#रमेशऔरसिद्दकीदोस्तहै.

Posted by हरबंश सिंह
July 10, 2017

Self-Published

बरसात के इस मौसम में अक्सर बारिश से शिकायत रहती है की ये उसी वक़्त क्यों आती है जब शाम को ऑफिस से घर जाना होता है, आज भी इस तेज बरसात से बचने के लिये, सड़क किनारे बने एक बस स्टैंड को छत बनाकर बेठा हूँ और सामने से, सड़क पर बेलगाम रफ्तार, गाड़ियों के माध्यम से दौड़ रही है, ढलती हुई रात का अँधेरा, गाड़ियों से आती तेज रोशनी, एक ही दिशा की तरफ दौड़ रहे सभी वाहन, एक सूत्र का भृम बाँध रहे है, लेकिन असलियत में, क्या हम सब आज एक है ? क्या समाज को बाटा नही जा रहा ?

उदार जज्बात, अक्सर इस तथ्य को स्वीकार नही करते की समाज बट चूका है, उनकी आत्मा अक्सर यही कह रही होती है की अभी भी कुछ उम्मीद बची है, उन्हे ये समाज अभी एक जिंदा लाश की तरह तो दिख रहा है लेकिन उन्हे इसमे सुलगती हुई जिंदगी की उम्मीद दिखाई दे रही है, लेकिन दूसरी तरफ, जिनकी आज संख्या नंबर में बहुत ज्यादा है, ये अपनी कट्टरता की मानसिकता पर अहंकार का परचम लहरा रहे है और एक तरह से जशन मना रहे है, इन्हे इस बात पर खुशी हो रही है की समाज के इनके बहुसंख्यंक हिस्से को समाज की नुमाइदिगी करने का मालिकाना हक मिल गया है, अगर सही अर्थो में कह सकता हूँ की समाज के इस हिस्से ने समाज से ही समाज का मालिकाना हक छीन कर लिया है, तो कही गलत नही होगा, अब जब समाज में, परिवार में एक मालिक होगा जो सब का क्या खाना है, क्या पहनना है, किस आस्था के प्रति अपना झुकाव रखना है, इन सभी जिंदगी के बुनियादों फैसलों का निर्णय वही मालिक करेगा, इस स्थिति में तो समाज को एक कहना मुश्किल है मसलन समाज बट गया है, इसे बाट दिया गया है.

लेकिन, कैसे हम कह सकते है, की समाज में एक धागे का सूत्र नही रहा, यँहा तो दिवाली पर शहर रोशन होता है वही ईद पर भी बाजार में रौशनी होती है, ये तथ्य उतना ही सही है की आज दिवाली और ईद में शहर का एक ही हिस्सा रोशन होता है पूरा शहर नही, यँहा शहर में भी मकान बट रहे है अब इनकी पहचान इनकी जगह के नाम से ना लेकर, इनके समुदाय के नाम से होती है मसलन ये हिंदू इलाका है और ये मुस्लिम इलाका, दोनों को एक दूजे के शहर में जाने से पहले हिदायत भी दी जाती है की संभल कर जाना, आज हालात सामान्य नही है. लेकिन ये बटवारा शहर के मकानों तक सीमित नही है ये हमारी मानसिकता में भी जगह बना चुका है और इसकी छाप बहुत ज्यादा गहरी है, मसलन अगर हम नीचे का वाक्य पढ़ेगे तो हमारी मानसिकता में मौजूद चिंता के भाव या इसे अपनी जीत को समझकर खुश होने का व्यवहार ही इस बात का सबूत होगा, की आज समाज को बाटा जा रहा है.

रमेश और सिद्दकी दोस्त है. #रमेशऔरसिद्दकीदोस्तहै.

