अल्पसंख्यक हूं साहब, अपने देश की भीड़ से डरता हूं

आज जगह-जगह, भीड़ अपना परचम लहरा रही है और कहने की ज़रूरत नहीं कि ये कैसे और किसको अपना शिकार बना रही है। सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही नफरत और सदियों की विचारधारा जो ‘हम’ और ‘वह’ में समाज को बांटती रही है जैसे कई तथ्य हैं जिनका इस भीड़ को समझने के लिए अध्ययन करना बहुत ज़रूरी है। इस भीड़ पर आज किसी तरह का कोई नियंत्रण नहीं दिख रहा है। जंतर-मंतर से लेकर देश की बाकी कई जगहों पर इसके विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं जहां लोग इसके खिलाफ अपनी नाराज़गी ज़ाहिर कर रहे हैं। आज हर खबर इस भीड़ तक ही सीमित है, लेकिन इस भीड़ के बाद का समाज कैसा होगा?

इस बात पर कोई जानकारी जुटा सकता है तो कोई अपने निजी विचार रख सकता है, लेकिन अपना अनुभव वही कह सकता है जो इससे गुज़रा हो। ये घटना 2012 और 2014 के बीच की है, मैं अपने परिवार के साथ एक जगह सिनेमा देखने गया था, जहां गाड़ी पार्क करके बड़े से ग्राउंड में लगी बड़ी स्क्रीन पर आप फिल्म देख सकते हैं। मेरे गाड़ी पार्क करने के कुछ ही समय बाद पीछे एक और गाड़ी आकर पार्क हो गई।मुझे नहीं पता कि उन्हे क्या आपत्ति थी, मेरी उनसे थोड़ी सी ही बात हुई थी कि उन्होंने कहा, “आप तो होते ही हो ऐसे?” इसका क्या मतलब था?

मेरे भाई ने केश कटाकर रखे हैं और मैने पगड़ी बांधी हुई थी। मेरी पहचान देखकर ये अंजान शख्स किसे कह रहा था कि आप ऐसे ही होते हैं? यकीनन ये व्यक्तिगत नहीं बल्कि मेरी समुदाइक पहचान पर एक तरह का प्रहार था। लेकिन इस तरह की मानसिकता का जन्म कैसे हुआ? हमारे परिवार ने 1984 भी भुगता है और 2002 की आगजनी भी अपनी आँखों से देखी है, इसलिये कहीं भी बहस ना करने की और हाथ जोड़कर माफ़ी मांगकर चले जाने की कवायद हमारे परिवार में है। लेकिन उस दिन मेरी उम्रदराज़ माँ और मेरे दोनों बेटे जो उस समय कुछ 5 और 3 साल के थे, उन पर इस कटाक्ष का क्या असर हुआ होगा?

इस शहर और समाज की तारीफ़ की जानी चाहिए जिसने अक्सर हमें अपनाने का दम भरा है। शायद तभी हम इस शहर में देश की आज़ादी के बाद से मौजूद हैं, लेकिन अक्सर बचपन में क्रिकेट के मैदान में मुझे आंतकवादी कहा जाता था। कहने को तो ये मज़ाक था लेकिन कहीं ना कहीं ये मेरे समुदाय के प्रति समाज की मानसिकता को भी दर्शाता था। 1984 के ऑपरेशन ब्लूस्टार और सिख दंगो के बाद किसी से वैचारिक मतभेद के बाद जब तर्क की गुंजाईश खत्म हो जाती थी तो मेरी धार्मिक पहचान को आधार बनाकर ही मुझ पर शब्दों के वार किए जाते थे।

