ये बिंदियाँ सिंधूर बकबास हैं

Posted by Ankur Vimukt
July 20, 2017

Self-Published

आज विश्वविद्यालय ,ग्वालियर के सभागार मे बैठा था । सभागार खचाखच भरा था जहाँ मुझे स्थान लेना था उसके एक तरफ एक मेरी हम उम्र पुरूष बैठे थे , वही दूसरी ओर की शेष दो सीट पर दो महिलाये थी । जब से मै बैठा था तब से मै देख रहा था उनके ओंठ रूकने का नाम नही ले रहे थे । जैसे ए के 47 की गोलियाँ निकलती है वैसे उनके अल्फाज तङातङ – तङातङ निकल रहे थे । शब्दो की बमबारी निरन्तर जारी थी । ऐसा आभास हो रहा था कि वर्षो पहले बिछङ गयी थी , पर आज किस्मत ने मिला दिया ।

मेरे रूचि न लेने पर भी उनकी बाते मेरे कानों मे दस्तक दे रही थी । सीट छोङ नही सकता था , कारण प्रोटोकाल के तहत वही बैठने हेतु आरक्षित थी । मै भी जमा रहा , ठान लिया हिलूँगा मै भी नही ।।

कुछ कुछ बाते मेरे कानो मे और तेज आने लगी थी , मेरे क्या मेरे आगे बैठे महोदय भी चार दफे पलटकर देख चुके थे ।

एक महिला ने दूसरी से कहा ,” तू यही रहती है । ”
दूसरी महिला – हाँ और तू

” मैं भी यही , तू सिंधूर और बिंदी बगैरा नही लगाती । ” पहली महिला ने दूसरी महिला से कहा ।

” अरे ना , मुझे ये सब बकबास लगता है , और इनको भी पसंद नही है , मेरे साथ साथ ! बेबजह का समय बेकार करना है । ” दूसरी महिला ने पहली महिला से कहा ।

दरअसल , ये कहानी साझा करने के पीछे मेरा आशय यह है कि जो संस्कृति हमारा उपहार थी , जो संस्कार महिला के गहने थे वो आज बकबास है । सच कहूँ , देश ने कही प्रगति की हो अथवा न की हो पर देश ने संस्कार को खोने मे अवश्य प्रगति की है । जब महिलायें भी पुरूष की भांति संस्कार खोने लगे तो समझिये देश का भविष्य घने अंधकार की ओर अग्रसर है ।

” अर्द्ध नग्न सभ्यता भारत की नही हो सकती , बेशक यह लोगो के दिलो मे बसती हो …..लोगो के लिये यह एक दिव्य स्वप्न हो और स्वर्ग की अनुभूति परन्तु यह नवागत पीढ़ी हेतु एक मीठे विष की भांति है । यह हलाहल पीजिये , शुरू मे मीठा लगेगा परन्तु कुछ समय पश्चात आपके मन मे अनगिनत प्रश्न छोङ जायेगा ।। “

एक बात याद रहें ……

” नग्नता और फूहङता किसी देश के विकास का मानक नही हो सकती , जिन्होने अपनी सभ्यता और संस्कृति को संजोकर रखा है वे सदैव उन्नति के पथ पर अग्रसर हुये है ।। “

धन्यवाद !!

– अंकुर त्रिपाठी ‘ विमुक्त ‘
लेखक

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