short cut

Posted by Kshitij Pandey
July 10, 2017

Self-Published

एक आम जिंदगी जी रहा इंसान , जिसे अपनी भाषा के भी क्लिष्ट शब्द सोंचने पर मजबूर कर देते हो , उसके सामने धारा प्रवाह अभिजात्य वर्ग की मानी जाने वाली भाषा का प्रयोग कर , बैकफुट पर डाल देने की सोंच एक शातिर चाल सरीखी है ।

प्रसिद्धि पाना कड़ी मेहनत का नतीजा होता है । मगर यहाँ भी शार्ट कट का एक बड़ा अस्तित्व है , और जो वर्तमान में वामपंथी विचारकों के हाथों में है ।

कई बार किसी मेहनतकश व्यक्ति से मिलकर , उनसे बात करके लोग पाते है कि …अरे ये तो बिलकुल मेरे जैसा है ।

पहले उनके मन में उस व्यक्ति के लिए सम्मान का भाव होता है कि काश एक बार बात की जा सके ।

मगर कुछ ही समय बाद वो उनके आंकलन में खुद जुट जाता है ।

और फिर अंत में उस व्यक्ति से खुद की तुलना करने के साथ ये प्रक्रिया समाप्त हो जाती है ।

अब व्यक्ति पाता है कि वो स्वयं भी उस प्रसिद्ध शख्सियत के मुकाबले में कम योग्य नही है ।
जैसे – वो खुद उससे बेहतर लिख और सोंच सकता है ।

अब वो खुद को भी प्रसिद्द करने में जुट जाता है ।

मगर प्रयास करने के बाद भी वो परिणाम नही मिलता ।
कारण न तो उसके पास वो धैर्य होता है और न ही वो गहराई ।

इंस्टैंट कॉफी और 2 मिनट मैगी कल्चर की उपज , सफलता भी इंस्टैंट चाहते है ।

और जब ये हो सकना संभव नही दिखता , फिर ये एक हीनता को जन्म देता है ।

ये हीनता व्यक्ति को अपनी मर्यादा की सीमाओं को भी सहजता से तोड़ने को प्रोत्साहित कर देती है ।

प्रायः वामपंथी इसी दुष्चक्र में उलझाकर महिलाओं से जमकर क्रांति करवाते है ।

जो फेमिनिस्ट होने का दम्भ भरने वाली महिला चिन्तको को उन सीमाओं का अतिक्रमण करने की भी छूट दे देता है , जिसे पुरुष होने के नाते वामी पुरुषों द्वारा भंग करना संभव नही होता ।

विमर्श और कलात्मकता के नाम पर लम्बे समय से हिन्दुओ की सहिष्णुता का लाभ लेकर , वामपंथी जयचंदो के कंधों पर सवार होकर लोकप्रियता का सफर तय करने में मकबूल फ़िदा हुसैन से लेकर नई नवेली क्रन्तिकारी लेखिका जैसो का लम्बा इतिहास रहा है ।

पिछले वर्ष ऐसी ही एक क्रांति की भूखी लेखिका की कालजयी रचना पेटीकोट बहुत से बुद्धिजीवियों के लिए अफीम बन गई थी ।

दरअसल इस समस्या के मूल में प्रसिद्धि पाने की भूख सबसे अहम भूमिका निभाती है ।
इसे आप यूँ समझ सकते है … जैसे एक सामान्य फ़ेसबुकिया अपने पदार्पण के साथ सामान्य सी बातें लिखकर खुश रहता है ।
मगर समय बीतने के साथ ही वो लाइक्स और कमेंट्स की माया में उलझ जाता है ।
ये तृष्णा इतनी वीभत्स हो जाती है कि व्यक्ति के लिए सांस लेने से अधिक आवश्यक फेसबुक पर नोटिफिकेशन चेक करना हो जाता है ।
नोटिफिकेशन पर लगी घातों की संख्या कब उसके संतुष्टि के समानुपाती हो जाती है , ये वो खुद नही समझ पाता ।
और फिर जब ये घातें नही दिखाई पड़ती फिर उसका देश और समाज से विश्वास उठ जाता है ।
वो देश और समाज के खिलाफ लिखने लगता है ।
उधर जबरदस्त मंदी के दौर से गुजर रहा वामपंथी खेमा , इसे अपने आंगन में औलाद पैदा होने सरीखा मानता है ।
ट्रकों में भरकर वामपंथी लौंडो को उसकी पोस्ट पर मेंशन किया जाने लगता है ।

ऐसे उस नए फेसबुकिये के नए जीवन की छट्ठी मनाई जाती है ।

वो नए नए मिले दोस्तों की दीवारों पर घूमने जाता है , तो पाता है कि अभी तो उसे बहुत से मुकाम हासिल करना बाकी है ।

लाइक्स तक तो ठीक थे , पर कमैंट्स तो अब भी न आ रहे ।
कुछ समय ऐसे ही बीतने के बाद जब उसकी फोल्लोविंग में भी इजाफा न होता दिखा , फिर तो उसका भरोसा ईश्वर से भी उठ जाता है ।
(ख़ास बात ये है कि वामी , चाहे हिन्दू या मुस्लिम , भरोसा उसका हमेशा भगवान् से ही उठता है , क्योकि अल्ला से भरोसा उठने पर वामियो के जनाजे भी साथ में उठ जाया करते है ,औऱ क्रांति करने की हसरत अधूरी ।)

भगवान से भरोसा उठते ही फेसबुकिये की लोकप्रियता में गजब इजाफा होता है ।
भक्त उसकी दीवार पर आकर उसके जमीर को झकझोरने की कोशिशें करते है , और दूसरी तरफ नए बने साथियो का खुला समर्थन जारी रहता है ।

ट्रको में भर भर कर आए वामी लौण्डों के साथ , अब भाईजान लोग भी #हवेली पर आने लगते है ।

और फेसबुकिया धीरे धीरे खुद को अपने फेक अकाउंट बना कर #मठाधीश घोषित कर देता है ।

तो मित्रो , अगर आपका भी कोई मित्र इन प्रक्रियाओं से गुजर रहा हो , तो उसे नायक या नायिका मत बनाइये ।आपका विरोध सिर्फ उसकी फॉलोइंग ही बढ़ाएगा ।

असल में ये एक ऐसी मानसिक अवस्था होती है ,
जिसका अब तक कोई पेटेंट इलाज नही है और ज्ञात नुस्खों में सबसे बेहतर इलाज , सेटिंग में जाकर दबाया गया unfriend का बटन है ।

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