इन सब घटनाओं ने मेरे अन्दर एक घुटन को जन्म दे दिया था और मेरा यही सवाल था कि मैं और लोगों से अलग कैसे हूँ? ये देश और समाज, मेरा भी तो है, फिर मैं दुसरों से कैसे अलग हूं? आज वक़्त बदल चुका है, लेकिन सोशल मीडिया के इस युग में भी मेरे लिए काफी कुछ पहले जैसा ही है। कुछ समय पहले ही इसरो ने सार्वधिक उपग्रहों (सेटेलाइट्स) को एक ही उड़ान में लेकर जाने का विश्व रेकॉर्ड बनाया था और इस पर सभी को गर्व हुआ था। इस उड़ान में मुख्य उपग्रह का कुल वजन बाकी के सभी उपग्रहों की तुलना में बहुत ज़्यादा था। सोशल मीडिया पर मेरे इस तथ्य को रखने मात्र से ही ऐसे व्यक्तिगत कमेंट आए जिनसे एक बार फिर उसी सोच का परिचय हो रहा था। ये वही सोच थी जो मुझे अनुभव करवाती थी कि मैं मुख्य समाज से अलग हूं। ये उसी सोच का एक उदाहरण था जो व्यक्तिगत ना होकर पूरे समुदाय को निशाना बनाती है।

इसके बाद हुई एक बड़ी घटना ने मुझे काफी हद तक बदल दिया। 2015 से पहले मैं अक्सर मेरे आस-पास की धार्मिक पूजाओं में शामिल रहता था, मुझे इनसे कोई आपत्ति नहीं थी। अगर यही धर्मनिरपेक्षता का मापदंड है तो शायद मैं धर्मनिरपेक्ष था। फिर 2015 में पंजाब में सिखों के लिए सबसे पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब के पावन अंग (पेज) फाड़कर गलियों में फेंके गए, जिससे सारा सिख समुदाय आहत हुआ और इस घटना ने मुझे भी झंझोड़ दिया था। इसके बाद मैंने सिख इतिहास और नियमों का एकबार फिर कट्टरता से पालन करना शुरू कर दिया। सिख धर्म में गुरु ग्रंथ साहिब की पावन गुरबाणी के सिवाय किसी भी आकार की पूजा मान्य नही है। तो मैंने भी हर अन्य तरह की पूजा में शामिल होना बंद कर दिया। अचानक से अब मैं धर्मनिरपेक्ष नही रह गया था, जो चेहरे हंसते हुए मिलते थे अब उनका बर्ताव बदल गया था।

ऑपरेशन ब्लूस्टार एक बहुत बड़ा कारण था जिसने पंजाब के कई युवाओं को हथियार उठाने के लिये मजबूर कर दिया था। 2002 के दंगों के बाद देश में कई आत्मघाती और आंतकवादी हमले हुए, लेकिन ये दहशतगर्द कैसे पैदा हुए? इस पर कोर्ट में दिल्ली पुलिस द्वारा रखी गयी एक रिपोर्ट पढ़ने की ज़रूरत है। इसमें कहा गया है कि 2002 के गुजरात और 2012 के मुजफ्फरनगर के दंगों की बाद और अधिक युवा आतंकवाद की और मुड़े हैं।

आज इस भीड़ को शायद थोड़ा सा क़ानूनी बल के इस्तेमाल से रोका जा सकता है और भीड़ द्वारा होने वाली घटनाओं में काफी कमी आ सकती है। लेकिन मेरा मानना है कि कुछ समय तक अगर भीड़ का यही उग्र रूप बना रहा तो सुरक्षा बल भी इसे रोकने में नाकामयाब रहेंगे। भीड़ द्वारा हो रही ये घटनाएं भी अपने निशान छोड़ रही हैं और इनके परिणाम भी कुछ साल बाद हमें देखने को मिल सकते हैं। लेकिन उस समय हम ये नहीं कह पाएंगे कि इनका दोषी हमारा ही समाज है। व्यक्तिगत रूप से गुरु ग्रंथ साहिब की घटना के बाद मैं संभल गया मुझे कलम का सहारा मिला, लेकिन मेरे कदम भी बहक सकते थे। आज इस भीड़ को रोकने की सख्त ज़रूरत है अन्यथा बहुत से कदम बहकेंगे और उन्हे ना तो हमारा समाज संभाल पाएगा और ना ही उनके सवालों के जवाब दे पाएगा।

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