प्रेम- परीक्षा

Posted by Ek Aam Aadmi
July 29, 2017

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अगर उस दौरान तुमने मेरी ज़िन्दगी का आखिरी मकसद पूछा होता, तो मेरा जवाब उसी का नाम होता। मेरी जिंदगी का एक सिरा, उसी पर जा कर ख़तम होता प्रतीत होता था, और इस भरम ने मेरी आँखें चौंधिया रखी थी, कि आगे की जिंदगी उसी के साथ बसर होनी है। पर इस बात को सिद्ध करने के लिए कि मै उससे प्यार करता हूँ, एक कच्ची, ताज़ी, हरी मिर्च चबाना, कुछ ज्यादा मालूम पर रहा था।
हुआ ये कि मै उसके साथ उसकी रसोई में घुसा पड़ा था, और वो मेरी नादान स्वीकोरोक्ति के साथ चुहल किये जा रही थी, कि मै उससे प्यार करता हूँ। यह प्रेमपरीक्षा कोई बहुत कठिन भी नहीं थी, एक हरी मिर्च ही तो चबानी थी, पर मैंने बात टालने की कोशिश की, कहीं वो इस कत्लेआम के बिना भी मान जाए, पर मेरी इस बुज़दिली ने, आसान लगती चुनौती को कठिन स्तर पे पहुंचा दिया। अब उसके हाथ में कांच का एक टूटा ग्लास था, जो उसने किसी दिन भगदर में तोड़ी होगी, और ये बात भी वो उसी आसानी और चुहल के साथ बोली, कि इस ग्लास को अपनी हथेली पे जड़ लो, तो मै मान जाउंगी कि तुम मुझसे सही में प्यार करते हो। अगले पल, वह कांच का ग्लास मेरी हथेली में गंथा पड़ा था, और उसके धारदार कोने, खिड़की से छन के पहुँचती धूप में रक्ताभ हो रहे थे। उसके चेहरे पर अब हंसी नहीं थी, भय भी नहीं था, सन्नाटा था , वह स्तब्ध थी, शायद उसे मेरे प्यार पे यकीं हो रहा हो। मैंने उसकी हथेली अपनी खून से भीगे हथेली में पकड़ी, उसने सोच ना होगा, आगे जो हुआ। मैंने उसकी हथेली मेज़ पे टिकाई, और कांच के उसी टूटे ग्लास का एक धारदार कोना उसकी हथेली पे दे मारा, वह दहाड़ के चिल्लाई, शुक्र था कोई और ना आया, घर पे कोई ना था, और पास का मकान थोड़ी दूर पे था, इसीलिए किसी को पता ना चला। वह बुरी तरह भयभीत हो रही थी, और ग्लास के धारदार कोने उसी तरह से फिर, खिड़की से छन के आती धूप में, रक्ताभ हो रहे थे। वह पत्थर की तरह जड़ हो रही थी। वहां अगले कुछ पल बहुत खामोश थे।

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