बेटियों के साथ ऐसा क्यू

Posted by Mahmood Iqbal
July 30, 2017

Self-Published

यह पांचवीं बार था वह अपनी दोस्त को मैसेज पर बता रही थी कि आज फिर लड़के वाले देखने आ रहे हैं दुआ करना उन्हें में पसंद आ जाऊँ मुझ से अब बाबा के चेहरे पर झुर्रियां नहीं देखी जाती हैं! न जाने उन्होंने ऐसा क्या गुनाह किया था के में उन पर बोझ बनी हुई हूं।
अब तो माँ के हाथ भी कांपते हैं इस मशीन को चला चलाकर उन्होंने आज तक मेरे लिए बहुत कुछ किया लेकिन किस्मत पता नहीं क्या इम्तिहान ले रही है।
शाम के वक्त वह अपने कमरे में बैठी यही दुआ मांग रही थी की मेरे बाबा की इज्जत बच जाए कहीं वह फिर से यही न सोचें की बेटी क्या पैदा कर ली अजाब मे पड़ गए हम तो।

और वही हुआ आने वालों ने नहीं पूछा के:
आपकी बेटी नमाज़ पढ़ती है या नहीं ..!
उन्होंने नहीं पूछा क्या दीन के लिए कभी किसी मदरसे में गई या नहीं …!
या कितना दीन पढा…!
उन्होंने नहीं पूछा की दुनिया का स्कूल कितना पढ़ा …!
। उन्होंने नहीं पूछा बेटी क्या दो वक्त का खाना बनाकर अपने शोहर और हमें दे सकती है या नहीं …!
बल्कि शाहबजादे जो एक तरफ कुर्सी पर टांगे रखे बेठा था उन्होंने माँ को इशारा क्या माँ ने भी कह दिया बेटी को बुलाओ…
अंदर से लड़की को लेकर उसकी माँ बाहर आई यहाँ राजकुमार साहब ने मुंह उठाया और बाहर चले गए …
लड़के की माँ पीछे गई बेटा क्या बात है यहाँ अंदर लड़की और उसके मां_बाप सुन रहे हैं …..
मुझे नहीं करनी इस से शादी शक्ल तो देखे इसकी यह भी कोई लड़की है।
लड़के का पिता माजरत करता हुआ वहाँ से उठा और उधर लड़की वहाँ से उठी और भागती हुई अपने कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर दिया।
तीन दिन कमरे के एक कोने में वह घुट-घुट कर मरती रही और आखिरकार चौथे दिन गोलियों का एक पैकेट अपने अंदर डाल कर वे इस मुआशरे से खुद को अलग करने के लिए सुकून की नींद तलाश करने चली गई।

अब मेरा सवाल है क्या उसे उसके हुसुन ने मारा है?
या पांचवें शख्स ने मारा है।?
या इन तमाम लोगों ने जो इससे पहले आ चुके थे।?
मैं बताता हूँ …..! लानत भेजता हूँ में इस गंदे मुआशरे पर जिसने उसे मारा है लोगों की बेटियां ऐसे देखने जाते हो जैसे के किसी बाग का व्यापारी जाता है बाग अच्छा लगा तो ठीक वरना कोई ओर ले लूँगा।
आप में-ओर हम वह तकलीफ नहीं महसूस कर सकते हैं जो एक बाप के सीने में लगी होती है एक माँ का कलेजा जब फट रहा होता है और जब उसकी आँखें खून बहा रही होती हैं।

जब किसी की बहन बेटी को देखने जाओ तो उसे शक्ल से न देखो … बल्कि माँ- बाप से पूछो क्या वह दीन जानती है … क्या वह मेरी माँ को माँ समझने के काबिल है …
क्या वह दो वक्त का खाना मुझे और मेरे माँ-बाप को दे सकती है।
और अगर हुसुन चाहिए है तो मे आप को एक मशवरा देता हूं जाओ मग़रिब वहाँ हुसुन है और वहाँ हुसुन मिलेगा भी बाकी हया- शर्म- दीन उनके करीब से भी नहीं गुजरा होगा! और वैसे भी तुम्हें कौन सा हया शर्म या दीन चाहिए ।
ज़रा सोचो घर में जो बहन है उसे पांच बार कोई देखने आए और पांचवीं बार भी कहे नहीं मुझे नहीं पसंद तो आप पर कयामत गुज़रती है
और तुम्हें याद भी है खुद कितनी बेटियों पर कयामत गिरा चुके हो।
यकीन मानिऐ हमें पता भी नहीं होता कि कहीं हमारे कारण किसी घर में कितना बड़ा फसाद कितना बड़ा दुख जन्म ले चुका है।
हुसुन न देखिऐ किसी कि इज्जत देखिऐ। क्या फायदा अगर हुसुन मिले और इज्ज़त न हो बेइज्जत लोग हो हया न हो दीन न हो .. लानत न भेजूं में ऐसे लोगों पर।
और क्या ही ज़िन्दगी हो !!! कि सादा चेहरा ही क्यों न हो दीन हो इज्जत दार लोग हो हया हो और दीन हो।
ये बेटियों अपनी खुशी से ज्यादा अपने बाप के दुख में मर रही होती हैं कि कहीं मेरा वालिद या मेरी माँ मुझ से निराश तो नहीं!!?
लोगों में हया शर्म और दीन देखो … हुसुन नहीं .. !!
यह सच्चाई किसी को बुरी लगी हो तो माफी चहाता हूँ

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