औरतों की आज़ादी पितृसत्ता की सहूलियत से मिली खैरात भर नहीं हो सकती

Posted by Vikash Anand in Hindi, Sexism And Patriarchy
July 24, 2017

साइकिल, स्कूटर, कार चलाती, काम पर जाती, उच्च शिक्षा ग्रहण करती, निजी/सरकारी/बहुराष्ट्रीय कंपनियों की प्रमुख, बच्चों को स्कूल छोड़ती महिलाएं बनाम करवाचौथ वाली, परदे में कैद, गर्भ में मरती, इज्ज़त की बलि चढ़ती, घर में मार खाती महिलाएं। ये दो परस्पर विरोधी दृश्य भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति को बयान करते हैं। एक तरफ तो आज सीमित अधिकार व स्वतंत्रता मिली है, वहीं दूसरी ओर वे व्यापक स्तर पर पारंपरिक बेड़ियों की जकड़न में कैद हैं। साथ ही पूंजीवाद और परंपरा के गठबंधन ने स्त्री शोषण तथा स्त्री उत्पीड़न के कई नए आयाम भी जोड़े हैं।

अधिकांश लोगों का मानना है कि महिलाओं को हासिल स्वतंत्रता का सबसे महत्वपूर्ण कारण पूंजीवादी सामाजिक व्यवस्था है। कुछ लोग औद्योगीकरण को इसका प्रमुख कारण मानते हैं, पर वास्तव में ऐसा नहीं है।

भारत में स्त्रियों को हासिल हुई आज़ादी और सम्मान और उसे आशानुरूप क्यूं हासिल नहीं किया जा सका, यह समझने के लिए महाराष्ट्र और बंगाल के 18वीं सदी से लेकर कम से कम स्वतंत्रता के समय तक के बहुआयामी, दीर्घ और सफल आन्दोलनों के बारे में जानना-समझना आवश्यक है।

इसका कारण यह है कि आधुनिक भारत, पारंपरिक और बौद्धिक रूप से इनसे बहुत प्रभावित हुआ है। इस कड़ी में महाराष्ट्र में ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई फुले द्वारा स्थापित सत्य शोधक समाज को समझने की ज़रूरत है। उनकी पुस्तकों और सत्य शोधक समाज की ही महिला अधिकारों को देखने-समझने वाली कम से कम दो प्रखर और सफल समाज सुधारकों फ़ातिमा शेख़ और ताराबाई शिंदे के विचारों को समझना ज़रूरी है। साथ ही पंडिता रमाबाई के सवर्ण महिलाओं के हितों के लिए किए गए काम और उनके प्रतिरोध में यथास्थितिवादी बाल गंगाधर तिलक के आन्दोलनों की समझ का होना भी ज़रूरी है।

इसी तरह से बंगाल के राजा राम मोहन रॉय तथा रबिन्द्र नाथ टैगोर हैं। ‘मतुआ आन्दोलन’ की व्यापकता और उसके प्रभाव के साथ, माइकेल मधुसूदन दत्त द्वारा चलाए गए जनान्दोलन हैं। तीस और चालीस के दशकों में तारा चंद दास के मानवशास्त्रीय अध्ययनों के साथ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के थीसिस विवाद और उसके निपटारे को समझकर ही वर्तमान सत्ता, शिक्षा और अनुसंधानों की निम्नस्तरीयता के कारणों और उसकी निरंतरता को भी समझा जा सकता है।

पूंजीवादी व्यवस्था ने अपने स्वार्थों के अधीन महिलाओं को एक हद तक आज़ादी दी है, क्योंकि उसे महिलाओं के सस्ते श्रम की आवश्यकता थी। इस व्यवस्था ने आज स्त्री को नुमाइश की वस्तु बना दिया है, जिसमें उनका शरीर, शरीर ना होकर वस्तु में बदल गया है। आज कामकाजी स्त्रियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे घर में कमा के भी लाएं और घर आकर कुशल गृहिणी और सेविका की भूमिका भी निभाएं। आज की स्त्री एक ओर जहां पूंजीवादी शोषण का शिकार है, वहीं दूसरी ओर वह उत्पीड़न के परंपरागत रूपों को ढोने के लिए विवश भी है।

यहां पर स्त्रियों से सम्बंधित कुछ समस्याओं और भ्रातियों का विश्लेषण करने की कोशिश कर रहा हूं।

1)- यह महज़ संयोग नहीं है कि अस्मिता से जुड़े अधिकांश शब्द स्त्रीलिंग हैं। मर्यादा, प्रतिष्ठा, गरिमा, महिमा, व्यथा, पीड़ा, इज्जत, आबरू, हया, आत्मा, लज्जा, शर्म, यातना आदि। क्योंकि लाज रखने की सारी ज़िम्मेदारी औरत के ही खाते में डाली गई है।

