डोकलाम: भूटान के बदले भारत क्यों लड़ रहा है चीन से?

Posted by Vikash Kumar in GlobeScope, Hindi, Politics
July 28, 2017

अंतरराष्ट्रीय जगत में राष्ट्रीय हित की अवधारणा के तहत ही विभिन्न देश अपने हितों को साधने में लगे रहते हैं। भारत भी इनमें से एक है जो अपने पड़ोसी देशों के साथ मधुर संबंधों तथा भू-राजनीतिक आकांक्षाओ की पूर्ति हेतु हर वह कोशिश करता है जिसमें उसके सुरक्षा से जुड़े हित सधते हो। इसी सन्दर्भ में हाल ही में घटित हुआ डोकलाम प्रकरण ऐसा ही रणनीतिक व भू-राजनीतिक मुद्दा बन गया है। यह ऐसा मुद्दा है जो भारत व भूटान के बीच सुरक्षा, निर्णय-निर्माण तथा आत्म-निर्भरता के सवाल पर संबंधो को समझने के लिए विवश करता है।

भारत ने भूटान के प्रति जो अभी तक नीति अपनाई, वह चीन को ही केंद्र में रखकर बनाई है। भारत नहीं चाहता कि भूटान चीन की तरफ जाए और जब-जब भूटान चीन की तरफ गया, भारत ने हमेशा इसका विरोध किया। अगर भूटान चीन के संपर्क में आता है तो यह भारत की सुरक्षा के साथ-साथ भूटान की सुरक्षा के लिए भी एक बड़ा खतरा होगा। चीन चाहता है कि भूटान के साथ राजनयिक संबंध बनाकर अपने क्षेत्र में दूतावास खोल राजदूतों का आदान-प्रदान करे। भारत के रणनीतिक विश्लेषक ऐसे कदम को भारत के राष्ट्रीय हित व भूटान की सुरक्षा के लिए खतरा मानते हैं। यह कदम एक तरह से चीन की ‘मोतियों की माला’ के मणि को मजबूत करने के समान ही होगा, जो भारत नहीं चाहेगा।

खतरा इस कदर है कि भूटान की उत्तरी सीमा को लेकर चीन से उसका विवाद चल रहा है, जिसे सुलझाने के लिए ढाई दशकों से दोनों के बीच बातचीत चल रही है। भूटान की इस उत्तरी सीमा का पश्चिमी भाग सिक्किम से लगा है, जबकि पूर्वी इलाका अरुणाचल प्रदेश से मिलता है। चीन इन दोनों इलाकों को हथियाने के चक्कर में है और इसके एवज में वह भूटान की सीमा का मध्यवर्ती क्षेत्र देने की पेशकश कर रहा है। दूसरी तरफ भारत इस सौदेबाजी के सख्त खिलाफ है और भूटान का चीन के प्रति नरम रुख हमारी चिंता को और बढ़ा रहा है। भूटान को प्रभावित करने के लिए चीन अपना वाणिज्य दूतावास भी वहां खोलने का दबाव बना रहा है। इसलिए भारत के लिए चिंता के बादल मंडराना लाज़मी ही है।

ध्यान देने वाली बात यह भी है कि भूटान भी भारत पर निर्भर रहने के विचार से अब ऊब रहा है। पहले भी कई बार भूटान ने भारत के विरोध को दरकिनार करते हुए विदेश नीति से सम्बन्धित फैसले लिए हैं। इस बात की तसदीक 2013 में हुए थिम्पू में हुए एक सांस्कृतिक सम्मेलन में भूटान के इतिहासकार कर्मा फुन्तशो के उस वक्तव्य से होती है, जिसमें उन्होंने कहा, “शायद भूटान के लोग स्थानीय राजनीति में भारत के दखल को पसंद नहीं करते, लेकिन अपने निजी हितों के कारण राज्य गलतिया करते रहते हैं।” हालांकि इससे पहले भी भूटान सरकार ने ऐसे निर्णय लिए हैं, जिससे पता चलता है कि भूटान अब विदेश नीति निर्माण में आत्म-निर्भरता के लिए लालायित है।

