JNU: थिंक टैंक बनाम युद्धक टैंक!

Posted by Afaq Ahmad
July 25, 2017

Self-Published

वैचारिक ऐतबार से भारत के सबसे खुले और शफ़्फ़ाफ़ विश्विद्यालय JNU कैंपस के भगवाकरण की तमामतर कोशिशें अब तक विफल साबित हुई हैं!

ओपीनियन, थॉट्स, विचारों के मामले में महती किरदार अदा करने वाली संस्थानों को ‘थिंक टैंक’ तस्लीम किया जाता है। दरअसल संघी संगठन-RSS, VHP वग़ैरह अपने किचेन में पकायी राष्ट्रभक्ति परोसकर जेएनयू को देशद्रोह का अड्डा घोषित करते आये हैं। चूँकि देशभक्ति में विचारों का कोई मोल नहीं होता, देशभक्ति एक भावना है, ‘भक्ति’ में सवाल-जवाब करने की कोई गुंज़ाइश नहीं होती, ‘थिंकिंग’ से सवाल पैदा होते हैं—सवाल पूछे जाते हैं। किसी से कोई सवाल ना पूछे इसीलिए देशभक्ति का बवंडर खड़ा किया जाता है और सवालों को घोंटने, चहुंओर उठने वाले सवालों का दाहसंस्कार करने, सवाल पूछने वालों का दमन करने के लिए ही आज JNU वीसी कैंपस में टैंक खड़े करने की डिमांड कर रहे हैं क्योंकि टैंक पूरी दुनिया में विद्रोह को कुचलने वाला एक नुस्ख़ा है।

कारगिल दिवस पर रैली निकालकर जेएनयू वीसी जगदीश कुमार ने कैंपस में टैंक खड़ा करने से छात्रों के अंदर देशभक्ति का जज़्बा पैदा करने की बात कही है जो निहायत ही अतार्किक और निकृष्ट सोच को ज़ाहिर करता है क्योंकि छात्र-आंदोलनों को कुचलने, छात्र-छात्राओं की ज़ुबान पर ताला जड़ने और कैंपस के चुनिंदा स्थलों को एहतेजाज के तौर पर इस्तेमाल करने पर पाबंदी आयद करने के लिए जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के कुलपति की ये एक सोची-समझी साज़िश है जो बीजेपी और आरएसएस के इशारे पर अंजाम दी गई है।

कश्मीर में एक बख़्तरबंद गाड़ी पर एक बेक़सूर कश्मीरी नौजवान को बांधकर नुमाइश कराने वाले मेजर गोगोई की तारीफ़ करने वालों में क्रिकेटर गौतम गंभीर भी थे जो कारगिल विजय दिवस के प्रोग्राम में जेएनयू में मौजूद थे।

इसी प्रोग्राम में मौजूद लेखक राजीव मल्होत्रा ने कहा कि “भारतीय सेना ने जेएनयू को ‘कैप्चर’ कर लिया है,” मेजर जनरल बख़्शी ने आगाह किया कि अभी जादवपुर और हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी को ‘कैप्चर’ करना बाक़ी है!

ये तो ठीक ऐसे ही है कि इराक़ को तबाह करने से पहले अमरीका ने ‘Weapon of Mass Destruction’ का शोशा छोड़ा था और मिली थी एक सुई भी नहीं; पर अमरीकी टैंक इराक़ के अंदर तक घुस आये थे…ये तर्क इसी तरह यहां भी दिया जा सकता है कि जेएनयू ‘कैप्चर’ कर लिया है और अब टैंक खड़ा किया जाना बाक़ी है—दुश्मन को उसकी हार याद दिलाते रहने के लिए, अपना रौब-दाब ग़ालिब बनाये रखने के लिए, अपने हनक का लोहा मनवाने के लिए…

क्या जेएनयू में टैंक सिर्फ़ इसलिए कि यहां से आवाज़ उठाई जाती रही है कि आरएसएस आज़ादी की लड़ाई में कभी शामिल नहीं रहा, यहां से संघ के ख़िलाफ़ सबसे ज़्यादा लड़ाइयां लड़ी गयी हैं…संघ और उससे जुड़े संगठनों को चुनौती देने की वजह से ही जेएनयू को देशद्रोह की श्रेणी में रखा गया और जेएनयू के छात्रों को लेफ़्टिस्ट, मानवाधिकारवादी, मुस्लिम-परस्त, लिबरल और हिन्दू-विरोधी जैसे खांचों में बांट दिया गया है…संघ के मुखपत्र पाञ्चजन्य ने भी जेएनयू को देशद्रोहियों का गढ़ बताते हुए कवर स्टोरी लिखी थी—जेएनयू की ख़ता यही है कि यहां एडमिशन में उच्चवर्गीय और उच्चवर्णीय तबक़ों के मुक़ाबले एक ख़ास एडमिशन पॉलिसी के तहत बड़ी तादाद में दलित, आदिवासी, पिछड़े और लड़कियां पढ़ती हैं…ये देश का इकलौता इदारा है जहां लड़कियों की संख्या लड़कों से अधिक है और हाशिए पर संघर्ष कर रही लड़कियों की एक बड़ी खेप इस शिक्षण-संस्थान में तालीमयाफ़्ता हैं जिनके लिए उच्च-शिक्षा हासिल करना एक सपना था!

