अपराधियों को सज़ा देना था तो ढहा दिए उनके घर, इंदौर में ये कैसा इंसाफ?

Posted by Ankit Jha in Hindi, News
July 31, 2017

एडिटर्स नोट- इस मसले पर Youth Ki Awaaz ने DIG इंदौर, हरिनारायणचारी मिश्रा से बात की। उन्होंने बताया कि नगर निगम और पुलिस उन्हीं अपराधियों का घर ढाह रही है जिन्होंने सरकारी ज़मीन पर गैरकानूनी तरीके से कब्ज़ा किया है और उन्हीं अपराधियों के घर तोड़े जा रहे हैं जो लगातार अपराध में लिप्त हैं और अपने घर से भी ड्रग्स बेचने जैसे अपराधों को अंजाम दे रहे हैं। ऐसे अपराधी आसपास के युवकों के लिए प्रेरणा बन जाते थे जो गैरकानूनी काम करते हुए भी अपना मकान बना लेते थे, युवा पीढ़ी को लगता था कि अगर वो भी ऐसा काम करें तो उनके पास भी घर और पैसे होंगे। इस अभियान में अपराधियों के घरवालों को जो परेशानी हो रही है उसपर DIG ने बताया कि नगर निगम के साथ मिलकर ऐसी व्यवस्था बनाने की कोशिश की जा रही है जहां उन्हें रीलोकेट किया जा सके।


प्रशासन जब आपपर हावी होने लगता है तो शहर में जीने का ख़तरा बढ़ने लगता है। इंदौर शहर का प्रशासन, शहरी ग़रीब और मध्यम वर्ग के लिए अभी ऐसे ही निर्दयी और अहंकारी बना हुआ है। इस प्रशासनिक ढांचे में इंदौर नगर निगम भी है, इंदौर विकास प्राधिकरण भी और इंदौर पुलिस भी। बीते 5 वर्षों में ये प्रशासन अपने अहंकार के चरम पर पहुंच गया है और शहर में गरीब की उपस्थिति उसे इस तरह खटकने लगी है जैसे समूचा शहर कभी प्रशासन ने खरीद रखा हो।

लोग विस्थापित किए जा रहे हैं, लोग हटाए जा रहे हैं, लोग भगाए जा रहे हैं, वो विवश हैं, लड़ने की सोचते हैं, दबा दिए जाते हैं। कहते हैं प्रशासन इतना क्रूर इससे पहले कभी ना था। इंदौर में प्रशासन की क्रूरता अभी ‘गुंडा धर-पकड़ अभियान’ के नाम से सामने आया है। अब इसे पुलिस द्वारा अपराध नियंत्रण के लिए उठाया गया कदम कहें या इंदौर नगर पालिका निगम द्वारा ज़मीन छीनने की नयी साज़िश।

दरअसल यह अभियान DIG इंदौर, हरिनारायणचारी मिश्रा द्वारा लूट, चेन स्नैचिंग, ज़मीन पर क़ब्ज़ा, अवैध वसूली जैसे अपराध में सक्रिय अपराधियों की आर्थिक तौर पर रीढ़ की हड्डी तोड़ने के लिए चलाया है। इस पूरे अभियान का एक्शन प्लान भी उन्होंने ही बनाया है।

शहर भर के ऐसे अपराधियों की सम्पत्ति की जानकारी तैयार करके पुलिस ने नगर निगम के सहयोग से उनके घरों को ज़मींदोज़ करने का काम शुरू कर दिया है।

पिछले 18 दिनों में 33 ऐसे अपराधियों के 200 करोड़ की ज़मीन को तथाकथित मुक्त करवा लिया गया है। पुलिस इस सब पर अपना पीठ थपथपा रही है कि अपराध पर ऐसी विजय पहले कभी नहीं मिली थी। लोग सुधरने को तैयार हो रहे हैं। पुलिस थाने में आकर अपराधियों के परिवार वाले शपथ पत्र देकर जा रहे हैं, कि वो फिर किसी अपराध में संलग्न नहीं होंगे। इसे नगर निगम व पुलिस के संयुक्त मुहिम का नाम देकर शहर में बेचा जा रहा है और शहर के लोग गुंडाराज के ख़ात्मे का जश्न मनाने में लगे हुए हैं।

इसका एक दूसरा चेहरा भी है। पहली नज़र में ये सब कुछ या तो पूरी तरह हैरान करता है या पूरी तरह से खुश। हैरान इसलिए करता है कि देश के संविधान से लेकर भारतीय दंड संहिता के किस अनुच्छेद या धारा में यह लिखा है कि चेन स्नैचिंग के अपराधी की सज़ा जेल या जुर्माना नहीं अपितु उसके घर का विध्वंश है। यदि ऐसा नहीं है तो क्या पुलिस और नगर निगम द्वारा किया गया ये कृत्य असंवैधानिक और गैर-क़ानूनी नहीं है?

