सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी कब होगी ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए अफॉर्डेबल

Posted by Umesh Kumar Ray in Cake, Gender & Sexuality, Hindi
July 22, 2017

35 वर्षीय श्याम (बदला हुआ नाम) पिछले 5 साल से सेक्स रिअसाइनमेंट सर्जरी (एसआरएस) कराना चाह रहे हैं, लेकिन आर्थिक कारणों से ऐसा नहीं करवा पा रहे हैं। सर्जरी नहीं होने से उन्हें शारीरिक रूप से एक चरित्र को जीना पड़ रहा है, तो मानसिक तौर पर दूसरे चरित्र को।श्याम ट्रांसजेंडर हैं, उनकी शारीरिक बनावट तो लड़के की है लेकिन मानसिक तौर पर वो खुद को एक लड़की मानते हैं। श्याम अकेले व्यक्ति नहीं हैं, जो चाहकर भी एसआरएस नहीं करवा पा रहे हैं। उनके जैसे हजारों ट्रांसजेडरों के लिए यह सर्जरी दूर की कौड़ी साबित हो रही है।

2011 की जनगणना के अनुसार भारत में ट्रांसजेंडरों की संख्या 4,87,803 है। इनमें से कितने लोगों ने एसआरएस करवाया है, इसका आधिकारिक आंकड़ा ना तो सरकार के पास है और ना ही ट्रांसजेंडरों को लेकर काम करने वाली संस्थाओं के पास। लेकिन एक अनुमान के मुताबिक ऐसे लोगों की संख्या 10 फीसदी से भी कम होगी।

एसआरएस एक सर्जरी है, जिसके तहत लैंगिक बदलाव किया जाता है। अगर एक व्यक्ति का शारीरिक ढांचा पुरुष जैसा है लेकिन वह एक महिला की तरह महसूस करता है तो वह एसआरएस करवाकर अपना सेक्स चेंज करवा सकता है। वहीं, शारीरिक ढांचा महिला जैसा होने की सूरत में भी सेक्स चेंज करवाकर पुरुष हुआ जा सकता है। इसके लिए तीन-चार चरणों में सर्जरी होती है।

ट्रांसजेंडर लोगों की संख्या 4 लाख से अधिक होने के बावजूद सर्जरी का प्रतिशत 10 से भी कम होने के पीछे कई वजहें हैं। इनमें सबसे बड़ी वजह आर्थिक कारण हैं। एसआरएस पर डेढ़ लाख से 10 लाख रुपये तक खर्च होते हैं। ट्रांसजेंडर कम्युनिटी के लिए इतनी बड़ी रकम का जुगाड़ कर पाना बहुत मुश्किल होता है। इसके पीछे दो बड़े कारण हैं, अव्वल तो उन्हें पारिवारिक सहयोग नहीं मिलता और दूसरा अधिकांश लोगों के पास आय का कोई स्रोत नहीं है। पश्चिम बंगाल में एसआरएस सॉल्यूशंस चलाने वाली तीस्ता दास कहती हैं, “हमारे पास कम से कम 7 से 8 ऐसे लोग हैं, जो सर्जरी करवाने के इच्छुक हैं, लेकिन उनके पास रुपये नहीं हैं।”

तीस्ता दास ट्रांसजेंडर महिला हैं, उन्हें भी सेक्स चेंज करवाने के लिए काफी पापड़ बेलने पड़े। लेकिन उनके साथ अच्छी बात यह थी कि उन्हें परिवार से सहयोग मिला। ट्रांसजेंडरों की समस्याओं के मद्देनजर उन्होंने एसआरएस सॉल्यूशंस के ज़रिये एसआरएस करवाने के इच्छुक ट्रांसजेंडर लोगों को मशविरा व दूसरी तरह के सहयोग देने का फैसला लिया। 2011 की जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल में ट्रांसजेंडरों की संख्या 30,349 है लेकिन 2 से 3 प्रतिशत लोगों ने ही सर्जरी करवाई है।

एसोसिएशन ऑफ ट्रांसजेंडर/हिजड़ा इन बंगाल की सचिव रंजीता सिन्हा बताती हैं, “रुपयों के अभाव में बहुत-से लोग सर्जरी नहीं करवा पा रहे हैं। ऐसे में राज्य सरकारों को चाहिए कि वह सर्जरी में सब्सिडी दे या फिर सरकारी अस्पताल में यह सुविधा मुहैया करवाए। लेकिन अफसोस की बात है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद राज्य सरकारों में कोई सुगबुगाहट नहीं है।”

