क्या ये बॉलीवुड का ‘रंग दे तू मोहे गेरुआ’ दौर है?

Posted by Vishal Shukla in Art, Hindi, Media
July 6, 2017

एक वक्त था 70-80  के दशकों का, जब मनमोहन देसाई और प्रकाश मेहरा जैसे निर्देशकों की फिल्मों और पात्रों से सेक्युलरिज़्म झलकती थी। कैफ़ी आज़मी जैसे कलाकार भी हुए जो हर सामाजिक-राजनीतिक हलचल पर खुलकर बात करते थे या यूं कहिए कि उनके कहे को ही इंडस्ट्री का पक्ष मान लिया जाता था। यही वजह रही कि देश में बॉलीवुड की छवि अपेक्षाकृत उदार और निरपेक्ष रही है।

लेकिन पिछले कुछ समय में हवा बदली है, एक खास  तरह के लोगों का महत्वपूर्ण सरकारी पदों पर बोलबाला और लिबरल और आलोचनात्मक कथ्य वाले सिनेमा पर चलती कैंची कुछ और ही इशारा करती है।

रंग दे तू मोहे गेरुआ का है दौर:-

अभी ज़्यादा दिन नहीं हुए जब सोनू निगम ने मस्जिदों से आती अज़ान की आवाज़ के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद की, तो अनुपम खेर कश्मीरी पंडितों के खिलाफ हुए अत्याचारों पर कई बार सार्वजनिक कार्यक्रमों और पर्सनल वीडियो जारी करके अपना विरोध जता चुके हैं।

कहने की ज़रूरत नहीं कि ये सब साउथ ब्लॉक में बैठने वाले रहनुमाओं की नज़रों मे अपने नंबर बढ़ाने कर लिए किया जाता है। अशोक पंडित, जो कि सेंसर बोर्ड के सदस्य भी हैं,  रोज़ ही बीजेपी प्रवक्ता की तरह टीवी पर बोलते नज़र आते हैं। इन सभी ने कहीं ना कहीं उन्हीं बातों को कहने की कोशिश की है जिसे आज से कुछ साल पहले तक RSS और BJP की विचारधारा माना जाता था।

बॉलीवुड की नई नवेली सराकरी खेप:-

परेश रावल, किरण खेर, स्मृति ईरानी, हेमा मालिनी, शत्रुघ्न सिन्हा, मुकेश खन्ना, पहलाज निहलानी, गजेन्द्र चौहान, रवीना टंडन जैसे नामों की लंबी फेहरिस्त है जिनकी राजनीतिक लालसा साफ दिखती है।

ये तो चंद नाम हैं, लेकिन सिर्फ नाम ही गिनने बैठ जाएंगे तो पता चलेगा कि बॉलीवुड की पलटन अब सेक्युलर की जगह भगवा लहर पर सवार हो चली है। ये हवा धीरे-धीरे ही बदली है लेकिन अब काफी मुखर होकर बॉलीवुड के भगवाकरण में जुटी है।

‘ज़ाहिरा’ मामले से पीछे खींचे कदम:-

आपको ज़रूर याद होगा गुजरात दंगों के वक़्त चर्चा मे आई ज़ाहिरा शेख का केस, गुजरात दंगों के बाद इस लड़की को लेकर महेश भट्ट, जावेद अख्तर, शबाना आजमी और कई लोगों ने एक प्रेस ब्रीफिंग की थी। इस ब्रीफिंग में मीडिया के सामने अपील की गयी थी कि वो बिना किसी से डरे अपने साथ हुए हादसों के बारे में बताए और उसे न्याय दिलवाने के लिए बॉलीवुड हर तरह से साथ है।

हालांकि एक फैक्ट ये भी है कि ज़ाहिरा शेख खुद बाद में अपने बयानों से पलट गई और उसके एकाउंट में लाखों रुपए पाए जाने की खबरें आईं। इस केस के बाद सेक्युलरिज़्म की आवाज़ उठाने के लिए तत्पर रहने वाले ये सितारे ज़ाहिरा से अपने हाथ जला चुके थे और फिर इस तरह की ‘ज़ुर्रत’ करने की किसी ने  भी कोशिश नहीं की।

