बैंक के कर्ज़ से ज़्यादा किसानों को साहूकार का कर्ज़ मार रहा है

Posted by हरबंश सिंह in Hindi, Society
July 7, 2017

जब से आंख खुली है तब से शहर की चकाचौंध में ही रहा हूं। वैसे तो जब भी पिताजी को मौका मिलता तो वो ये बताने में पीछे नहीं हटते थे कि वह एक किसान हैं। आज़ादी के बाद से ही हमारा परिवार शहर में रहा है, ज़मीन है लेकिन मिट्टी से वह रिश्ता नहीं जहां जज़्बात जोड़े जा सकें। तेज़ बारिश हो या सूखा, हमारे घर का चूल्हा कभी बुझता नहीं था।

लेकिन मेरी माँ एक ऐसे परिवार से हैं जिसे सही मायनों में किसान कहा जा सकता है। 5 बहनों और एक भाई का ये परिवार बैल गाड़ी से लेकर ट्रैक्टर तक से खेत की बुआई करता आया है और आज भी कर रहा है। मेरी माँ आज भी तेज़ तूफ़ान और कुदरत के बदलते ढंग को देखकर अक्सर चिंतित हो जाती हैं जो उनके मायके में खड़ी फसल को लेकर होती है। मेरी माँ ब्याज से बहुत डरती थी, माँ कहती थी कि रोटी कम खा लो लेकिन ब्याज नहीं। मैं समझ नहीं पाता था कि सरकारी बैंक इतने कम ब्याज पर लोन देते हैं, फिर भी माँ क्यों ब्याज के लिये मना करती हैं?

आज किसान द्वारा लिये गए कर्ज़ पर बहुत बहस चल रही है, कुछ राज्यों की सरकारें या तो किसान कर्ज़ माफी की घोषणा कर चुकी हैं और कुछ इस पर विचार कर रही हैं। जिन सरकारों ने कर्ज़ माफी का ऐलान किया है उनके कर्ज़ माफी के संदर्भ में दिये गये आदेश का अध्ययन करें तो कई तथ्य सामने आते हैं। मसलन किसान के पास तय ज़मीन होनी चाहिये, कुछ ऐकड़ से ज़्यादा ज़मीन रखने वाले किसानों को कर्ज़ माफी नहीं दी गयी है। वहीं कर्ज़ माफी की रकम भी बहुत सिमित है। लेकिन क्या सरकारी और गैर सरकारी बैंक द्वारा दिया गया कर्ज़ ही किसान का असली कर्ज़ है? शायद नहीं।

किसान मंडी में बैठे आढ़तिये/साहूकार से भी कर्ज़ लेता है और बदले में उसे अपना आनाज या फसल इसी आढ़तिये को बेचनी होती है। कर्ज़ वापस ना करने की सूरत में किसान को अपनी ज़मीन गंवानी भी पड़ सकती है, जिसके लिए कर्ज़ लेते समय किसान द्वारा एक हलफनामा लिखवाकर लिया जाता है। इस तरह से किसानों के क़र्ज़ का बस अंदाजा ही लगाया जा सकता है, इसका सही-सही आंकड़ा मिलना बहुत मुश्किल है।

सरकारी बैंक की ब्याज दर बहुत सीमित होती है मसलन 0.9 से लेकर 1.2-1.5℅ तक लेकिन आढ़तिये के यहां इसकी कोई तय दर नहीं होती। आढ़तिये की ब्याज दर कई सारी चीज़ों पर निर्भर करती है जैसे-

1. किसान के पास ज़मीन कितनी है और फसलों की उसकी सालाना उपज कितनी है।

2. किसान और आढ़तिये के बीच का व्यवहार कितना पुराना और फायदेमंद है।

3. किसान पर पहले से कितना कर्ज़ है जो इस आढ़तिये से लिया गया है।

4. किसान की ज़रूरत कितनी लाज़मी है और उसके पास वक़्त कितना है।

5. किसान के घर में अगर बेटे की शादी है तो कर्ज़ पर ब्याज कम होगा, क्योंकि यहां पारिवारिक प्रतिष्ठा का सवाल बड़ा नहीं होता। वहीं बेटी की शादी को सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ दिया जाता है इसलिए ब्याज दर अमूमन ज़्यादा होती है।