दूसरी तरफ, उनके परिजन सर्जरी कराने में आर्थिक मदद करना तो दूर, कागजी काम करवाने के लिए भी उनके साथ अस्पताल नहीं जाते हैं। किसी परिवार में ट्रांसजेंडर का जन्म लेना उस परिवार के लिए शर्मनाक हादसा होता है, जिसे परिवार हर कीमत पर सार्वजनिक होने से बचाने की कोशिश करता है। इस कोशिश में कई बार ट्रांसजेंडर लोगों का पारिवारिक बहिष्कार भी कर दिया जाता है।

आर्थिक समस्या और पारिवाारिक असहयोग के साथ ही एक और समस्या है, जो ट्रांसजेंडर लोगों को ऑपरेशन थियेटर तक जाने से रोक रही है। यह समस्या है प्रशिक्षित डॉक्टरों व काउंसलरों का अभाव और साथ ही डॉक्टरों द्वारा सर्जरी करने पर होने वाले नुकसान से पल्ला झाड़ लेना।

रंजीता सिन्हा ने कहा, “एक तो अच्छे सेंटरों की कमी है और जो हैं वहां के डॉक्टर सर्जरी करने से पहले ही फरमान सुना देते हैं कि अगर सर्जरी ठीक नहीं हुई और कोई नुकसान हो गया, तो वे इसकी जिम्मेवारी नहीं लेंगे। डॉक्टर बकायदा बांड पेपर पर लिखवा लेते हैं। ऐसे में भला कौन सर्जरी कराना चाहेगा?”

पश्चिम बंगाल में सर्जरी ने कई ट्रांसजेंडरों की ज़िंदगी बिगाड़ दी है। रंजीता सिन्हा ने कहा कि ऐसे मामलों में मरीज़ नुकसान की भरपाई के लिए कोई दावा भी नहीं कर पाता है, क्योंकि डॉक्टर पहले ही अपने दायित्व से फारिग हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि पश्चिम बंगाल में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है और कोई मजबूत ढांचा नहीं है, जो यह बताए कि सर्जरी परफेक्ट हुई है कि नहीं। न मेडिक्लेम की सुविधा है और न ही सर्जरी को लेकर कोई सख्त गाइडलाइन।

वैसे दक्षिण भारत के एक-दो राज्यों को छोड़ दें, तो अधिकतर राज्यों में कमोबेश यही स्थिति है। ट्रांसजेंडर लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है। यह हाल तब है, जब तीन साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने टांसजेंडरों को थर्ड जेंडर का दर्जा दे दिया था। विशेषज्ञों की मानें तो सर्जरी नहीं हो पाने से ट्रांसजेंडर लोगों पर मनोवैज्ञानिक असर पड़ता है, क्योंकि उन्हें शारीरिक और मानसिक तौर पर दो अलग-अलग चरित्रों के साथ समंजस्य बिठाना पड़ता है। यह उनके लिए बेहद दर्दनाक स्थिति होती है। कई बार यह स्थिति उन्हें आत्महत्या की चौखट पर ला खड़ा करती है।

जाने माने मनोरोग विशेषज्ञ व कोलकाता के एसएसकेएम अस्पताल के साइकेट्री डिपार्टमेंट के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. सुजीत सारखेल कहते हैं, “सर्जरी नहीं करवाने से वे एडजस्टमेंट डिसऑर्डर के शिकार हो जाते हैं। अगर किसी का शारीरिक ढांचा पुरुष का है, लेकिन अंदरूनी एहसास महिला जैसा है, तो वह चाहकर भी महिलाओं वाले कपड़े नहीं पहन पाता है। यही दिक्कत महिला के शारीरिक ढांचे वाले के साथ भी आती है।” वह आगे कहते हैं, “सर्जरी नहीं होने से वे अपनी इच्छाएं पूरी नहीं कर पाते हैं और उन्हें एक कड़े संघर्ष से गुजरना पड़ता है, जो कई बार उन्हें आत्महत्या के लिए भी मजबूर कर देता है।”

तीस्ता दास भी मनोरोग विशेषज्ञ की बातों से इत्तेफाक रखती हैं। उन्होंने बताया, “ट्रांसजेंडर लोगों में एक अजब सी छटपटाहट होती है दोहरे चरित्र से बाहर निकलने की। यह छटपटाहट भी उन्हें आत्महत्या करने के लिए उकसाती है।” करीब तीन साल पहले 15 अप्रैल 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने जब ट्रांसजेंडर लोगों पर ऐतिहासिक आदेश दिया था, तो उसमें ट्रांसजेंडरों के मेडिकल इश्यूज़ के लिए अस्पतालों में अलग विभाग बनाने के साथ ही कई बुनियादें बातें कही गई थी। सुप्रीम कोर्ट के उक्त आदेश को दोबारा पढ़ने की ज़रूरत है।

 

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