एक उदार और जज्बाती सोच, जिसे समाज को हम और वह में बाटना मंजूर नही, वह समाज के सारे अंगों को एक समान नजर से देखते है, लेकिन इस वाक्य को पढ़कर इस आजाद सोच के माथे पर चिंता की सिकन उभर आयेगी, लेकिन ये इस तरह तो नही था मसलन कुछ साल तक सब सामान्य था, जँहा रमेश और सिद्दकी की दोस्ती पर किसी को कोई शक नही था और ना ही कोई सवालिया चिन्ह था की इन दो नामो में दोस्ती क्यों नही हो सकती, लेकिन पिछले कुछ सालों में समाज बहुत तेजी से बदला है, बदलते इस समाज ने उदार और जज्बातो को इतनी ठेस पहुचाई है की वह चाहते तो है की समाज के इन दो अंगों में दोस्ती हमेशा बरकरार रहे लेकिन जिसे साफ़ साफ़ देखा जा सकता है, जँहा आज रमेश और सिद्दकी में दोस्ती मुश्किल नजर लग रही है, शायद इसलिये समाज का उदार स्वभाव और जज्बात आज घायल नजर आ रहे है, इन्हे आज समाज की निर्मलता और नैतिकता का पतन होता हुआ दिखाई दे रहा है और ये इतने असहाय है की ये समाज को बचाकर रखने में खुद को असमर्थ समझ रहे है.

लेकिन, इसी वाक्य को कट्टरता की मानसिकता पढ़ेगी तो इसे यँहा अपनी जीत का जश्न दिखाई देगा, ये इसे एक चुटकले के माध्यम से अपनायेगी, जँहा बस आप हस सकते है, इसे स्वीकार नही कर सकते, हंसी उसी तथ्य पर आती है जिसकी संभावना बिलकुल ना हो, मसलन एक पत्नी ने अपने पति को पीट दिया, इस पर तभी हस्ते है जब आप की मानसिकता इस तथ्य को स्वीकार नही करती की किस तरह एक कमजोर ओरत पुरुष प्रधान समाज में अपने पति को पीट सकती है लेकिन जँहा ये कहा जाएगा की पति ने पत्नी को पीटा है वँहा कही भी कोई हंसी नही सुनाई देगी क्योकि ये तथ्य समाज में मौजूद है, सच है. उसी तरह कट्टरता की सोच और मानसिकता, आज समाज पर अपनी मालिकाना हक का झंडा लहरा चुके है, और ये अपनी जीत को निश्चित तौर पर बरकरार रखने के लिये आस्वस्त है, जँहा इन्हे कही कोई विरोध में खड़ा नही दिखाई दे रहा, यकीनन ये कट्टरता की सोच आज रमेश और सिद्दकी की दोस्ती को नकार तो रही ही है लेकिन उस हर षड्यंत्र को प्रोत्साहित कर रही है जिस से रमेश और सिद्दकी के बीच की दूरियां एक दुश्मनी की हद तक बढ़ जाये.

लेकिन, ये भी सत्य है की समाज का उदार समुदाय समाज की कट्टरता की मानसकिता से ज्यादा है लेकिन कट्टरता की ताकत के सामने खुद को लाचार महसूस करता है, वही इस कट्टरता की मानसिकता कुछ 0.01% ही समाज में मौजूद होगी, जो किसी ना किसी राजनीतिक पार्टी से जुडी हो जिसका रंग केशर या हरा हो, ये कट्टरता की मानसिकता रमेश और सिद्दकी इन दोनों के घर, समाज और मोहलले में मौजूद है लेकिन बस 0.01%.

