स्वाद, स्वार्थ या रिवाज

Posted by Jyoti Suchye
July 1, 2017

Self-Published

 

२४ सितम्बर को जब मैं दफ़्तर से निकली तो दरियागंज कि सड़को पर भीड़ ज्यादा नहीं थी क्योंकि दोपहर का वक़्त था | चारों ओर रौनक थी और हो भी क्यों ना पुरानी दिल्ली जो ठहरी |

मुझे बस पकड़नी थी कश्मीरी गेट से इसी वजह से थोड़ी जल्दी में थी | घर जाने की ख़ुशी मेरे दिल-ओ-दिमाग पर छाई हुई थी | जैसे ही बस मेरे सामने रुकी मैं जल्दी से उस में चढ़ गई | खिड़की से बाहर की चहल-पहल को मैं देख और महसूस दोनों कर पा रही थी | तभी बस अचानक रुक गई और जब मैंने आगे देखने की कोशिश की तो पाया कि यातायात बहुत धीमे था क्योंकि लालकिला मेट्रो का निर्माण चल रहा था | बस बहुत धीमी गति से आगे बढ़ रही थी और मुझे कश्मीरी गेट जाने कि जल्दी थी क्योंकि वहाँ छोटी बहन मेरा इंतज़ार कर रही थी |

तभी मेरी नज़र फूटपाथ पर बंधी एक लम्बी रस्सी पर पडी जिससे करीबन ५०० बकरी बंधी हुई थी | बकरियों का रंग काला व सफ़ेद था परन्तु हर बकरी के शरीर पर भिन्न तरह की आक्रतियाँ थी | वही पर दो बच्चे अपने अम्मी-अब्बु के साथ  एक सफ़ेद बकरी को घास खिला रहे थे तभी उनके अब्बु ने कुछ रुपये एक युवक के हाथ में थमाए और बकरी लेकर चल पड़े | दोनों बालक बकरी के साथ-साथ उतनी ही चंचलता से कूद कूदकर चल रहे थे जितना की बकरी | अचानक दिमाग में आया अरे कल बकरी ईद है |

फिर उसके बाद मेरी आँखे खुली रह गयी और चेहरा मायूसी और उदासी के दरिया में डूब गया और याद आया कि आखिरी रात है इन सभी की | इन्हें क्या मालुम है कि जितने प्यार से वो इनको घास खिला रहे हैं वो ही इनकी जान लेंगें और तुम फिर उनका भोजन बन जाओगी | इसी सोच में डूबी हुई मैं बस से कश्मीरी गेट उतर गयी | ये आखरी रात क्या सिर्फ बकरियों की थी या फिर हर दिन ये आखिरी रात किसी मुर्गे, ऊंट, गाय, भैस या अन्य किसी जानवर की होती है परन्तु इन सबकी जान की बात कभी कोई क्यों नहीं करता हैं |

राजस्थान सरकार ने पिछले वर्ष ही रेगिस्तान के जहाज कहे जाने वाले पशु ऊंट को राज्य पशु घोषित किया था क्योंकि ऊंटों की संख्या में लगातार गिरावट दर्ज की गई थी | इसके साथ ही अब ऊंट को मारने वाले को कम से कम एक साल की सजा भुगतनी पड़ेगी । इस नियम के चलते भी १५० ऊंटों को राजस्थान से भारत के दक्षिण राज्यों में ले जाया गया बकरी ईद के उपलक्ष में | बकरी  ईद के लिए केवल बकरी की ही बली देने का नियम है तो फिर ये ऊंट क्यूँ? अगर इसी प्रकार चलता रहा तो भविष्य में रेगिस्तान का जहाज लुप्तप्राय प्रजातियों में से एक होगा |

हत्यारे का कोई धर्म नहीं होता | हिंदुत्व के नाम पर दहशत फ़ैलाने वाले लोग जो भैंस या गाय की पूजा भी करते है और दूध ना देने पर उसे कुछ पैसों के लालच में बेच देते है हत्यारे तो वो भी हैं फर्क सिर्फ इतना है कि वो हत्या का इल्ज़ाम खुद पर नहीं लेना चाहते | उन लोगों में इतना भी सामर्थ्य नहीं है कि जिस पशु ने सदैव परिवार को पोषित किया है उसे हम बिना किसी स्वार्थ के अपने पास रख सके |

हर जीव एक समान हैं और उसकी जान लेने का अधिकार किसी को नहीं है  चाहे वो फिर कोई मनुष्य, कुत्ता, गाय, बिल्ली, ऊंट, मुर्गा या अन्य कोई जीव हो | यदि आपने अपने घर में कभी किसी पशु को पाला है तो आपको एहसास होगा और उन्हे भी एहसास होगा जो बोलते है कि फल और जीव हत्या एक बराबर है |

कुछ लोगो का मानना है कि भोजन चक्र को संतुलित रखने के लिए ये सब आवश्यक है परन्तु उन्हें ये ज्ञात नहीं है कि इस भोजन चक्र को संतुलित रखते-रखते वो इतने आगे बढ़ गये है कि उन लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए अलग-अलग आधुनिक तकनीक प्रयोग हो रही है |

नोट– यह मेरी व्यक्तिगत राय है | आपके सुझाव माननीय है |

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