2)- मानव का स्वभाव ही मनन करना है और बोलना या अपने विचारों को व्यक्त करना ही उसे इंसान बनाता है। यूं भी विश्वगुरु भारत की स्त्री को इंसान का दर्जा दिया ही कब गया है? वह तो देवी है, श्रद्धा की मूर्ति है, पूजनीय है, वन्दनीय है और देवियां कभी बोला नहीं करती। वे तो बस पूजा के पंडाल में सजी-धजी मूक-बधिर ही अच्छी लगती हैं।

3)- ‘औरत ही औरत की दुश्मन है’ इस मानसिकता का मनोविश्लेषण करें तो पाते हैं कि इस व्यवहार का कारण सास और बहू का औरत होना कतई नहीं है। यह सीधे शोषक और शोषित का रिश्ता है। वर्षों से दमित, दलित, प्रताड़ित एक औरत के हाथ में जैसे ही सत्ता आती है वह सत्ताधारी शोषक का प्रतिरूप बन जाती है।

4)- बलात्कार के सामाजिक कारणों को ढूंढ़ा जाए तो सारी लड़ाई मालिक और मज़, शोषक और शोषित की है। ज़्यादातर बलात्कार उन्हीं स्त्रियों का किया जाता है जिन्हें सत्ताधारी पुरुष सबक सिखाना चाहते हैं। अधिकांश मामलों में निर्वस्त्र उन्ही औरतों को किया जाता है जो बेसहारा हैं, जिनके मर्दों के पास हथियार नहीं हैं, जो मुश्किल से दो वक्त की रोटी जुटा पाते हैं, जो किसी भी जुल्म के खिलाफ़ आवाज उठा पाने में असमर्थ हैं। आमतौर पर जो महिला अत्याचार की शिकार होती है, उसके खिलाफ एक ताकतवर सत्ताधारी वर्ग खड़ा होता है। यह ऐसा सामंती ज़मींदार वर्ग है जो सदियों से इस देश में पल रहा है। गांव को वह अपनी जागीर समझता है और गांव वालों को अपनी प्रजा।

5)- भारतीय समाज के मध्य वर्गीय ढांचे में स्त्री आधुनिक और आत्मनिर्भर तो बनी पर उसे वह माहौल नहीं मिला जहां आत्मनिर्भरता उसे बराबरी का दर्जा तथा सम्मान दिला पाती। आज भी मध्यवर्गीय कस्बाई मानसिकता के पास इन समस्याओं का एक ही हल है कि लड़की को इतना मत पढ़ाओ कि वह सवाल करने लगे या ससुराल में अपनी बेकद्री और अपमान को पहचानने लगे। ‘पहचान देना गलत है’ आज भी इसके पक्ष में बोलने वाले कस्बे ही क्या महानगरों में भी बहुतेरे मिल जाएंगे। बस मध्यवर्गीय सम्भ्रांतता का बारीक़ सा खोल भर हटाने की देर है।

6)- महिला आरक्षण बिल को लेकर महिलाएं बेहद उत्साहित हैं, पर यह सोच आरक्षण की शुरुआत से ही बनी हुई है कि आरक्षण कहीं ‘इस्तेमाल’ में ना बदल जाए। वैसे भी जब तक भारतीय नारी ‘ना’ कहना नहीं सीखेगी, हवालों, घोटालों में लिप्त मंत्रियों, सांसदों, नेताओं के खाली सिंहासन पर जाने कितनी डमी प्रतिमाएं ही विराजमान दिखाई देंगी।

7)- भारतीय परिवेश में आमतौर पर लड़कियों को किशोरी होते ही अपने किसी पड़ोसी या करीबी रिश्तेदार की ज़बरन की गई चेष्टा का सामना करना ही पड़ता है। सामाज के भय के कारण वह इस प्रताड़ना की बात को अपनी माँ या बड़ी बहन के अतिरिक्त किसी और से नहीं बांटती। घर के सदस्य भी प्रायः उसे इस घटना को भूल जाने की ही सलाह देते हैं। लड़की प्रताड़ना का शिकार होते हुए भी समाज के दृष्टिकोण व परिवार के रवैये के कारण खुद को ही अपराधी समझने लगती है।

