क्या यूपी विभाजन से देश को मिल सकती है नई दिशा?

Posted by Ajay Panwar in Hindi, Politics
July 22, 2017

भारतीय राजनीति मुद्दों से कम और शोरगुल से ज़्यादा चलती है। कितनी ही बार ऐसे राष्ट्रहित के विचार प्रस्तुत किये गए लेकिन ना जाने वे कहां खोकर रह गए। 2011 में मायावती द्वारा भी एक ऐसा विचार प्रस्तुत किया गया था जिसे कालांतर में हाशिये पर धकेल दिया गया। अम्बेडकर के विचारों से प्रभावित दलित राजनीति करने वाली मायावती ने उन्हीं के विचारों का सहारा लेकर यूपी को चार हिस्सों में बांटने का विचार प्रस्तुत किया था। लेकिन उनकी सरकार का कार्यकाल समाप्त होते ही चुनाव के शोर में यह विचार भी कहीं दब गया।

यूपी का विभाजन न सिर्फ यूपी बल्कि पूरे देश को नई दिशा देने में सक्षम है। छोटे राज्यों में तेजी से होने वाला विकास, भाषाई समानता तथा एकल सांस्कृतिक विरासत साझा करने वाले लोगों का एक राज्य की शक्ल में होना निश्चित तौर पर देश की उन्नति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

‘थॉट्स ऑन लिंग्विस्टिक स्टेट्स’ में अम्बेडकर भाषाई आधार पर राज्य बनाने के पक्ष में थे जिससे एक राज्य, समान संस्कृति तथा भाषा साझा कर सके ताकि उनका एकत्व कायम रहे। मायावती का मॉडल, अम्बेडकर के मॉडल से काफी भिन्न लेकिन फिर भी विचार करने योग्य है।

अम्बेडकर एक समृद्ध राष्ट्र के लिए एक राष्ट्रव्यापी भाषा प्रयोग में लाने के पक्षधर हैं और इसी कारण वह भाषा के आधार पर राज्यों का विभाजन भी उचित ठहराते हैं। अम्बेडकर भौगोलिक रूप से बड़े राज्यों की वकालत कतई नहीं करते। 2 करोड़ की अधिकतम जनसंख्या का प्रशासनिक प्रबंधन ही उनके विचार में उपयुक्त है। उत्तर प्रदेश को 3 भागों में विभाजित कर उनकी राजधानी मेरठ, इलाहबाद तथा कानपुर करने का विचार अम्बेडकर का है, लेकिन वर्तमान परिदृश्य में यह अप्रासंगिक नज़र आता है क्योंकि उत्तर प्रदेश हर प्रकार के काफी बदलाव देख चुका है।

यूपी को विभाजित करने के लिए सिर्फ यूपी पर ही ध्यान केन्द्रित करना आवश्यक नहीं है, क्योंकि यूपी के सीमावर्ती राज्यों में भी कमोबेश यूपी जैसी ही संस्कृतियों और बोलियों का अनुसरण किया जाता है। मसलन हरियाणा से सटे हुए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में, जो प्रस्तावित हरित प्रदेश है हरियाणा जैसी ही बोली तथा उन्हीं मान्यताओं का प्रभाव है। इसी तरह पूर्वी उत्तर प्रदेश भी पश्चिमी बिहार से ज़्यादा भिन्न नहीं है। इस समानता को ध्यान में रखते हुए ही इन राज्यों को पुनर्गठित करने की आवश्यकता है।

एक राज्य में 10 लोकसभा सीटें तथा उसके साथ लगते राज्य में 80 सीटें होना तर्कसंगत नहीं है। राज्यों के इस पुनर्गठन से यूपी पर अत्यधिक राजनीतिक दबाव तथा अनावश्यक ध्यान भी हट जाएगा। इससे वोटों की दौड़ नेताओं को दूसरे हिस्सों से भी मुखातिब होने पर भी मजबूर करेगी जो विकास को उनके दरवाजे तक खींच ले जाने में सक्षम होगा। चूंकि हरियाणा, पंजाब के साथ अपनी राजधानी साझा करता है इसलिए हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश को मिलाकर बने नए राज्य की राजधानी रोहतक या मेरठ बनाई जा सकती है, जो वर्तमान में मुख्य आर्थिक केंद्र हैं।

हालांकि मायावती का सुझाव राष्ट्र हितैषी था, लेकिन फिर भी प्रथम दृष्टि में ही यह विचार पूर्णतया राजनीतिक महत्वकांक्षा से प्रायोजित नज़र आता है। ऐसा लगता है कि वह अपने लिए एक अलग राज्य की मांग कर रही थी जिस पर वह दलित-मुस्लिम राजनीती के बल पर शासन कर सकें। अम्बेडकर के नाम का प्रयोग कर राजनीतिक लाभ लेने का यह पहला उदाहरण नहीं है।

कितनी चालाकी से भाषाई मॉडल को जातिगत रूप दिया गया यह भी देखने लायक है। ब्रज़ी, अवधी, बुन्देलखंडी तथा भोजपुरी भाषाओं के लिए अलग प्रदेश की मांग को यादवों, दलितों, मुस्लिमों और भूमिहारों के लिए एक प्रदेश की मांग में तब्दील कर दिया गया। लेकिन इन सबसे इतर भी अब उत्तर प्रदेश वाकई विभाजन का हक़दार है। इतने बड़े भौगोलिक विस्तार, सालों से चलते आए गुंडाराज तथा न्यून आर्थिक विकास को देखते हुए इसे विभाजित करना ही तर्कसंगत जान पड़ता है ताकि हर क्षेत्र को विकास में भागीदारी मिल सके।

यूपी के साथ-साथ बिहार की भयावह स्थिति भी विचार करने योग्य है। अभी भी बीमारू राज्यों में गिना जाने वाला बिहार घोर भ्रष्टाचार, बाहुबल, राजनीतिक लूट और नेताओं के बोलबाले से ग्रस्त है। करोड़ों के पैकेजों के बावजूद तुलनात्मक रूप से शून्य विकास दिखाने वाला बिहार भी पुनर्गठन की प्रतीक्षा में है, ताकि वहां जातिगत समीकरणों में तब्दीली आए। ऐसा होगा तो शायद नेतागण जातिगत समूहों के तुष्टिकरण से ध्यान हटाकर विकास कार्यों में ध्यान लगा पाएंगे।

इस प्रकार के आतंरिक विभाजन राष्ट्रीय विकास दर को प्रभावित करने का माद्दा नहीं रखते, लेकिन नए राज्यों का गठन उनकी आपसी प्रतिस्पर्धा अवश्य बढ़ा देता है। साथ ही सभी दलों को सत्ता में हिस्सा मिल जाने से निरंतर जारी राजनीतिक खींचतान और षड्यंत्रों में कमी आना भी संभव हो जाता है। यूपी से ही अलग हुए उत्तराखंड का विकास सबके सामने है। हरिद्वार में आयुर्विज्ञान के क्षेत्र में हुई उन्नति तथा पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था इस बात की पुरजोर वकालत करती है कि यूपी को भी इस तरह का एक अवसर प्रदान किया जाना चाहिए। यूपी का टुकड़ों में विकास राष्ट्र को कुछ अन्य आर्थिक केंद्र भी दे सकता है। ऐसे अनेक शहर जो संभावनाओं से भरे हैं लेकिन पर्याप्त अवसर के मोहताज हैं, उन्हें भी उत्तर प्रदेश का विभाजन यह अवसर प्रदान कर सकता है।

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