लेकिन जिनकी आबादी बहुत ज्यादा है वह आम नागरिक आज भृम में है. अगर यह इसी तथ्य को स्वीकार करता है की रमेश और सिद्दकी दोनों में मित्रता होनी चाहिये, तो इसे कश्मीर से पंडितो के पलायन का वास्ता दिया जाता है, इसके सामने बाबर से लेकर औरंगजेब का इतिहास खड़ा कर दिया जाता है, पाकिस्तान की कट्टरता को दिखाया जाता है और अगर अभी इसी आम नागरिक के जज्बात शांत और तर्क शील रहते है तो इसे कुछ ऐसी तस्वीरे दिखाई जाती है जँहा दूसरे समुदाय का एक इंसान इस समुदाय की औरत के साथ बदसलूकी कर रहा हो, ये तथ्य दोनों तरफ है लेकिन सिद्दकी के घर , एक उद्दार नागरिक के जज्बात झनझोड़ने किसी फेसबुक की पोस्ट को दिखाया जाता है जँहा आपत्तिजनक सामग्री को दिखाया जाता है जो आस्था से विपरीत अपमानित शब्द और दृश्य होते है, अगर अभी रमेश और सिद्दकी के यँहा एक आम नागरिक के जज्बात आग बबूला नही होते तो एक नारा दिया जाता है जो दोनों तरफ गूंजता है, रमेश के यँहा “धर्म खतरे में है.” और सिद्दकी के यँहा “मजहब खतरे में है.” यँहा दोनों जगह जब धर्म और मजहब पर सवाल खड़ा कर दिया जाये तो कही भी एक तर्कशील सोच को तर्कहीन होना पड़ता है, उसे अक्सर शांति और भाई चारा तो मंजूर है लेकिन एक हजूम जो नफरत की आग लेकर बढ़ रहा है, जो सड़क से लेकर सोशल मीडिया हर जगह मौजूद है, यँहा एक आम नागरिक को ना चाहते हुये भी अपनी मौजूदगी को दर्ज करवाना जरूरी बना दिया जाता है.

लेकिन, आज ये आम नागरिक जो सब कुछ समझ रहा है लेकिन इसके जज्बात को आहत करके वोट में तबदील करने की कोशीश हर वक़्त और निरंतर चलती रहती है, इनमे से एक मैं भी हूँ, जब से जन्म हुआ है और इस समाज का हिस्सा बना हूँ धर्म के नाम से ही मेरी पहचान रही है, और अक्सर हिंदू-मुस्लिम जो लिखने में महज दो शब्द है, आस्था का प्रतीक है, प्रेम का सेंदेश है, नफरत जँहा कभी कबूल नही, अंजान और आरती, शांति का मार्ग है लेकिन फिर भी मैं व्यक्तिगत रूप से इन दोनों समुदाय और समाज की तंगदिल और फर्क को देखता रहा हूँ, भारत का इतिहास है यँहा हर 10 सालो में कही ना कही धर्म के नाम पर बहुत से मासूमो का लहू बहा है जँहा फर्क बस दो शब्दों का था हिंदू-मुस्लिम. मैं आज इस नफरत की दीवार को नकार रहा हूँ, मुझे अब ये तंगदिल पसंद नही, मैं वास्तव में थक चुका हुआ, ये हिंदू है, ये मुस्लिम है, यँहा ये ऐसे लोग है वँहा वे ऐसे लोग है, वहां वे ऐसा करते है हम उनसे अलग है, अब और नही. मुझे इंसान और इंसान में फर्क नही करना और आज में ये बुलंद आवाज में कहता हूँ और स्वीकार करता हूँ

रमेश और सिद्दकी दोस्त है. #रमेशऔरसिद्दकीदोस्तहै.

अगर, हम अपनी आने वाली पीढ़ी को एक नया कल देना चाहते है, तो हमे ये नारा  #रमेशऔरसिद्दकीदोस्तहै देना होगा, अन्यथा जिस तरह गांधी जी ने कहा था की आंख के बदले अगर आँख ली जायेगी तो सारा संसार अँधा हो जाएगा, आज हमें ये फैसला करना है की आँख के बदले आँख या प्रेम और दोस्ती के जज्बात को प्रतोसाहित करना है जँहा सभी का एक समान अधिकार हो और समाज को हम और वह में ना बाटा जाये.

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