देखना माँ, एक दिन ‘लोग क्या कहेंगे’ वाले तुम्हारे समाज को छोड़ उड़ जाउंगी

हर कहानी के कुछ किरदार होते हैं, उनके रूप की, रंगत की पहचान होती है। जैसे वो डायन की हंसी वाली या वो गऊ सरीखी या वो मोहिनी फलां-फलां। हमारी मिडिल क्लास फैमिली में कहानी के किरदार तो होते हैं, मगर उनके अक्स नहीं होते। हर तीर चुभेगा ज़रूर मगर उसको छोड़ने वाले का चेहरा उन चार लोगों में ही समाया होता है जो हर कहानी के बीच में इज्ज़त का माखौल उड़ाने के बाद समाज बन जाते हैं।

मुझे मेरे घर में उसी घिसी-पिटी परम्परा को नहीं ढोना था, मगर ना चाहते हुए भी मैं उस मिडिल क्लास वाले झांसे में आ ही गई। मुझे हमेशा से वकालत लुभाती थी, मगर घरवालों ने और पापा की डेथ के बाद माँ ने समाज का एक डर दिखाया-

“चार लोग क्या कहेंगे कि भेज दिया बेटियों को घर से बाहर आवारागर्दी करने?”

जाने क्यूं नहीं पूछा तब माँ से कि महत्त्वपूर्ण हम हैं या वो चार लोग जिनके अक्स तक से हम वाकिफ नहीं हैं। कर लिया कंप्यूटर साइंस में बैचलर, मगर अब क्या? अब भी नौकरी करने की इजाज़त नहीं थी, लेकिन क्यों? जवाब फिर वही कि बिना चेहरे के, “चार लोग क्या कहेंगे कि बेटियों की कमाई खा रही है?”

रिवाज़ के ढर्रे पर चलकर लड़कियों के कॉलेज से मास्टर्स भी कर ली लेकिन फिर सवाल वहीं आकर अटक गया कि कम्पनी में प्लेसमेंट के लिए अप्लाई करूं या नहीं? माँ से पूछा तो सख्त हिदायत आई कि नहीं करना। दिल्ली मुंबई जैसे शहर में कैसे रहोगी और फिर दुनिया के वही चार लोग क्या कहेंगे कि भेज दिया माँ ने कमाने। मास्टर्स के बाद सरकारी नौकरी की तैयारी करते-करते 2 साल बीत गए, साथ के जो दोस्त थे सब कम्पनी में टीम लीडर तक पहुंच गए और मैं अभी तक CGL (Combined Graduate Level) के मैथ्स तक ही पहुंची।

हां अब रसोई के चूल्हे तक ज़रूर पहुंची हूं और टॉयलेट की सीट साफ़ करना सीख गई हूं। डस्टबिन से कूड़ा डालकर उसको सर्फ़ से धोना सीख गई हूं और फर्श को चमकाना भी सीख गई हूं। रोटी गोल बनानी आ गई है, कपड़े साफ़ धोने आ गए हैं और मैं उन बिना अक्स के चार किरदारों की नज़र में भी साफ़ हूं, मगर मैं हूं कहां?

आज अपना वजूद याद नहीं है मुझे, कभी कॉलेज टॉपर थी आज जावा, C, और C++ वगैरह सब भूलती जा रही हूं। याद रहता है तो बस ये कि चावल में पानी कितना डालना है और दाल कितनी सीटी में बनेगी। कभी सोचती हूं कि रोऊं खुद पर और फिर ख़याल आता है कि आज तक आंसू छिपाए थे तभी यहीं तक रह गई।

मिडिल क्लास फैमिली हो, लड़की 23 साल की हो और खाना बनाना जानती हो। दिन भर घर पर रहना जानती हो और आने वाले को चाय-पानी पूछना जानती हो तो रिश्तेदारों को भी अपने मामा, फूफा, ताया सबके लड़के याद आते हैं कि रिश्ते के लिए दोनों तरफ से आवभगत हो। लड़की की छाती पर आते उभार उनको दोनों तरफ से मिलने वाले नेग के जैसे लगते हैं, जिनको लड़की दुप्पटे में कितना भी छुपा ले वो नज़रें चाय का कप मेज पर रखते वक्त देख ही लेती हैं।

आज माँ ने कहा-

“एक लड़का है- पढ़ा-लिखा है, नौकरी करता है और शहर में रहता है। तेरी भी शादी अच्छे घर में हो जाए और मेरा भी बोझ खत्म हो। बिन बाप की बेटी हो! सबकी इज्ज़त सहित ससुराल चली जाओगी तो मैं भी निहाल हो जाउंगी और चार लोग उंगली तक नहीं उठाएंगे। कल लड़के के पापा और ताया, भाईसाहब के साथ आ रहे हैं। अगर पसंद आ गई तो अगले संडे उसकी माँ नजरों से निकाल जाएंगी और फिर एक दिन लड़का आकर फाइनल कर जाएगा।”

मैं  हैरान हूं ये सब सुनकर, आज सब्र का बांध टूट चुका है सो पूछ लिया माँ से, “मम्मी ये प्रदर्शनी कब तक लगेगी? अगर इनको नहीं पसंद आई तो क्या ये पूरा प्रोसेस फिर से शुरू?” माँ ने गुस्से में कहा, “घर तो बसाना ही है? आज नहीं तो कल, तो अभी क्यों नहीं?”

आज मेरे अंदर की लड़की इतने वक्त बाद जागी थी तो मन का गुबार निकल जाने दिया, उम्मीद की किरन जो नज़र आ रही है। कह दिया माँ से, “शादी के बाद क्या माँ? 2 बच्चे ही तो पैदा करने हैं, वो अब नहीं तो 4 साल बाद पैदा कर लूंगी, मगर इन प्रदर्शनियों से दूर रखिए। नहीं करनी मुझे अभी शादी। अभी मुझे नौकरी करनी है।”

अब भाई ने भी कहा, “तुझे तो किसी की इज्ज़त का ख़याल है नहीं ,मगर हमें है! शादी के बाद जो जी चाहे कर लेना।”

कमाल है ना! जब माँ-बाप ने जीने का हक नहीं दिया तो किसी गैर से आज़ादी की कैसी उम्मीद? नहीं! आज हौसला हुआ है खुद को आज़ाद करने का, उन बिना अक्स के किरदारों से। अब बस एक नौकरी की तलाश है जिस दिन मिली, उसी दिन उन बिना अक्स के चहरों को तोड़ कर निकल जाऊंगी आज़ाद उड़ने…

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