भारत और भूटान दोनों देश शान्ति और निशस्त्रीकरण पर ज़ोर देते हैं। भूटान ने एन.पी.टी. पर 1985 में हस्ताक्षर कर दिए थे। लेकिन यह कहना मुश्किल है कि यह कदम भारत की इच्छा के विरुद्ध था या भारत की अनुमति इस मुद्दे पर थी। भूटान धीरे-धीरे भारत के प्रति अपना दृष्टिकोण बदल रहा था। भूटान जो इस समय कदम उठा रहा था, वह अधिकतर अब भारत विरोधी कदम ज़्यादा लगने लगे थे। इससे सम्बन्धित एक घटना तब दिखी जब संयुक्त राष्ट्र की साधारण सभा में भूटान ने पाकिस्तान के प्रस्ताव का समर्थन किया और यह समर्थन भारत के विरोध में गया। पाकिस्तान ने सुझाव रखा था कि दक्षिण एशिया क्षेत्र आणविक दृष्टि से मुक्त क्षेत्र घोषित हो, जबकि भारत ने इसका विरोध किया था।

1979 के हवाना के गुट-निरपेक्ष शिखर सम्मेलन में भूटान ने कंपूचियाई मुद्दे पर भारत का विरोधी पक्ष लिया था। अफगानिस्तान में सोवियत सैनिकों की मौजूदगी के सवाल पर भी भूटान ने कड़ी आपत्ति जताई थी।

इसके पीछे का मकसद यह था कि भूटान विश्व बिरादरी को संदेश देना चाहता था कि भूटान एक संप्रभु देश है और वह अपने निर्णय भारत से स्वतंत्र होकर ले सकता है।

इसे भांपते हुए चीन आज तक इसी कोशिश में लगा हुआ है कि किसी तरह संप्रभुता के सवाल पर भूटान की भारत पर निर्भरता को दूर किया जाए। असल में भारत और भूटान के बीच 1949 की भारत-भूटान मैत्री संधि हुई थी, जिसमें प्रावधान था कि भूटान अपनी विदेश नीति भारत की सलाह पर संचालित करेगा। लेकिन 2007 में संधि के नवीनीकरण के बाद इस प्रावधान को हटा दिया गया। ऐसी स्थिति में भूटान को इस बात की आज़ादी थी कि वह अपनी विदेश नीति कैसे संचालित करे। इस बीच अलिखित रूप से कुछ ऐसी व्यवस्था बनी रही, जिससे भूटान बिना भारत की सलाह पर विदेश नीति तैयार नहीं कर सकता था।

आज भूटान संवैधानिक लोकतंत्र के साथ ही संप्रभु देश है। इसलिए देखा जाए तो जो डोकलाम विवाद उभरा है, वह भूटान और चीन के बीच का है ना कि भारत का। भारत तो भूटान की सुरक्षा के चलते सामने आया है। चीन को दिक्कत इसी बात की है कि भारत क्यों भूटान की रक्षा कर रहा है, जबकि भारत भूटान के साथ हुई संधि का ही पालन कर रहा है। हालांकि भूटान ने भी चीन को डोजियर भेजकर चीन पर सीमा अतिक्रमण का आरोप लगाया है।

इस प्रकरण में दिलचस्प बात यह देखने को मिली कि इस पूरे विवाद में भारत की तरफ से ही चीन को जवाब दिया जा रहा है ना कि भूटान की तरफ से। भूटान इस विषय पर शांत बैठा हुआ है। कहीं न कहीं यही बात भूटान में भी स्थानीय स्तर पर चुभ रही होगी कि भारत ही भूटान की संप्रभुता का निर्णय कर रहा है। भूटान जानता है कि वह अभी इतना सक्षम नहीं है कि वह चीन का मुकाबला कर सके, इसीलिए भारत संधि का हवाला देते हुए इसकी सुरक्षा में लगा है।

इस बीच भारत को भी यह समझना होगा कि इस प्रकार की स्थिति वह भूटान के प्रति कब तक बनाकर रख पाएगा, जबकि अतीत में भूटान द्वारा विदेश नीति से सम्बंध में लिए गए आत्म-निर्णयों के बारे में भारत जानता है।

भारत की भूटान के प्रति विदेश नीति की यह सबसे बड़ी मुख्य चुनौती होगी कि किस प्रकार वह भूटान को हमेशा अपने साथ बनाए रखे। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब भूटान भी नेपाल की तरह चीन के नज़दीक जाना शुरू कर दे।

आज ज़रूरत इस बात की है कि भूटान के सन्दर्भ में भारत को अपनी नीति को फिर से जांचना होगा ताकि भूटान चीन की तरफ ना देख सके और ना ही चीन को कोई ऐसा मौका मिले कि वह भूटान को भारत के खिलाफ उकसा सके।

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