फिल्म निर्माताओं की इस एकता को देखकर पहले दावे किए जाते थे कि बॉलीवुड एक सेक्युलर जगह है और यहां सबकी आवाज़ समानता से सुनी और उठाई जाती है। फिल्मों में भी सिर्फ सेक्युलरिज़्म का मैसेज दिया जाता है लेकिन वक्त के साथ हवा भी बदली और धीरे-धीरे बॉलीवुड सेक्युलर की जगह नागपुर के रंग में रंगा आने लगा।

आप सेंसर बोर्ड के रेगुलर किस्सों को ले लीजिए। सेंसर के संस्कारी थानेदार तो ये काफी वक्त से बने हुए हैं लेकिन फिल्म ‘समीर’ से पहलाज निहलानी ने एक संवाद इसलिए हटवा दिया था क्योंकि उसमें प्रधानमंत्री के कार्यक्रम ‘मन की बात’ का प्रयोग किया गया था।

कुछ किस्से न सिर्फ बेहद हास्यास्पद हैं बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों से कोसों दूर भी हैं। मसलन अभिनेत्री अनुष्का शर्मा की  हालिया फिल्म ‘फिल्लौरी’ से हनुमान चालीसा के एक दृश्य को इसलिए हटवा दिया गया था क्योंकि ऐसा माना जाता है हनुमान चालीसा पढ़ने से भूत भाग जाते हैं और फिल्म में भूत बनी अनुष्का चालीसा पढ़ने के बाद भी वहीँ खड़ी रहती हैं।

यानी कि सेंसर बोर्ड पर अब भगवा ब्रिगेड का असर तारी है और फिल्मकार या तो उनके एजेंडे को आगे बढ़ाएं वरना फ़िल्म में सैकड़ों कट्स के लिए तैयार रहिए।

सरकार का पक्ष रखने वाले हो रहे उपकृत:-

पहलाज निहलानी ने मधुर भंडारकर की फिल्म इंदु सरकार को आनन फानन में एनओसी दे दिया है। भंडारकर ने फिल्म में इमरजेंसी को केंद्र में रखा है जिसके लिए बीजेपी हमेशा कांग्रेस की आलोचना करती रही है।

हाल ही में अक्षय कुमार को मिला राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार भी कॉन्ट्रोवर्सी में आ गया था और इंस्टेंट मेसेजिंग एप्प वाट्सऐप के ज़रिए अक्षय के लिए बकायदा हिंदू स्टार होने के मैसेज तक सर्कुलेट किए गए, जोकि साफ तौर पर एक किस्म कर साझा प्रोपेगंडा की तरफ इशारा करता है।पाकिस्तानी कलाकारों को पूरी तरह से बॉलीवुड में प्रतिबन्धित करना भी  इस बात को दर्शाता है कि पलड़ा इन दिनों केसरिया का भारी है ।

पाला बदलते सितारे:-

संजय दत्त का परिवार कांग्रेसी रहा है लेकिन संजय अब बीजेपी से दोस्ती बढ़ा रहे हैं, और ऐसा कहा जा रहा है कि इसका फायदा भी उन्हें सज़ा में छूट जैसे फैसलों से मिल रहा है।

आमिर खान ने भी असहिष्णुता के मुद्दे पर जब अपनी बात रखी थी तो भारी दबाव में आकर उन्हें कंपनियों ने अपने ब्रांड एंबैसडर से हटा दिया था पर वहीं आमिर खान हाल में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत से अवॉर्ड लेते नज़र आएं जिसपर सभी लोगों को हैरानी भी हुई थी।

बात साफ है ‘तुम मेरी पीठ खुजाओ मैं तुम्हारी’ का ये खेल आधिकाधिक कमर्शियल फायदे और एजेंडा सेटिंग के लिए ही चल रहा है।

 

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