सेक्स कल्चर रेप कल्चर से बेहतर है

Posted by Tasneef Haidar
July 1, 2017

Self-Published

इंटरनेट एक ऐसी जगह है जहाँ सबको अपनी पसंद का माल मिल जाता है, आप किसी मज़हब, किसी मुल्क या किसी भी पब्लिक फ़ीगर से नफ़रत करते हों या मोहब्बत। यहाँ आपको अपनी आवाज़ में आवाज़ मिलाने वाले भी मिल जाएंगे, हवाओं में एक दूसरे पर लठ चलाये जाएंगे, बंदूक़ें तानी जाएंगी और साथ ही साथ अपनी कमज़ोर सी कमज़ोर बात का भी कोई न कोई हिमायती मिल ही जाएगा। सच पूछिए तो इंटरनेट ही बेआसरा, बेसहारा और ग़रीब क़िस्म की आबादी वाले इस मुल्क में बहुत से लोगों को वक़्त गुज़ारी का बेहतरीन रोज़गार बख़्शता है। इसी इंटरनेट पर बाक़ी सारे बेकारों की तरह हमारी उंगलियां भी रक़्स करती रहती हैं, दीवानगी के इस अजीब ओ ग़रीब नाच में पांव के नीचे कोई अनोखी चीज़ आ जाए तो ज़रा देर को चौंक कर उसे देखते हैं फिर हवा में उसे बग़ैर सोचे समझे उछाल कर वापस अपने नाच या रक़्स में मसरूफ़ हो जाते हैं।

सोशल नेटवर्किंग वेब-साइट्स अब एक झगड़े लड़ाई या फ़्रस्ट्रेशन दूर करने का अड्डा बन गयी है। गाली देकर सामने वाला अपने दिमाग़ में भरा नफ़रत और झुंझलाहट का काला धुआं बाहर निकाल देता है। मगर इंटरनेट पर फैलते हुए इस काले धुएं में कहीं कहीं पोर्न वेब-साइट्स की धुंधली लाल रौशनी भी दिखाई दे जाती है। इस बदनाम ए ज़माना रेड लाइट वर्चुअल दुनिया में सभी का आना जाना है। क्या सिपाही क्या चोर, क्या मुल्ला, क्या पुजारी, क्या बेकार और क्या ब्योपारी। सभी इस रौशनी में नंग धड़ंग घूमने वाली गोरी काली हसीनाओं, मोटी, नाटी, लम्बी और पतली हर क़िस्म की औरतों के साथ सोने का सुख हासिल कर सकता है। मगर ये सुख दरअसल सुख है नहीं, ये सुख का साया है जो हासिल हो जाने के बाद और बेक़रार हो जाता है। एक बार इन गलियों में हो आइये तो यहां के नित नए तमाशे, दुनिया की अलग भाषाएं बोलने वालों की सिसकियाँ और उनके हम-बिस्तर होने के तरीक़े आँखों में एक हवाई सेज सजने लगते हैं। मेरे ख़याल में जैसा हमारा समाज इस वक़्त है, जिस में हवाई सेक्स के लिए प्रति दिन एक जी बी से लेकर अनलिमिटेड ब्राउज़िंग और डाउनलोडिंग की सहूलत देने वाली दयालू कंपनीज़ मौजूद हैं, वहां साये से बदन तक पहुँचने की ख़्वाहिश का दायरा दिन ब दिन बढ़ता जाएगा, मगर ठहरिये।

माफ़ कीजिये हम एक सभ्य समाज के लोग हैं और हमारे यहाँ मर्द या औरत के बदन को बेचने वाला ये दूसरे क़िस्म का गंदा काम नहीं होता। हम शादी करते हैं, बच्चे पैदा करते हैं और सुकून से एक लम्बी और गहरी, शांत ज़िन्दगी गुज़ारते हैं। ठंडी रेत के पहलू में सोने वाले शांत समुन्दर की तरह। इस समुन्दर में कभी कोई तूफ़ान नहीं होता, कोई हलचल पैदा नहीं होती, कोई सुनामी नहीं आती। और कैसे आ सकती है हमारा सिस्टम इतना फिट, हट्टा कट्टा और तर ओ ताज़ा है कि सेक्स को लेकर ज़्यादा विचार करने की ज़रुरत नहीं है।