मेरा मानना है कि जिस इदारे में दलित, आदिवासी, मुसलमान, पिछड़े और मुल्क के कोने-कोने से हाशिए पर जद्दोजहद कर रही लड़कियों का एक बड़ा जत्था मौजूद हो—जिनके लिए जेएनयू ने उच्च-शिक्षा हासिल कर अपने विचारों को धार देने और समाज के उत्थान में अग्रणी भूमिका अदा करने का एक प्लेटफ़ॉर्म दिया, उनके लिए देश के उच्च कुलीन शहरी लोगों की तरह संघी देशभक्ति भला कहाँ रास आ सकती है—उनके लिए मुल्क के हर नागरिक के लिए समानता की लड़ाई लड़ना, दलितों-पिछड़ों-अल्पसंख्यकों के हितों के लिए संघर्ष करना, देश से ग़रीबी, अशिक्षा, बेकारी, बेरोज़गारी का समूल नाश करने के लिए सतत् प्रयत्नशील रहना ही देशभक्ति के खाँचे में फ़िट बैठ सकता है!

वैचारिक असहमति की संस्कृति जेएनयू की रगों में रची-बसी है जिसे मेटने का काम जब संघी हुकूमत ने किया तो एक भूचाल-सा आ गया जिसकी परिणति आज सबके सामने है…कि जिसने अपने घनीभूत वैचारिक विरोध के सामने केंद्र सरकार को घुटनों पे ला दिया था!

जेएनयू छात्र नजीब प्रकरण के दौरान मैं कई दिनों तक कैंपस में रुका था, उस दौरान छात्र-छात्राओं ने जिस वलवले, जोश-जुनून, जिजीविषा के साथ agitation किया और रैलियों में जो अनूठी चीज़ देखने को मिली वो भारत के किसी दूसरे इदारे में देखने को नहीं मिली है। जेएनयू आकर मुझे लगा कि एक अकादमिक इंस्टिट्यूट से उठने वाली आवाज़ सरकारों के होश उड़ा सकती है, बस आपसी इत्तेहाद, एकजुटता, अपनापन, संघर्ष का एक नशा होना चाहिए…और ये चीज़ मुझे जेएनयू के स्टूडेंट्स ख़ास तौर पर छात्राओं में देखने को मिली है।

भारत की केंद्र सरकार अगर ये समझती है कि उसकी संघी और भगवा देशभक्ति को जेएनयू के छात्र अक्षरशः अंगीकार कर लेंगे तो ये उसकी सबसे बड़ी भूल है क्योंकि जिस यूनिवर्सिटी में वैचारिक असहमति स्टूडेंट्स की रगों में दौड़ रहा हो और जहां के स्टूडेंट हयूमैनिटीज़ की अलग-अलग विधाओं में रिसर्च कर रहे हों उसे आप जबरन अपनी सोच और विचारधारा के पतवार के सहारे संघी देशभक्ति का पाठ पढ़ाएंगे तो ये एक कपोल-कल्पना ही बनकर रह जाएगी!

इस तरह साफ़ है कि असहमति और भक्ति का घाल-मेल घातक है—यूनिवर्सिटी या तो इल्म का ख़ज़ाना लुटा सकती है या देशभक्ति का पाठ पढ़ा सकती है…और जहां तक जेएनयू की बात है तो जिस इदारे में स्वच्छंद विचारों की अविरल धारा बहती हो और जहाँ स्टूडेंट्स में वैचारिक असहमति कूट-कूट कर भरी हो उसे संघी देशभक्ति के सांचे में ढालने का नाजायज़ प्रयास कर स्वच्छ आंदोलनकारी प्रवृत्तियों को जड़ से उखाड़ फेंकने की ग़रज़ से अब टैंक की नुमाइश करना एक शिक्षण-संस्था के हित में क़तई नहीं है!

 

आफ़ाक़ अहमद

शोध छात्र: पत्रकारिता एवं जनसंचार

एएमयू, अलीगढ़-202 002

मोबाइल नंबर: 9759611226

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.