क्या अंबानी और रोम के ग्लैडियेटर्स के बीच की सिमिलैरिटी के बारे में जानते हैं आप

Posted by Sumant mid in GlobeScope, Hindi, History
July 25, 2017

लाखों लोगों को ज़िंदगी भर जियो की मुफ़्त सेवा देने के खेल तथा रोम में ग्लैडियेटरों के रक्तरंजित खेल के मुफ़्त आयोजन के बीच कोई संगति है क्या ?

आपने यदि रोम की यात्रा की हो तो वहां विश्वविख्यात एम्पिथियेटर के खंडहरों को देखना न भूले होंगे ? दास-व्यवस्था पर आधारित रोम की ‘ महान ‘ सभ्यता में वहां के अधिसंख्य लोग भयावह ग़रीबी और बेरोजगारी की ज़िंदगी जीते थे। वहीं, मुट्ठीभर ताक़तवर सामंत, दरबारी आदि अपार भोग-विलास में रात-दिन डूबे रहते थे। मगर, उन्हें डर हमेशा बना रहता था कि ये गरीबी-बेरोज़गारी में जानवरों की तरह जीने वाले आवारा लोग कहीं इस ‘ महान ‘ रोमन-सभ्यता के विरुद्ध विद्रोह का झंडा न खड़ा कर दें ! अतः उन्होंने उनका ध्यान दंगा-फसाद या विद्रोह की तरफ़ से भटकाने के लिए एक नायाब उपाय ढूंढ निकाला।

यह उपाय था उन्हें बड़े पैमाने पर मुफ़्त मनोरंजन के खेल में उलझा देना। इसके लिए पूरे रोम में बडे-बड़े एम्पिथियेटर का निर्माण करवाया गया। ये एम्पिथियेटर आजकल के हमारे स्टेडियम की तरह के होते थे। चूंकि रोम में दासों की कमी नहीं थी, उन्होंने ग्लेडियेटरों अर्थात दासों के ऐसे लड़ाकू-दस्ते तैयार किये जिन्हें उन एम्पिथियेटर में उतर कर आपस में तब तक लड़ना होता था जब तक कि उनमें से कोई एक मारा न जाता। कहना न होगा कि यह उपाय बहुत हद तक कारगर रहा !

ग्लैडियेटरों के इस रोमांचक ख़ूनी खेल को देखने के लिए रोमवासी अपने सारे दुःख-दर्द को भूल कर टूट पड़ते थे ; प्रवेश जो बिल्कुल मुफ़्त था ! ( वैसे, यह इतिहास पढ़ने की ज़रूरत है कि मनोरंजन की यह मुफ्त व्यवस्था आगे चल कर रोम की ‘ महान ‘ सभ्यता के लिए कितनी विनाशकारी साबित हुई ! )

अब आते हैं अपने देश भारत पर। यह बात जगजाहिर हो चुकी है कि मोदी-सरकार के आने के बाद देश की अर्थव्यवस्था, औद्योगिक उत्पादकता, रोजगार-सृजन आदि में भारी गिरावट आयी है। सेन्टर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी रिपोर्ट के मुताबिक़ कुख्यात नोटबंदी के मात्र कुछ महीनों के भीतर ही तकरीबन 15 लाख लोग अपनी नौकरी गंवा बैठे हैं और जिसके चलते 60 लाख लोगों का भरन-पोषण ख़तरे में पड़ गया है। धार्मिक-साम्प्रादायिक उन्माद उफान पर है ; महानगरों से नौकरी गंवाये लोग बड़े पैमाने पर गांवों की ओर पलायन कर रहे हैं। मंहगाई आसमान छू रही है। दूसरी तरफ़, कुछ चहेते कॉरपोरेट घरानों की काली कमाई में ( जिसमें बैंकों के अरबों-खरबों रू की लूट भी है ) बेतहाशा वृद्धि हो रही है। उन्हें कमाई करने वाले सरकारी उद्योग-धंधे, सार्वजनिक परिसम्पत्तियां तथा आदिवासियों की जमीनें आदि औने-पौने भाव में बेची या सुपुर्द की जा रही हैं !

ऐसे में, लाखों-करोड़ों देशवासी बेरोज़गारी-छंटनी-महंगाई-भ्रष्टाचार-दगों आदि की मार से तंगो-तबाह हो रहे हैं ; उनमें शासन के ख़िलाफ़ तीव्र आक्रोश व्याप्त है। नौजवानों में तो और अधिक बेचैनी है ! जगह-जगह लोग सड़कों पर उतर रहे हैं ; संगठित हो रहे हैं। सरकार और पूंजीपतियों के लिए यह भारी ख़तरे की घंटी है ! और, संकट की ठीक इसी घड़ी में देश के सबसे बड़े अरबपति अंबानी को यह नायाब आइडिया सूझा कि तंग-तबाह लोगों को क्यों न जियो का 4जी स्मार्टफोन मुफ़्त थमा दिये जायें, जबकि अभी उन्हें सौ-सवा सौ रू.के भाव से टमाटर खरीदने पड़ रहे हैं ?

कहने की ज़रूरत नहीं कि इसका भारी दूरगामी असर पड़ेगा ! इस वक्त ही, जब मंहगे स्मार्टफोन / नेट चार्ज आदी के भुगतान करने पड़ते हैं, देश के लाखों लोग ख़ास तौर पर नौजवान अपने स्मार्टफोन से ज्यादा से ज़्यादा समय तक चिपके रहते हैं ! ज़ाहिर है, जब उनके हाथ मुफ़्त के स्मार्टफोन वह भी 4जी डाटा सुविधा वाला, लग जायेगा तब तो वे अपनी सारी समस्याओं, सारी परेशानियों को दरकिनार करके मनोरंजन के इस अथाह समंदर में रातदिन गोते लगाते रहेंगे ! विद्रोह आदि की सोचने की फ़ुर्सत ही भला किस कम्बख्त को रह जाएगी ?

चतुर अंबानी ने ( और शायद अडानी तथा मोदी भक्तों की भी सलाह शामिल हो ) शायद यही सब सोचकर देश की बेचैन / बेहाल जनता के लिए इस कारामाती खेल को सामने लाया होगा ? मैं नहीं जानता इस योजना के पीछे अंबानी की इतिहास चेतना की भी कोई भूमिका है या नहीं लेकिन वह अनायास रोम के उस इतिहास प्रसंग से तो जुड़ ही जाते हैं जिसने अंततः महान स्पार्टाकस-विद्रोह का सृजन किया था ! अब देखना यह है कि अब तक की सबसे विकट संकट से बुरी तरह घिरी भारतीय जनता को मुहैया कराने वाली अबांनी की यह मुफ़्त कारामाती सेवा कब और क्या गुल खिलाती है ?

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