हाँ अपनी पत्नियों से दूर बैठे मज़दूर, ड्राइवर, छोटे मोटे काम करने वाले मिडल और लोअर मिडल क्लास के लोग अगर कहीं रेप कर दें तो उनकी फांसी की मांग की जा सके, क्यूंकि ये प्रॉब्लम इन जैसे असामाजिक तत्वों को जड़ से उखाड़ कर फेंक देने से ही दूर हो सकती है। मैंने एक दफ़ा अपने एक दोस्त से पूछा के रेप क्यों होते हैं और ख़ास तौर पर शादी शुदा लोग रेप क्यों करते हैं, उसने कहा कि अय्याशी के लिए और क्या। मैंने कहा कि तुमने कभी इस बात पर ग़ौर क्यों नहीं किया कि शादी शुदा लोगों को आख़िर अय्याशी की क्या ज़रुरत पड़ जाती है, मर्द हो या औरत, क्या हम यक़ीन से कह सकते हैं कि उनकी सेक्चुअल लाइफ बिलकुल ठीक तरह से गुज़र रही है, उस में कोई झोल नहीं है, अंदर ही अंदर कहीं कोई ऐसी परेशानी नहीं पनप रही जो उन्हें उनकी बेसिक ज़िम्मेदारियाँ निभाने से दूर कर दे या फिर उन्हें दुनिया से बेज़ार कर दे, या उनको एक पागल और चिड़चिड़ा इंसान बना दे या फिर बहुत ही बुरे हालात में उन्हें रेप करने पर मजबूर कर दे। मैं जानना चाहता हूँ और मेरी तरह समाज की दिलचस्पी भी इस बात में होनी चाहिए कि आख़िर औरतों और लड़कियों का रेप दिन प्रति दिन इतना बे-रहम और भयानक रूप क्यों अपनाता जा रहा है, वो कौन सा ग़ुस्सा है जो किसी शराबी से न सिर्फ़ रेप करवाता है बल्कि औरत के नाज़ुक हिस्से में डंडे, सरये घुसेड़ कर उसे पीड़ा देने पर आनंदित करता है। अगर हम इस समस्या का हल रेप करने वाले को फांसी देकर निकाल सकते हैं तो ज़रूर निकालें मगर ये मसला ऐसे हल हो ही नहीं सकता। ये प्रॉब्लम न फांसी से दूर होगी न कैंडल मार्च से, न औरतों के दिल में पैदा हो जाने वाले भय से न ही घूरने पर टैक्स लगाने वाले बे मतलब क़ानून से। जो समस्या अंदर पनप रही है उसका हल बाहर ढून्ढ कर हम कौनसी कामयाबी की उम्मीद कर रहे हैं।

हम जब तक एक ऐसा समाज नहीं बना लेते, जहाँ शादी से ज़्यादा मर्द और औरत की शारीरिक ज़रूरतों का ख़याल रखने वाले सिस्टम को अहमियत हासिल हो तब तक हम यूँही चीख़ते चिल्लाते रहेंगे। क्रोध और द्वेष है तो क्यों है और किस से है ये जाने बिना कोई फ़ैसला करना मुश्किल है। एक सिस्टम बनाना होगा जहाँ सेक्स से इज़्ज़त और कमोडिटी के फैसले न होते हों, जहाँ मर्द या औरत अगर अपने पार्टनर से बिस्तर में ख़ुश नहीं हैं तो वो दूसरी राहें पैदा कर सकें और इसको बुरी निगाहों से न देखा जाए, उनकी शादियां किसी और से सिर्फ़ अपनी शारीरिक ज़रूरतें पूरी करने की वजह से न टूट जाएँ। उन्हें अपने बच्चों, बड़ों और दोस्तों या समाज को ये सफ़ाई न देना पड़े कि वो किसी और के साथ कुछ बेहतर या अकेले में समय गुज़ार कर क्यों आये हैं। ग़रीब और मध्यम वर्ग के लोगों के लिए जो ख़ास तौर पर शहरों में कमाने आते हैं अपनी ये बेसिक ज़रुरत पूरी करने का कोई इंतज़ाम होना चाहिए। क़ानून को सिर्फ क्राइम रोकने की मशीन बनाने के बजाये क्राइम पैदा करने वाली वजहों पर ग़ौर करने वाला ज़रिया भी बना कर देखा जा सकता है। ऎसी सहूलतें ख़ुद सरकार की निगरानी में अगर शुरू की जाएँ, अपनी मर्ज़ी से काम करने वाले सेक्स वर्कर्स की सर्विसेज़ ली जाएँ और इस काम को समाज में गंदी नज़र से देखने के बजाये एक ज़रूरी मामला समझा जाए।
एक ऐसा समाज होना चाहिए जिस में कोई भी बिला झझक सेक्स करने के लिए आपसे इजाज़त ले सके या आप उससे इस बारे में पूछ सकें। एक ऐसे सेक्स कल्चर की ज़रुरत है जहाँ दुसरे के इंकार की इज़्ज़त का चलन शुरू हो और अपनी ख़्वाहिश को पाने या बताने की झिझक ख़त्म हो। माना कि इस कल्चर की भी कुछ समस्याएं होंगी मगर उन पर बात की जा सकती है, मगर रेप कल्चर ख़त्म होना चाहिए क्यूंकि हम उस के ज़रिये एक इंसान को दोनों तरफ़ से ज़ख़्मी करते हैं, समाज के एक विक्टिम की तरफ़ से भी और समाज की तरफ़ से भी।

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