हिंदी भाषी हो तो प्रवेश नहीं मिलेगा !

Posted by Arvind Bauddha
July 25, 2017

Self-Published

बेटी बचाओ बेटी पढाओ मोदी सरकार की महिला सशक्तिकरण के लिए  सबसे महत्वाकाक्षी योजना है जिसे मैंने अखबारों ,मन की बात कार्यक्रम तथा टीवी चैनलों में हमेशा सुनती रही हूँ .सुनकर अच्छा लगता था की कितना अच्छा है की भारत की बेटियां भी पित्रसत्तात्मक समाज से बाहर निकल कर आगे पढेगी  .सरकार की इस पहल को सुनकर हमेशा मेरे मन में एक अजीब सी मुश्कराहट खिल आती थी ,कि मेरी जैसी गरीब, दलित परिवार से आने वाली लड़की दूसरी लड़कियों की तरह पढ़ सकेगी !  हर साल सरकार महिला शसक्तीकरण के लिए नयी योजनाये बनाती है .

 

मेरा नाम अभिलाषा वर्मा है मैं उत्तर प्रदेश के सुखा प्रभावित जिले बाँदा (बुंदेलखंड) जिले के गाँव की  रहने वाली हूँ .मैंने प्रारंभिक  अपनी  पढाई गाँव के  सरकारी स्कूल से पूरी की है . हमारे गाँव में केवल कक्षा आठवी तक ही सरकारी स्कूल है  वहां  आठवी तक  पढ़ने के बाद मैंने अपने गाँव से 10 किमी दूर स्थित राजकीय बालिका इंटरकालेज  में  मैंने  विज्ञान विषय में एड्मिसन लिया क्योकि  मुझे विज्ञान पढ़ना अच्छा लगता था  . राजकीय बालिका इंटर कालेज की छात्र संख्या लगभग 600 के करीब थी जिसमे महिला शिक्षकों की संख्या महज 10 ही थी सभी को जमीन में टाट या दरी में बैठना पड़ता था ,जहाँ  इतने बड़े स्कूल में एक ही टॉयलेट था .फिर भी मेरे लिए यह जगह जन्नत जैसे थी नए लोग ,नयी पढाई थी .

स्कूल गाँव से दूर था तो इसी कारण यहाँ ज्यादातर  लडकियां आठवीं के बाद  अपनी पढाई बंद कर देती है और या तो उनकी शादी हो जाती है या फिर घर के कामो में लग जाती है मैंने किसी तरह गाँव से हिम्मत करके स्कूल जाने की ठानी थी .मैं रोज साईकिल से 10 किमी का सफ़र करके स्कूल पहुचती थी . यहीं से इसी साल मैंने अपनी दसवीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की है .मैं अपने गाँव की एकमात्र लड़की हूँ जिसने विज्ञान वर्ग से दसवीं उत्तीर्ण की है , मुझे आगे मेडिकल की पढाई करके डाक्टर बनना  है जिस कारण मुझे आगे साइंस स्ट्रीम से ही पढ़ना होगा .

लेकिन यश तो इस  क्षेत्र का एकमात्र लड़कियों के लिए इंटरमिडिएट कालेज था जहाँ पर कक्षा दसवी के बाद साइंस स्ट्रीम  नहीं है .

 

आगे पढने के लिए मुझे साइंस लेना  था जिसके लिए मेरा बाहर जाना जरुरी था या फिर मैं भी दूसरी लड़कियों की तरह घर मे बैठ जाती .मेरे पास दो ही रास्ते बचे थे .मेरे बड़े भैया जो  अम्बेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली से ग्रेजुएशन कर रहे है उन्होंने जब ऐसी स्थिति पता चली तो उन्होंने मुझे अपने पास दिल्ली बुला लिया . दिल्ली आना मेरे लिए दूसरी दुनियां जैसा था अब था एड्मिसन कहाँ कराया जाय .हमने यहाँ 11 वीं में एडमिशन के लिए स्कूलो के बारे में पता किया और वहां  गए सभी कानवेंट,मिशनरी स्कूल गए जो प्रायः  इंग्लिश मीडिएम् थे , हम दोनों वहां गए तो पता चला की यह तो अजीब किस्म के नियम कानून है .

