़ियों का रैला है, नेता काली कमाई करके चुनाव लड़ने आता है, नेता हर बार, बार-बार अपने दलाल वोटों के सौदागरों पर पैसा लुटाता है…फिर भी उसकी चमक फीकी नहीं पड़ती है, क्यों?…क्योंकि जनता के टैक्स का पैसा, लगान का पैसा, सूद का पैसा, ब्याज़ का पैसा सब नेता की तिजोरी में जाता है!

…301-गौरा विधानसभा से चुनाव मुझे भी लड़ना था, काँग्रेस ने टिकट दिया नहीं, मैं चुनाव के दौरान क्षेत्र में आया ही नहीं—ये मेरी ग़लती है, पर रगड़ते-रगड़ते थकना पड़ता है…कांग्रेस मुझे टिकट दे देती तो मैं नेता ना बन जाता…चार हेलीकॉप्टर उतरे, राहुल गाँधी, राज बब्बर, ग़ुलाम नबी आज़ाद…काँग्रेस के सारे धुरंधर इसी विधानसभा पर पिल पड़े, कौन नहीं आया मसकनवां और गिन्नी नगर में; पर वोट कितना मिला 2700/-…ज़मानत नहीं बची है, आख़िर आप किस मुग़ालते में जी रहे हैं, जब टिकट के बंटवारे में बंदरबांट है तो एक राष्ट्रीय पार्टी की लुटिया तो डूबेगी ही—अगर यही हाल रहा तो यूपी में कांग्रेस को रसातल में जाने से कोई रोक नहीं सकता!

…हम हिम्मत नहीं हारेंगे, लोग कहते हैं कि मेरे सारे दोस्तों की शादी हो गई, सब कमा-धमा रहे हैं, सबके पास बैंक-बैलेंस है और मैं वहीं का वहीं खड़ा हूँ, शायद मेरी आत्मा ने गवाही नहीं दिया अब तक, मैं परिवार से ज़्यादा समाज को वक़्त दे बैठा…आज भी स्टूडेंट बना बैठा हूँ…पर एक “संतुष्टि” है मन में कि कितने मेरे सहपाठी ये स्वांग रचते हैं कि एक अदद शर्मीला, इंट्रोवर्ट लड़का नेता कैसे बनने निकला…तो वो मेरे चड्डी मित्र जान लें कि यही मेरे ख़ून में है कि मैं ख़ुद से ज़्यादा समाज और अवाम के लिए फ़िक्रमंद रहता हूँ और रहूँगा इंशा अल्लाह!

गौरा विधानसभा में एक इस्पात का कारख़ाना लग सकता था-उस वक़्त के केंद्रीय इस्पात मंत्री थे एक; गौरा के किसान मालामाल हो सकते थे क्योंकि तब गौरा से जीते हुए विधायक राज्य कृषि मंत्री थे…पर ऐसा नहीं हो सका क्योंकि आपके ये नेता बुनियादी तौर पर भ्रष्ट थे और रहेंगे…आपके बच्चों की क़िस्मत में लिखा है कि वो मुम्बई-दिल्ली, गोवा-पुणे, अहमदाबाद जाएं मज़दूरी करने के लिए…यही आपके बच्चों का मुस्तक़बिल है कि वो अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ते रहें और परिवार का पेट भरने के लिए मुल्क के दीगर हिस्सों में दर-दर की ठोकरें खाते रहें! क्योंकि आप ऐसे नेता चुनते रहेंगे और ये सिलसिला अनवरत जारी रहेगा…

क्षेत्र में आज भी 50 फ़ीसद घरों में ही शौचालय होगा…गाँवों में तो 90 प्रतिशत घरों में आज भी दिन निकलते ही लोग 20 साल पहले की तरह लोटा-डिब्बा लेकर सड़क किनारे और खेतों में हगते नज़र आ जाएंगे…इस मामले में सबसे भीषण समस्या महिलाओं के लिए है जिन्हें शौच के लिए बाहर जाना पड़ता है।

…गोण्डा-फ़ैज़ाबाद-बस्ती-सिद्धार्थनगर-नेपाल-बलरामपुर-बहराइच के बीच एक गोले की शक्ल में मौजूद गौरा चौकी हिन्दुस्तान के सबसे पिछड़े, भ्रष्ट, बदबूदार, गंदे क़स्बे में आना चाहिए जहां रोज़ महंगी ज़मीनें ख़रीदी और बेची जाती हैं, जहां रोज़ नये-नये चमकदार घर-बिल्डिंग खड़े हो रहे, जहां रोज़ एक नया धन्नासेठ जन्म लेता है और गौरा की सड़कों पर आए दिन भारी-भरकम, चमचमाती गाड़ियों की नुमाइश करता है..इसके उलट यहां का ग़रीब और भी ग़रीब होता चला गया है, यहां का मज़दूर मुझे आज भी मज़दूरी करता नज़र आ जाता है, बचपन से जिसे मोटा कपड़ा पहनते देखा है उसकी हालत आज भी वैसी ही है, छोटा किसान आज भी अपना पेट भरने तक का अनाज नहीं पा पा रहा है—अमीर-ग़रीब के बीच की ऐसी गहरी खाई भारत में शायद ही कहीं देखने को मिले!

ये भी एक विडंबना ही है कि गौरा में जितने ही नये-नये धन्नासेठ पैदा होते गए, यहां का किसान बैंकों के क़र्ज़ में उतना ही डूबता चला गया है…साफ़ है कि अन्नदाताओं का जीवन नारकीय होता चला गया है और कालेधन वालों की पौबारह है!

मुल्क के दूसरे हिस्सों से उलट गौरा की जनता क़ानून से ज़्यादा पुलिस से डरती है क्योंकि यहां जनता तो जनता है नेता भी चौकी-थाने में पैसे देकर ही अपना उल्लू साध पाता है…इसीलिये क़ानून को ताक़ पर रख अंग्रेज़ों के दौर की-सी पुलिस अपना रौब-दाब ग़ालिब किये हुये है!

…चूंकि मेरा बचपन यहीं बीता है तो आज भी जब अपने चारों तरफ़ देखता हूँ वही चेहरे मानों बेजान-से लगते हों क्योंकि इनकी ग्रोथ हमें उसी बचपन में अटकी दिखती है! ये मेरा भ्रम है या सच्चाई कि मुझे अपना गौरा अब बदला-बदला-सा लगता है जहां बाल-बच्चों की परवरिश में पढ़ाई-लिखाई-अनुशासन से अधिक पैसे की वितृष्णा नज़र आती है…जहां अपना होने का भाव दम तोड़ रहा है…जहां लोगों की आंखों में मोहब्बत और सहयोग की बनिस्बत लालच नज़र आता है…ऐसे में आप एक अच्छे रहनुमा की आस लगाना बंद करिए क्योंकि नेता को पता है कि गौरा की जनता को अब सच्चाई से ज़्यादा चमक-दमक प्यारी है…चुनाव आता है तो नेता शादी-ब्याह अटेंड करने, मय्यत में जाने का स्वांग रचता है, चुनाव आते ही नेता पैसे बाँटता है, दारू बाँटता है, साड़ियां बाँटता है…फिर जनता चुतिया जाती है—नेता के पाँच साल के सारे काले कारनामे भूल जाती है और अंततोगत्वा नेता इनसे येन-केन-प्रकारेण वोटों की लहलहाती फसल काटने में समर्थ हो जाता है!

:- आफ़ाक़ अहमद

शोध छात्र: पत्रकारिता एवं जनसंचार

एएमयू, अलीगढ़

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