कोचिंग क्लासेज़ ना हुए निर्मल बाबा का दरबार हो गया

Posted by preeti parivartan in Education, Hindi, Society, Staff Picks
July 15, 2017

UPSC में अनियमितता को लेकर छात्र-छात्राओं का प्रोटेस्ट हो रहा है। प्रोटेस्ट जायज़ भी है, बहुत सारी दिक्कतें जो हैं, विशेषकर हिन्दी मीडियम के स्टूडेंट्स के लिए। लेकिन जब किसी एक समस्या पर चर्चा होती है तो उससे जुड़ी हुई बाकी समस्याएं भी याद आने लगती हैं। परीक्षा मेडिकल और IIT की भी बड़ी टफ़ होती हैं, लेकिन इन परीक्षाओं में तीन चरणों से नहीं गुज़रना होता है। दूसरा सभी विषयों का ज्ञान ज़रूरी नहीं होता और परीक्षा पास करने बाद अफ़सरशाही का बोध भी नहीं हो पाता।

ज़ाहिर है कि UPSC एक बड़ी भारी परीक्षा है और उतना ही इसके प्रति क्रेज़ भी है। मतलब एक बार ख्वाब देखना शुरू कर दिया तो फ़िर ये एक नशा है, तब तक करेंगे जब तक कि फेफड़ों में पानी ना भर जाए! मतलब कहने का ये है कि सरकारी परीक्षा देने की उम्र ना खत्म हो जाए। और इस ख्वाब को हकीक़त में बदलने का दावा करते हैं तमाम कोचिंग संस्थान।

शिक्षा के व्यवसायीकरण पर नब्बे के दशक से  लिखा जाने लगा था। कोचिंग संस्थान के नाम पर जो गलाकाट प्रतियोगिता चल रही है, उसको लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका भी दी गई और कोर्ट ने कुछ निर्देश भी दिए, लेकिन धरातल पर कुछ हुआ नहीं। कोचिंग संस्थान पूरी रफ़्तार से फल-फूल रहे हैं। हमारी शिक्षा व्यवस्था तो इसके लिए ज़िम्मेदार है ही लेकिन छात्र भी कम ज़िम्मेदार नहीं हैं। कभी अगर किसी कोचिंग संस्थान के अंदर जाएंगे तो लगेगा कि “निर्मल बाबा” का दरबार चल रहा है या अगर खोसला का घोसला मूवी देखी हो तो उसकी याद आएगी।

घुसने के साथ फाउंडर का एक अवार्ड लेेते हुए फोटो। आप कुछ देर तक आंख टिकाकर देखिए और गौरवान्वित होइए कि ईश्वर ने आपको ये दिन दिखाए कि आप इस इतने काबिल हुए जो यहां तक पहुंचे। ठीक वैसे ही जैसे निर्मल बाबा या किसी बाबा के दरबार में जाने पर भक्त की मनोदशा होती है। फिर तपाक से रिशेप्सनिस्ट आपकी केयर करेंगी। आपको समझाएंगी की जी.एस. क्या है, एथिक्स क्या है। फिर आपको “संभालते” हुए किसी काउंसलर के पास ले जाएंगी। काउंसलर की बात पर आपका सारा कॉन्सेप्ट क्लियर हो जाएगा कि बिना कोचिंग लिए आप कलेक्टर नहीं बन सकते हैं। लगे हाथ आपके हाथ में 1 लाख 45 हज़ार (अनुमानित, इससे ज़्यादा भी होता है) का बिल पकड़ा दिया जाएगा।

पैसों वालों के लिए तो ठीक है। लेकिन जो “वहां” से आते हैं, उनके मां बाप की जो भी जमा पूंजी होती है उसको निकाल कर रख देते हैं। अभी यहीं खत्म नहीं हुआ अगर आपने ऐसा कहा कि रहेंगे कहां और कैसे तो तुरंत एक “सिपाही” आपको लेकर किसी पीजी में चला जाएगा या फ्लैट में चला जाएगा, वहां भी इनका गठजोड़ होता है। अब अगर आप सामान्य या अतिसामान्य परिवार से हैं तो पैसा जोड़-जोड़ कर पढ़ते रहिए। इन कोचिंग संस्थानों को चलाने के पक्ष में जो दलीलों का दलील- महादलील दी जाती है, वो कुछ इस तरह है कि ये उन छात्रों के लिए है जिन्हें स्कूल-कॉलेज में शिक्षा की मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल पाई। ऐसा तर्क ख़ुद छात्र भी कई बार देते हैं और सबसे ज़्यादा शोषण उन्हीं छात्रों का होता है। डेढ़ लाख का बिल वही लोग भरते हैं और पेट काटकर रहते हैं।

अभी तक का रिज़ल्ट यही बताता है कि IAS और IPS की परिक्षाओं में गांव के वो विद्यार्थी जो हिन्दी में मेन्स लिखकर आते हैं. बहुत कम ही सफल हो पाते हैं। ये वैसे ही है जैसे हमारे यहां सारी सरकारी योजनाएं गरीबों के लिए ही बनती है और भीतर ही भीतर उन्हीं का ख़ून चूस लिया जाता है। ये एजुकेशन गुरू अपने आप को किसी बाबा की तरह ही प्रेजेंट करते हैं और बहुत सारे छात्र अपने आपको भक्त की तरह। (आजकल हर जगह ओहदे पर बैठा हुआ इंसान अपने लिए भक्त ही चाहता है।)

शिक्षा के इस व्यवसायीकरण या मैं तो कहूं शिक्षा के इस धंधाकरण की चपेट में सबसे ज़्यादा बिहार, यूपी और हरियाणा के वे छात्र हैं जिन्हें कभी आधारभूत सुविधाएं नहीं मिली। इनमें भी सबसे बुरी हालत उनकी है जो कमज़ोर आर्थिक स्थिति के बावजूद लाख-लाख रुपए का बिल भरते हैं। कभी ग़ौर करिएगा एक टॉपर का फ़ोटो कई कोचिंग संस्थानों में लगा होता है और हर कोई दावा करता है। पढ़ने वाले छात्र भी कोचिंग में घुसते के साथ पहले टॉपर को निहारना शुरू करते हैं, बिना किसी सवाल जवाब के।कारण यह है कि सरकारी शिक्षण संस्थानों की हालत सर्वविदित है। कहीं शिक्षक नहीं हैं तो कहीं गुणवत्ता नहीं है और जहां दोनों हैं वहां सभी का दाखिला नहीं हो पाता।

1964 में कोठारी कमीशन ने कहा था कि सरकार को GDP का छह प्रतिशत हिस्सा शिक्षा पर खर्च करना चाहिए और यह लक्ष्य 1985-86 तक हासिल कर लिया जाना चाहिए था। लेकिन यह लक्ष्य हासिल नहीं हुआ। समान और गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा एक सपना है। वन नेशन वन टैक्स हो सकता है तो वन नेशन वन एजुकेशन क्यों नहीं?

इसके अलावा एक समस्या ये है कि बहुत सारे छात्र- छात्राओं का UPSC से मोह बना होता है। जहां मोह होगा वहां दुर्गति भी समझ में नहीं आती! UPSC से आगे भी खुला आसमान है।

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