संगति का असर

Posted by Alka Mishra
July 28, 2017

Self-Published

(जैसी संगत वैसी रंगत) यह कहावत बचपन में हम सभी ने दादी- नानी या मां से जरुर सुनी होगी। कहावतें बेवजह ही नहीं बनती इसका जुड़ाव हमारे वास्तविक जीवन से जरुर होता है। बचपन में अक्सर दादी मुझे ऐसी कहावत सुनाया करती थी। तब मैं इन सब बातों को समझने के लिए बहुत  छोटी थी, बस दादी की बात सुन उसे मज़ाक में उड़ा देती । आज जब मैं अपने कॉलेज के पिछले तीन साल के अनुभव को याद करती हूँ तो दादी की उस कहावत को अपने वास्तविक जीवन से काफी जुड़ा हुआ पाती हूँ । कुछ रिश्ते इतने गहरे होते हैं कि  उनसे निकलना काफी मुश्किल हो जाता है। दोस्ती भी एक ऐसा ही रिश्ता है,  जानते हुए भी  कि  यह रिश्ता नुकसान पहुंचा सकता है हम फिर भी उस रिश्ते को पूरी तरह निभाते चले जाते हैं। मेरी कहानी भी कुछ ऐसी ही है। आज जब याद करती हूँ तो मुझे अपने दो साल बरबाद करने पर बहुत अफसोस होता है।

कॉलेज का तीन साल अब खत्म हो चुका है । इन बीते तीन सालों से कई खट्टी- मीठी यादें जुड़ी है । कभी दोस्तों के साथ बिताए कुछ हसीन पल याद करती हूँ तो आज भी चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ जाती है । यूँ तो कॉलेज की सभी लड़कियों से मेरी अच्छी बनती थी मगर कॉलेज के पहले दिन से ही मेरी दोस्ती चार लड़कियों से हुई। हमारा रॉल नंबर आस-पास था इसलिए हम एक साथ बैठते थे । पहले तो हम अपनी पढाई को लेकर काफी गंभीर थे। लेक्चर खत्म हो जाने के बाद थोड़ी देर बात कर लिया करते, लेकिन धीरे-धीरे हमारी दोस्ती बढ़ती गई हम एक दूसरे से खूब बाते किया करते। साथ खाना, साथ रहना, अपनी सारी बाते शेयर करना मुझे काफी अच्छा लगता था। इसी तरह हम और भी गहरे दोस्त बनते गए । हालांकि मुझे पता था कि इस सब से मेरे पढ़ाई पर काफी असर पर रहा है, लेकिन फिर भी मुझे उनके साथ रहना  पसंद था। इन सब के बीच कॉलेज का एक साल कैसे बीत गया पता ही नहीं चला। इस एक साल में मैनें शायद ही अच्छे से पढ़ाई की होगी। मेरे ग्रेड गिरते गए लेकिन हमारी दोस्ती दिन व दिन परवान चढ़ती गई । पहले तो बस बाते ही होती थी लेकिन धीरे धीरे हम कॉलेज बंक कर घुमने लगे । कभी सिनेमा हॉल तो कभी रेस्टुरेंट, हमेशा हम कॉलेज छोड़ घुमने निकल जाते। ऐसा काफी दिनों तक चलता रहा। एक दिन मैनें मेरी दोस्तों को दूसरी लड़कियों के सामने मेरी कमियों पर मेरा मज़ाक उड़ाते पाया। मैं काफी दुखी हुई क्योंकी उस वक्त तक मेरे मित्र मेरी जिंदगी का सबसे अहम हिस्सा बन चुके थे। सब कुछ जानते हुए भी मैं उनके साथ रहती, कई बार उस दोस्ती के रिश्ते से निकलने की कोशिश करती लेकिन निकल नहीं पाती। कुछ दिनों बाद मेरे दूसरे वर्ष की परिक्षा हुई। उस वक्त मेरी पढ़ाई से दिलचस्पी पूरी तरह खत्म हो चुकी थी। जैसे- तैसे मैंने परिक्षा दिया, कुछ दिनों बाद परिणाम आए, मैं पास तो हो गई थी लेकिन मेरे अंक काफी कम थे। तब मुझे एहसास होने लगा कि ये दोस्ती मेरी पढ़ाई पर काफी असर डाल रही है। धीरे- धीरे मैं उन सभी से दूरी बनाने लगी ।कुछ दिनों तक पढ़ाई में मन लगाने की कोशिश में क्लास में अकेले बैठा करती थी। फिर तीसरे साल मेरी मित्रता एक अलग ग्रुप से हुई वो मेरे पुराने दोस्तों से पूरी तरह अलग थें। घुमने- फिरने से ज्यादा वो पढ़ाई को प्राथमिकता देती थी। उनको पढ़ता देख मुझमें भी पढ़ने का उत्साह जगा और तीसरे साल मेरे अच्छे अंक भी आए। आज कॉलेज खत्म होने के बाद सोचती हूँ तो लगता है वहाँ दोस्ती थी ही नहीं क्योंकी सच्ची दोस्ती तो वो है जो हमें आगे बढ़ना सिखाए, मुश्किल समय में ढाल बनकर आपके सामनें खड़ी रहे। लेकिन जिन्हे मै अपना दोस्त मान चली थी उन्हें मेरी खामियों पर हसने और उसका मज़ाक बनाने में खुशी मिलती थी। लेकिन जो मित्र मैनें कॉलेज के आखिरी सालो में बनाए उन्होंने ना सिर्फ मेरी कमियों के साथ मुझे अपनाया बल्कि उन गलतियों को सुधारते हुए हमोशा मुझे आगे बढ़ना भी सिखाया। अपने इस तीन साल के अनुभव से मैने यह सीखा कि हमारी संगत हमें अच्छा भी बना सकती है और बुरा भी।

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