एक कहता था की हम यूपी बोर्ड वालो को नहीं लेंगे तो दूसरा कहता था की हम लेंगे लेकिन 90 प्रतिशत से ऊपर मार्क्स होने चाहिए जबकि सीबीएसई  की छात्राओं का 75 प्रतिशत में ही ले रहे थे  क्योकि वह लोग दिल्ली के ही रहने वाले थे .कोई कहता की हम बाहरी  यानि दूसरे स्टेट की लड़कियों को यहाँ  प्रवेश नहीं देते है, कोई कहता हिंदी भाषी लोगो को प्रवेश नहीं देते है .  हम सुबह से लेकर शाम तक स्कुलो के चक्कर ही लगा रहे है .यहाँ न तो कोई मेरिट और न ही प्रवेश परीक्षा होती है सब अपने आप ही प्रवेश देते है . लगभग १५ दिन से ऐसे ही चक्कर लगा रहे है लगभग पूरी दिल्ली घूम चुके है .

अब तो ये लगता है की अब यहाँ भी मेरा एडमिशन नहीं होगा और मैं फिर से घर में बैठ जाउंगी . क्या क्या मेरा एडमिशन मेरे प्रदेश ,गरीबी ,जाति ,भाषा के आधार  पर नहीं किया जा रहा है क्या मैं इसलिए नहीं पढ़ पाऊँगी की मेरा जन्म भारत के गाँवो में हुआ है ,जहाँ पर आगे पढ़ने के लिए स्कूल नहीं है यह तो मेरी गलती नहीं है ? दुनियां के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश की राजधानी  दिल्ली सबके लिए है जहाँ से सभी के सपने पूरे होते है जो महिला शसक्तीकरण की ज्वलंत मिशाल है

यहाँ  आये मुझे 20 दिन हुए है मैंने देखा है यहाँ की लड़कियां कितनी शौभाग्यशाली  है की उनका जन्म यहाँ हुआ है उन्हें कितनी सुविधाएँ जन्म से ही मिल गयी है . यहाँ मेट्रो में अलग वीमेन कम्पार्टमेंट ,बसो में वीमेन  सीट ,कैब, हर जगह लड़कियों ,महिलाओं को अलग से सुविधाएँ दी गयी है.| यहां की सड़के,स्कूल,विस्वविद्यालय,मेट्रो,डीटीसी की बस सर्विस, सब कितना सुविधाजनक है . काश हमारे देश के गाँवो में भी ऐसा होता तो  मुझे 1000 किमी दूर इस शहर में नहीं आना पड़ता ?

रेडिओ ,टीवी.अखबार,  किताबों में कितनी समानता , समाजिक न्याय ,लिंग समानता ,शैक्षिक समानता  की बात करते है .सरकार राईट टू एजुकेशन की बात करती है  सुप्रीम कोर्ट ने कानून भी बनाया है सरकार की बेटी बचाओ बेटी पढाओ कार्यक्रम भी बनाया गया है अब सवाल उठता है यह  किसके लिए है अमीरों के लिए या केवल बड़े शहरों में रहने वालो के लिए ?मजदूर, किसान, गरीब ,दलितों बच्चे क्या इनको अच्छे स्कूलों में पढ़ने का हक़ नहीं है ? क्या मेरा एड्मिसन होगा या मुझे ऐसे ही वापस अपने गाँव जाना पड़ेगा ?

[ यह कहानी अभिलाषा और उसके भाई जीतेन्द्र की आपबीती बताने पर लिखी गयी है | जिसे मैंने NYT पर लिखी है अगर अगर आप कोई सहायता करना चाहते है तो नीचे कमेन्ट बॉक्स में बता सकते है ]

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