इन्टरनेट के दौर में हर ख़बर सच्ची नहीं होती

Posted by Anshal Ali Tiger
July 5, 2017

Self-Published

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। इसका मतलब ये है कि समाज के बिना, इंसान का जीना बड़ा मुश्किल भरा है। आज इस प्राणी के समाज के दायरे में सोशल मीडिया भी हद से ज़्यादा आ गया है। जनता घर से ज़्यादा, सोशल मीडिया पे वक़्त बिताती है।

मुद्दे की बात ये है कि हममें से बहुत से लोग पूरे दिन में कई ऐसी खबरों को facebook, WhatsApp, Instagram, twitter आदि के ज़रिये शेयर करते होंगे या पढ़ते होंगे जिनका सच्चाई से कोई लेना देना नहीं होता है। और अगर होता भी है तो उसे तोड़-मरोड़कर, स्वादानुसार तब्दील करके उपयोग में लाया जाता है। सबका साथ-सबका विकास के दौर में आज मोबाइल और इंटरनेट की घर-घर में पहुंच हो गयी है, जो कि इन प्लैटफॉर्म्स को संवेदनशील वस्तु बनाने में कोई कसर नही छोड़ता है।

 

ऐसा नहीं है कि कम ज्ञान वाले लोग ही ऐसी खबरों को शेयर करते हैं। एक तरफ जहां बुद्धजीवी वर्ग भी इसका शिकार है, वहीं हज़ारों-लाखों फर्ज़ी न्यूज़ पोर्टल, पेज और ग्रुप भी फर्ज़ी ख़बरों को फ़ैलाने में अहम किरदार निभा रहे हैं। अब आप ऐसे समझ लीजिए जैसे आप खा रहे हैं मटन कबाब और लोग उसे कटहल कबाब समझ कर उसकी रेसिपी खोज रहे हैं।

ये खबरों तब और संवेदनशील बन जाती है जब इन्हें धर्म, समुदाय, संस्था या जानवर विशेष आदि से जोड़कर फैलाया या लिखा जाता है। अगर आप अभी तक इसका शिकार नही हुए हैं तो हो सकता है कुछ वक़्त में हो जाएंगे। कई न्यूज़ पोर्टल तो सच-झूठ की पड़ताल भी नहीं करते और बात की तह तक पहुंचे बिना ही निष्कर्ष दे देते हैं।

हमारी और आपकी ज़िम्मेदारी बनती है कि इन प्लैटफॉर्म्स का सही उपयोग करें और कुछ भी शेयर करने से पहले उसकी जांच-पड़ताल ज़रूर करें। अगर ना कर पाएं तो बेहतर है कि उसे वैसे ही रहने दें। भ्रामक, झूठी और अति संवेदनशील खबरों को बिलकुल भी ना फैलाएं। अपने घर की तरह ही सोशल मीडिया के प्लैटफॉर्म्स को भी साफ रखें। भाया हमारी नहीं तों कम से कम माननीय प्रधानसेवक जी के “स्वच्छ भारत” का हिस्सा बने। जागरूक नागरिक बने।

इस बात की गंभीरता को समझिये। कहीं ना कहीं एक आपत्तिजनक फेसबुक पोस्ट की वजह से बंगाल में सांप्रदायिक हिंसा हो गयी है। इस बात से आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि आपको क्या करना है और क्या नहीं।

वहीं डिजिटल सिक्योरिटी के लिहाज़ से भी ऐसी खबरों पर भरोसा करना सही नहीं है। हो सकता है कि 20 रुपये के बैलेंस या फिर राम मंदिर बने या बाबरी मस्जिद के चक्कर में अपने व्हाट्सएप्प या फेसबुक की सारी जानकारी आप दूसरों को दे बैठें।

तो जनाब, अगली बार जब इस मायाजाल में कदम रखें तो याद रहे कि आप सभ्य और ज़िम्मेदार नागरिक हैं। इसका सही उपयोग करें, किसी के उपयोग की वस्तु ना बने।

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