8)- ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ इस सूक्ति वाक्य को लिखने वाले यह लिखना भूल गए कि सिर्फ अपनी जाति व अपने धर्म के स्त्री की पूजा करना श्रेयस्कर है। दूसरे धर्म की स्त्रियों का बलात्कार कर, उनके माथे पर त्रिशूल से ‘ॐ’ गोदकर, उन्हें ज़िन्दा जला देने की अनुमति उनका धर्म देता है। यह काम धर्म के नाम पर किया जाए तो पाप नहीं लगता। यदि इसे प्रतिरोध और प्रतिक्रिया के तहत किया जाए तो न यह सिर्फ क्षम्य है, बल्कि घर की स्त्रियां भी यदि पति के इस कार्य में मदद करती हैं तो वह अपने पतिव्रत धर्म का पालन कर रही हैं। शुभ्रा नगालिया ने एक स्थान पर लिखा है “हिन्दू घरों के भीतर स्त्री से घरेलू हिंसा, वैवाहिक बलात्कार और दहेज़ के लिए जलाए जाने की घटनाओं के साथ सहिष्णुता पूर्वक समायोजन की अपेक्षा की जाती है और जब वह हिन्दू परिवार के सबसे बड़े दुश्मन ‘मुसलमान’ के खिलाफ रक्त पिपासु योद्धा की तरह लड़ती है तब उसकी पीठ ठोकी जाती है।”

पराधीनता स्वाभाविक व आवश्यक रूप से सभी लोगों के लिए अपमानजनक होती है। सिवाय उस व्यक्ति के जो शासक है या ज़्यादा से ज़्यादा उस व्यक्ति के लिए जिसे गद्दी का उत्तराधिकारी बनने की उम्मीद है। जे. एस. मिल (Subjection of Women) ने लिखा है- “जिसे भी सत्ता की आकांक्षा है वह सबसे पहले अपने निकटतम लोगों पर सत्ता हासिल रखने की इच्छा रखता है… राजनीतिक स्वतंत्रता पाने के संघर्ष में प्रायः इसके समर्थकों को रिश्वत आदि तरीकों से ख़रीदा जाता है या अनेक साधनों से डराया जाता है। महिलाओं के सन्दर्भ में तो पराधीन वर्ग का हर व्यक्ति रिश्वत व आतंक दोनों की मिली-जुली चिरकालिक अवस्था में रहता है।”

कुछ लोग कहेंगे कि पुरुष सत्ता और उन अन्यायपूर्ण व्यवस्थाओं के बीच तुलना नहीं की जा सकती, क्योंकि पुरुष सत्ता तो स्वाभाविक है। किन्तु क्या कभी कोई ऐसी सत्ता रही है, जिसके स्वामी को यह स्वाभाविक ना लगे। महिलाएं अन्य पराधीन वर्गों से भिन्न इस स्थिति में हैं कि उनके मालिक उनसे वास्तविक सेवा के अतिरिक्त कुछ और भी चाहते हैं। पुरुष ना केवल महिलाओं की पूरी-पूरी आज्ञाकारिता चाहते हैं बल्कि वे उनकी भावनाएं भी चाहते हैं। पुरुष अपने निकटतम सम्बन्धी महिला में एक जबरन बनाये गए दास की नहीं बल्कि स्वेच्छा से बने दास की इच्छा रखते हैं।

लोग सोचते हैं कि हमारी मौजूदा प्रथाएं कैसे भी शुरू हुई हों, वे विकसित सभ्यता के मौजूदा समय तक संरक्षित हैं तो इसलिए क्यूंकि वो धीरे-धीरे सामान्य हित के अनुकूल हुई हैं। वे यह नहीं समझते कि इन प्रथाओं से लोग इतनी निष्ठा के साथ जुड़े होते हैं कि जिनके पास सत्ता होती है उनके अच्छे व बुरे मत भी सत्ता की पहचान व उसे बनाए रखने के साथ जुड़ जाते हैं। लोग यह नहीं समझते कि बहुत कम ऐसा होता है कि जिनके पास बल के चलते क़ानूनी ताकत आती है वे तब तक सत्ता पर अपनी पकड़ नहीं खोते, जब तक कि उनके बल पर विरोधी पक्ष का कब्ज़ा न हो जाए।

यह कहा जाएगा कि औरत पर शासन अन्य सत्ताओं से अलग इसलिए है, क्योंकि यह स्वेच्छा से स्वीकारा जाता है। महिलाएं शिकायत नहीं करती और इसमें समस्त भागीदार होती हैं। इसके जवाब में पहली बात तो यह कि बहुत सी महिलाएं इसे स्वीकार नहीं करती। इस बात के पर्याप्त संकेत मौजूद हैं कि कितनी महिलाएं इसकी इच्छा रखेंगी अगर उन्हें अपने स्वभाव के विरुद्ध इतनी कड़ाई से स्वयं को दबाना ना सिखाया जाए? अनुभव तब तक उन दो चीजों के बारे में फैसला नहीं दे सकता, जब तक कि केवल एक ही चीज़ का अनुभव रहा हो। अगर यह कहा जाए कि स्त्री-पुरुष समानता का मत केवल सिद्धांत पर ही आधारित है तो यह याद रखा जाना चाहिए कि इसके विपरीत मत भी केवल सिद्धांत पर ही आधारित है।

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