6. घर में कोई बीमार है जिसे तुरंत इलाज की ज़रूरत है तब भी ब्याज दर ज़्यादा होती है।

7. अगर किसान को अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए बड़े शहरों में या विदेश भेजना हो तो पहले किसान से उसे उसकी ज़मीन को बेचने के लिये कहा जाता है। आढ़तिये का तर्क होता है बाहर जाने वाला कभी अपने गांव वापस नहीं आता। इस समय भी ब्याज की दर सबसे ज़्यादा होती है।

8. चावल की बुआई के दौरान पानी की बहुत ज़्यादा ज़रूरत होती है, ऐसे समय किसान के खेत का ट्यूवेल बंद हो जाये या ट्रैक्टर में कोई खामी आ जाए तब भी ब्याज की दर बढ़ा दी जाती है।

अब सवाल ये है कि किसान बैंक को छोड़कर आढ़तिये के पास से कर्ज़ लेता क्यूं है? इसके भी कई जवाब हो सकते हैं।

1. आज शिक्षा का आभाव इसका सबसे बड़ा कारण है। जहां बैंक से कर्ज़ लेने के लिए किसान को कई कागज़ी कार्रवाहियों से गुज़रना पड़ता है वहीं आढ़तिये के यहां बिना किसी कागज़ी कार्रवाही के कभी भी ब्याज पर पैसा मिल जाता है।

2. बैंक अमूमन ज़मीन के एक टुकड़े पर एक बार ही लोन देता है, वहीं आढ़तिया के यहां ऐसी कोई शर्त नहीं होती।

3. अचानक से किसान के उभरे हालात, बैंक की धीमी कार्यशैली भी आढ़तिये से क़र्ज़ लेने का एक बड़ा कारण बनता है।

गांव में एक कहावत मशहूर है कि ब्याज एक बार किसान के घर में आ जाए तो ये आसानी से बाहर नहीं निकलता, खासकर कि आढ़तिये का ब्याज। मैंने खुद ब्याज के कारण किसान को अपनी ज़मीन बेचते हुए देखा है। आज छोटा किसान इसी ब्याज के चक्कर में फंसकर ताउम्र इसकी कैद में रहता है और कभी-कभी इसका अंजाम खुदकुशी के रूप में भी सामने आता है।

आढ़तिये का ये ब्याज एक छुपा हुआ कारण है जो किसान और गांव दोनों को खत्म कर रहा है। जहां इसके कारण किसान पलायन कर रहा है वहीं खेती को भी आज लोग नकार रहे हैं। ऐसा भी नहीं है की ब्याज सिर्फ और सिर्फ खेती तक सीमित है, कस्बों और शहरों का मज़दूर वर्ग या सब्ज़ी और ऐसे व्यापार जहां रोज़ समान खरीदा और बेचा जाता है, वहां भी ब्याज के इस चक्र को आसानी से देखा जा सकता है। यहां भी कोई कागज़ी कार्रवाही नहीं होती, लेकिन अगर ब्याज चुकाने में कोई भी कोताही हुई तो वसूली के दौरान हाथापाई की भी नौबत आ सकती है जो किसी भी क़ानूनी किताब में दर्ज नहीं होती।

अभी पंजाब सरकार भी किसानों की कर्ज़ माफी पर एक नया आदेश लेकर आई है, जिससे छोटे और मध्यम वर्गीय किसानों का 2 लाख रुपये तक का कर्ज़ माफ करने की बात कही गयी है। लेकिन यहां भी आढ़तियों और साहूकारों के ब्याज के कुचक्र पर कोई कार्रवाही नज़र नहीं आ रही है। इसका राजनीतिक विश्लेषण करें तो धनाढ्य आढ़तिया और व्यापारी चुनावी चंदा देते हैं, वहीं वोट किसान के ज़्यादा होते हैं। इससे आप समझ सकते हैं कि बैंकों के कर्ज़ की माफी शायद आगे भी होती ही रहेगी, लेकिन ये आढ़तियाराज और ब्याज का काला कारोबार शायद ही कभी बंद हो पाए।

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