फासीवाद: एकता और संघर्ष

Posted by Krishna Singh
July 3, 2017
देश बदल चुका है, सरकार अब पहले जैसा शासन करने में असर्मथ है। ज़रुरी है इस सरकार के लिए कि जनता की आवाज़ और विरोध को असामन्य तरीके से कुचले। जनता का विरोध रोज़गार के लिए है, सम्मानजनक तरीके से जीने के लिये है। जिन वायदों को लेकर भाजपा को वोट दिया था, उसका एक भी हिस्सा पूरा होता हुये दिखना तो अलग यहां तो हर कदम उन वायदों के खिलाफ नजर आ रहा है!
जिन मुद्दों पर पिछली सरकारों का जी जान से विरोध किया गया, जनता ने जिन मुद्दों पर कांग्रेस के खिलाफ वोट दिया, यह सरकार उन मुद्दों पर कुछ अलग करती नज़र नहीं आती है। जैसे एफ.डी.आई., आधार कार्ड, जीएसटी, अमेरिका के साथ समझौता जिसमे अमेरिकी सेना को हमारे मिलिटरी बेस को निरिक्षण करने का अधिकार दिया, बेरोज़गारी आदि।
किसानों की आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं, मज़दूरों का हक़ कानून बनाकर ख़त्म किया गया, आदिवासियों की ज़मीनें जबरदस्ती छीनी जा रही हैं। विरोध करने पर इनकी हत्या की जा रही है, महिलाओं और बच्चों के साथ बर्बर व्यवहार किया जा रहा है। सैनिकों की शहादत में भारी इजाफा हुआ है, जबकि पाकिस्तान अभी भी MFN बना हुआ है। उसे बिजली दी जा रही है, नदियों की पानी दिया जा रहा है। मोदी से लेकर उनके दूत, जिंदल आदि पाकिस्तान या विदेेशों में जाकर नवाज शरीफ की तारीफ कर रहे हैं। सैनिक अपनी मांग OROP के लिए 2 वर्षों से अधिक जंतर-मंतर पर धरने पर बैठे हैं, भूख हड़ताल कर रहे हैं और उनकी कोई सुनवाई नहीं है!
जनता के हर हिस्से में, युवा और छात्र, किसान और मज़दूर वर्ग, सैनिक और सिपाही तक में रोष है, विरोध की आवाज है और यह सरकार पूरी ताकत से इस आहट, हलचल और भावी आन्दोलन को तोड़ रही है। धर्म, जाति, देश और व्यक्तिवाद के आधार पर और भीड़ तो बस एक बहाना है। यह भाजपा का एक सुनियोजित प्लान है, फासीवाद का हिस्सा है! फासीवाद केवल भीड़ या किराए के गुंडों में ही नहीं, बल्कि प्रशाशन, पुलिस और शिक्षा संस्थानों आदि में भी दिख रहा है।
तो इस बदलते माहौल में, इस फासीवाद के दौर में हमारा क्या कर्तव्य है, क्या रोल है? बिना एक राष्ट्रीय फासीवादी विरोधी मंच के क्या फासीवाद को हराना संभव है? क्या बिना एक वैज्ञानिक, तार्किक और क्रान्तिकारी विचारधारा के यह काम संभव है? ऐसे में हम क्या करें?
साथियों यदि आप किसी प्रगतिशील दल या मंच से जुड़े हैं या व्यक्तिगत रूप से ही इन मुद्दों पर सोचते हैं तो इस दिशा में पहल करें। अपने विचार व्यक्त करें, चुपचाप ना बैठें। अकर्मण्यता सारे देश को आरएसएस के हवाले कर रही है, जो 18% मत से सत्ता में आई है और जो हमें देशी और विदेशी पूंजी के हवाले कर रही है। एकता और संघर्ष ही रास्ता है। फेसबुक, ट्विट्टर आदि से निकलकर ज़मीन पर आएं।

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