राजीव गांधी चाहते तो शायद सुलझ चुका होता राम मंदिर विवाद

अगर उस वक्त राजीव गांधी ने चंद्रशेखर की सरकार से समर्थन वापस ना लिया होता तो शायद बाबरी मस्जिद का ढांचा महफ़ूज़ रहता और कश्मीर के मसले का भी निपटारा हो गया होता।

राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान जब विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार में अयोध्या से रथयात्रा की शुरुआत करने वाले भाजपा के कद्दावर नेता लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ़्तार कर लिया गया था, तब भारतीय जनता पार्टी ने वीपी सिंह की सरकार को गिरा दिया था।

The disputed Babri Masjid is now property of the administration.
The disputed Babri Masjid is now property of the administration.

राजीव गांधी की पहल पर चंद्रशेखर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बने और कुछ ही महीनों के भीतर उन्होंने विश्व हिंदू परिषद (VHP) और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी (BMAC) के लोगों से मुलाकात की थी।

चंद्रशेखर ने विहिप के नेताओं से साफ तौर पर कहा था कि अगली बार गोली चलवाने के लिये वो किसी मुख्यमंत्री के कंधे का इस्तेमाल नहीं करेंगे, ख़ुद ऑर्डर देंगे गोली चलाने का अगर किसी ने बाबरी मस्जिद के उस ढांचे को छुआ भी।

इसी तरह मुस्लिम नेताओं से भी उन्होंने कहा था कि बातचीत से ही ये मसला हल करना बेहतर रहेगा, खून-खराबे से किसी को कुछ नहीं मिलने वाला।

तब से अब तक शायद ये ऐसा पहला मौका रहा हो जब कोई भारत का पीएम इस तरह से बिना किसी बैरीकेडिंग के यानि डाइरेक्ट हिन्दू-मुस्लिम दोनों पक्ष के लोगों से मिला हो और उन्हें चेतावनी भी दी हो! इसके कुछ ही दिनों के बाद बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी और विहिप के लोग बातचीत से विवाद का हल ढूंढने को राज़ी हो गये थे।

मुसलमान मान गए थे कि ये जगह वो हिंदुओं को दे देंगे, बशर्ते इसके बदले में दूसरी ज़मीन मिल जाए बाबरी मस्जिद बनाने के लिए और एक क़ानून पास हो जाए कि काशी और मथुरा वग़ैरह में इस तरह की मांग नहीं उठेगी। मतलब 15 अगस्त 1947 को जो मंदिर था वो मंदिर रहेगा और जो मस्जिद थी वो मस्जिद रहेगी।

दरअसल, BMAC और VHP की बैठकों के दौरान शरद पवार मौजूद रहते थे और इसकी सारी सूचना राजीव गांधी तक पहुंचती रहती थी।जब ये बात शरद पवार ने राजीव गांधी को बताई कि बाबरी मस्जिद विवाद का निपटारा तो बस होने ही वाला है, तब इन्होंने तपाक से चंद्रशेखर सरकार से समर्थन वापसी का ऐलान कर दिया! इस तरह चंद्रशेखर को कुछ ही महीनों के बाद अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा था।

बाद में राजीव गांधी के मार्फ़त शरद पवार के लाख मनाने पर भी चंद्रशेखर नहीं माने और ये कहते हुए वो अपने इस्तीफ़े की बात पर अड़े रह गए कि जाओ और राजीव से कह दो कि चंद्रशेखर एक दिन में तीन बार अपने फ़ैसले नहीं बदलता।

इस तरह भारत ने एक ऐसा सादा, ईमानदार, ख़ुद्दार, फक्कड़ समाजवादी पीएम खो दिया था जो मुल्क के दो अहम और ज्वलंत मुद्दों को महीनों में निपटाने का माद्दा रखता था। जिसे हल होने ही नहीं दिया गया, क्योंकि अगर 6 दिसंबर 1992 से पहले बाबरी मस्जिद का मुद्दा हल हो गया होता तो मस्जिद का ढांचा कैसे ढहाया जाता? बीजेपी की वोटों की राजनीति कैसे चमकती? कश्मीर घाटी में अमन का दरिया कैसे बह रहा होता…और भी बहुत कुछ मुमकिन था, अगर कांग्रेस लंगड़ी ना मारती और चंद्रशेखर को आज़ाद काम करने देती।

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