Taufiq's House Demolished By Nagar Nigam And Police
तौफिक का ढहाया गया घर

ऐसे ही एक अपराधी तौफ़िक, जो अभी जेल में है उसका भी घर 27 जुलाई को तोड़ दिया गया। तौफ़िक का परिवार अपने घर के मलवे के पास बैठा अपने अपराध को याद करने में जुटा हुआ है। उसकी माँ का कहना है कि “मेरे बेटे ने कोई जुर्म किया तो उसको सज़ा मिले, ज़रूर मिले लेकिन सज़ा सिर्फ उसे मिले हमें नहीं। ये क्या सज़ा हुई कि जो घर मेरे नाम पर है उसे इस तरह तोड़ दिया गया। मेरी बहू, मेरे छोटे छोटे पोते और मेरे बूढ़े पति भारी तेज़ बरसात में ऐसे ही टूटे घर मे दुबके पड़े रहे। मेरा बेटा अभी जेल में है, 26 साल की उम्र है उसकी। 3 साल से वो यहाँ सामने ही ठेला लगा कर परिवार का पेट पाल रहा था।”

27 जुलाई की सुबह पुलिस और अधिकारी पूरे हुजूम के साथ आए थे, पड़ोसियों का कहना है कि “200 के क़रीब लोग थे, सारे चौराहे बंद कर दिए गये थे। एक दिन पहले हमें नोटिस मिला था तो हम लोग स्टे ऑर्डर लेने गये हुए थे बन भी गया था हमारा वक़ील वहीं पर था लेकिन उन लोगों ने किसी की भी नहीं सुनी। वक़ील को धक्का भी मारा। हमारी पार्षद उनसे गुहार करती रही और बेधड़क घर को तोड़ते चले गये।”

इस तरह से ग़रीबों को अपराधी बनाकर उनके घर तोड़ना और अपनी पीठ थपथपाना पुलिस और नगर निगम के अहंकार का जीता जागता उदाहरण है। ये पूरा कृत्य मानव अधिकार तथा साथ ही साथ महिला तथा बाल अधिकारों का भी हनन है। एक अन्य केस में नगर निगम ने बाबर का भी घर तोड़ा। बाबर विगत 2 वर्षों से जेल में है और उसका अपराध है अवैध शराब के संग्रहण का। उसके घर में 6 अन्य लोग हैं। एक माँ जिसे पेट का कैंसर है। 3 अन्य भाई जो सब उससे छोटे हैं और एक अविवाहित बहन। उसके अम्मी और अब्बू साथ में नहीं रहते लेकिन इस समय दोनों साथ खड़े हैं, पिता दाएं पांव में रॉड लिए और माँ कैंसर से पीड़ित। क्योंकि घर का एकमात्र कमाने वाला सदस्य जेल में है अतः घर के आगे दुकान बनाकर उसे किराए पर दे रखा है, उससे आने वाले किराए से घर चलता है। परंतु अब सब कुछ ध्वस्त है। सरिया और मलवे के अलावा और कुछ नहीं बचा है।

Babar's House in Indore Demolished By Authorities
बाबर का ज़मींदोज़ घर

ऐसी ही और कई घटनाएं हैं। एक शाम पहले नोटिस मिलता है और अस्वीकार करने पर दीवार पर चस्पा किया जाता है। नोटिस के अनुसार अपराध है अवैध कालोनी में अवैध भवन निर्माण का। परंतु इंदौर के खजराना इलाक़े में 4 लाख की जनसंख्या है और सबके पास या तो पट्टे वाली ज़मीन है या नोटरी वाली ज़मीन। ऐसे में ज़मीन अवैध तो नहीं है। और उसके बाद बात आती है अपराध और उसके लिए सज़ा की। भारतीय दंड संहिता में अवैध शराब के संग्रहण के लिए घर तोड़ने का प्रावधान नहीं है और अवैध ज़मीन की घोषणा कैसे कर दी जाती है, यह नगर निगम और विकास प्राधिकरण अपने मर्ज़ी पर टिकाए हुए है।

इंदौर प्रधानमंत्री आवास योजना कार्यपालन अधिकारी के अनुसार ये स्लम अपराध के गढ़ हैं और हम इन्हें शहर के बीच में नहीं रख सकते हैं। बेहतर है वो शहर के बाहर ही रहें। गरीबी और अपराध का कोई रिश्ता नहीं होता, और ना ही बेरोज़गारी और अपराध का होता है। ये सब किवदंतियां हैं और हमारे समाज में यह सब के मां में बिठा दिया गया है कि जब गरीबों को रोज़गार नहीं मिलता तो वो अपराध करने लग जाता है। ऐसा कतई नहीं है, अब गरीब को रोज़गार नहीं मिलता तो वो प्रयास करता है, मज़दूरी ढूंढता है। जहां मिले वहां काम ढूंढता है। और इस तरह गरीबी को अपराध से जोड़ना गरीबी के प्रति हमारी संवेदनहीनता को दर्शाता है। इंदौर के अंतस में ऐसी कई घटनाएँ छुपी हुई हैं, उन्हें परत दर परत खोलने का मैं प्रयास करता रहूँगा

हमें क्या चाहिए? हमें चाहिए एक ज़िंदा शहर। एक आबाद शहर। ज़िंदा और आबाद शहर। अतः। ज़िंदाबाद शहर।

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