बूढ़ा विद्यालय

Posted by Sudhanshu Srivastava
July 3, 2017

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बेजुबां का नमस्कार!मैं जवांर का सबसे बूढ़ा विद्यालय हूं।मेरे अनगिनत ईंटों पर गश्त लगाते जहरीले जन्तुओं की राजधानी बसती है।मेरी त्वचा खुरदरी,दागदार व जगह जगह छिली कटी है।मेरे बेचैन घावों पर मरहम लगाने की जुगत में न जाने कितनों ने अपनी जेबें गर्म कर के मुझे ऐसे ही छोड़ दिया।पहले मैं जमकर सांसें लिया करता था।क्योंकि मैं सुंदर क्यारियों के गिरफ्त में था।नीम की जवान शखाएं गुदगुदी लगाया करती थी।पर अब तो बदरंग कटीले पेड़ों से ही ढका हूं।आज मुझमें कोई आकर्षण नही रहा।दर्द होता है।तरस आती है खुद पर।

जब से सरकारी ऐलान हुआ है कि बच्चों को मारना पीटना गुरुधर्म के खिलाफ है,भले ही बच्चे पढ़ाई लिखाई को ताख पर रखकर कुसंगति की मनभावन खाई में कूद जाएं।प्रायः इस तरह के फैसले बड़े जोर-शोर से अमल में लाये जाते हैं।’गुरुजनों की छड़ी बनाम सरकार का डंडा’ से समाज के जर्जर तबके को तो सहूलियत मिलती होगी।किन्तु ऐसे आदेश किसी केमिकल रिएक्शन से कम नही हैं।जो विध्वंशकारी भी हो सकते हैं।जब से अध्यापकों ने किचन का काम सम्भाला है। तब से प्रधानों से खूब चापलूसी कर रहे हैं।मैं तो अपने को और बूढ़ा महसूस कर रहा हूं। शारीरिक स्थिति दम तोड़ रही है।

उस दिन से मेरे घुटनों में बड़ा दर्द रहता है जब से बिना पढ़े लिखे विद्यार्थी फर्स्ट डिवीज़न की मार्कशीट ढो रहे हैं।अब तो मुझे चलने में भी बड़ी दिक्कत है।बस दिल्ली की दवा एमडीएम (स्कूलों में मिलने वाला दोपहर का खाना) ले रहा हूं।यह दवा दिन में एक बार लेनी होती है लेकिन कभी कभी महीने महीने भर नही ले पाता हूं।बीच वाले ही हजम कर लेते हैं।दूसरी दवा लखनऊ से स्कॉलरशिप (बच्चों को सालाना मिलता है) ले रहा हूं।हालांकि इन दवाओं के साइड इफेक्ट्स भी हैं।पर क्या करुं।विद्यालय की हल्की से छाप भी इन्ही दवाओं से उभरती है।

हर सुबह नवीन किरण से उम्मीद रहती है।बच्चे आएंगे।पढ़ेंगे,खेलेंगे…सब ठीक हो जायेगा।फिर उंगली पकड़ेंगे और मैं फिर से चल पडूंगा।

गांव वाले ही सुबह सुबह परिसर में लगे हैंडपंप की इस कदर खिंचाई कर देते हैं कि बेचारा दिन भर कराहता रहता है।गांव के मवेशियों का आना वाया मुझसे ही होता है।सो पूरे कैम्पस में गोबर कचरा भी खूब करते हैं।

मेरी हमेशा से ख्वाहिश रही है कि कॉन्वेंट स्कूलों की तरह मेरे पास भी बाउंड्रीवाल हो।मैं नाम मात्र का विद्यालय हूं! ज्यादातर चारागाह हूं,हुल्लड़ स्थल हूं,स्नानागार हूं,बारात घर हूं और सबसे ज्यादा सरकारी नीतियों से छिपा हुआ एक टीला हूं। सच में कोई ध्यान नही देता।बहुत बूढ़ा हूं। वृद्धावस्था पेंशन ही मिल जाया करे।

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