लड़कियों का लूज कपड़े पहनना यानी ‘भाई’ की मांगी हुई ड्रेस

Posted by Shalu Awasthi
July 27, 2017

एक पुरुष मित्र ने धांसू सा मोबाइल कवर खरीदा, दिखने में क्लासी और बेहद ही गजब का लुक। लेकिन वह उसका पहला और आखिरी दिन था। उसके बाद वह कभी भी वो कवर नहीं लाया। कारण? वह कवर गुलाबी रंग का था और गुलाबी रंग तो महिलाओं और लड़कियों का होता है ना। दरअसल, यह ढर्रे हमने ही तय किये हैं और हम बाज़ार के इन उत्पादों से प्रेरित हो जाते हैं, जो बाज़ार ने ही बनाए हैं। बाज़ार में गुलाबी लड़कियों के लिए ही तय कर दिया गया है।

बाज़ार के तय ढर्रे को तोड़ने की ‘यूथ की आवाज़’ की यह कोशिश सराहनीय है। कैंपेन #MoreThanOneSize कई महिलाओं को हिम्मत दे रहा है कि वे अपनी बात रख सकें, अपने अनुभवों को शेयर कर सकें। समाज में बढ़ते स्टिरियोटाइप्स को मार्केट भी काफी हद तक बढ़ावा देता है।

अब ओवर साइज़ महिलाएं भी खुश होकर पोज देती हैं:

ये बात तो सही है कि अगर आप ‘अंडर साइज़’ या ‘ओवर साइज़’ हैं तो सही साइज़ के कपड़े तलाशना काफी मुश्किल हो जाता है। खैर, समय के साथ-साथ ज़माना भी बदल रहा है। अब शॉपिंग साइट्स पर इठलाती हुई ओवर साइज़ महिलाएं भी पोज देती हैं और फोटो खिंचवाती हैं। ये तो साइज़ की बातें हैं जहां धीरे-धीरे ही सही, लेकिन सोच में बदलाव आ रहा है। लेकिन समाज के जिस तबके ने कपड़ों को महिला पुरुष के ढर्रे में बांध रखा है, वो आज भी कैद है। आज भी शर्ट पैंट लड़कों की पोशाक है और साड़ी, सूट, स्कर्ट लड़कियों की। कुछ दिनों पहले एक अभियान चला, जिसमें लड़के स्टीरियोटाइप हटाने के लिए साड़ी और स्कर्ट में फोटो अपलोड कर रहे हैं।

पुरुषों और महिलाओं के शॉर्ट्स में अंतर

एक किस्सा बताना चाहती हूं, शॉपिंग करने के लिए मैं अक्सर दोस्तों के साथ जाती हूं। हाल ही में एक मॉल गई, वहां मेरी फ्रेंड शॉर्ट्स लेने लड़कों के डिपार्टमेंट में पहुंच गई। हुआ ये कि यह देखते ही वहां एक महाशय आ गए और बोले, “जी आप, ये अपने लिए लेना चाहती हैं?” मेरी दोस्त ने कहा, “जी, साइज़ एम मिलेगा क्या?” उन्होंने कहा, “मैडम ये पुरुषों का है, दिस इज फॉर मेन।” अब मेरी दोस्त का तर्क था कि इसमें ज्यादा कम्फर्टेबल महसूस होता है, क्योंकि यह खुला-खुला होता है और फिर घर में पहनने में क्या दिक्कत है? लेकिन अब उन महाशय को तो सिर्फ महिला-पुरुष के कपड़े ही पता है, वो कहां हमारे कम्फर्ट का सोचेंगे?

लड़कों वाले टी शर्ट पहनना मतलब भाई’ का मांग के लायी हो

मेरी एक कलीग है, उसे ढीले कपड़े पहनने की आदत है, वह ऑफिस में अक्सर ढीले टॉप और ढीले शर्ट पहनकर आ जाती है। कभी-कभी तो वह शूज़ भी लड़कों जैसे पहनकर आ जाती है। ऐसे में हमारे ऑफिस के कुछ पुरुष (और कभी-कभी लड़कियां भी) कहते हैं, “इसे देखो अपने भाई का शर्ट मांगकर लायी है।” उसका अपना तर्क है कि उसे ढीले कपड़े पहनने का शौक है, इससे वह खुद को कूल महसूस करती है। या यूं कहे कि ये उसकी पर्सनल चॉइस है।

पिंक और ब्लू वाला फर्क आज भी

पुराने समय से चली आ रही रंगों की भेद की परम्परा आज भी कायम है। दरअसल, समाज ने कुछ रंगों को महिलाओं और कुछ को पुरुषों के लिए तय करके रखा है और हम भी उसी पर चल रहे हैं। एक किस्सा बताते हुए मैं इस फर्क को समझाना चाहती हूं। हाल ही में मेरे एक पुरुष मित्र ने गुलाबी रंग का मोबाइल कवर खरीदा, वह काफी महंगा भी था और दिखने में क्लासी भी। फिर भी सिर्फ उसके रंग की वजह से दोस्तों ने उसे खारिज कर दिया। उन्होंने कहा, “अबे लौंडे होकर ये लौंडियों वाले रंग का कवर खरीद लाए, तमसे तो ऐसी उम्मीद नहीं थी।” इसके बाद मेरे उस दोस्त ने उस कवर को दोबारा नहीं इस्तेमाल किया। शायद उसमें उन बातों को सहने की हिम्मत नहीं थी।

अब यह रंगों का भेद हमने और आपने ही तो बनाया है जिसे पीढ़ियों से हम मानते चले आ रहे हैं, ज़ाहिर है कि हम और आप ही मिलकर इस ढर्रे को खत्म कर सकते हैं।

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.