अनचाहा स्पर्श भी यौन उत्पीड़न है, ये समझने में हमें और कितना वक्त लगेगा

किसी महिला को उसकी मर्ज़ी के बिना कानूनन भी 20 सेकंड से ज़्यादा नहीं देखा सकता है। लेकिन फिर भी बड़े शहरों से लेकर गांव देहात तक गुस्से या अहंकार में महिलाओं को ‘देख लेने’ की धमकियां दी जाती है, साथ हर रोज़ ‘प्रेम’ के नाम पर भी उनकी मर्ज़ी के बिना उन्हें देखा जाता है। कभी नज़रें मिलाकर, कभी चुराकर, कभी आगे से तो कभी पीछे से, कभी चाहकर स्पर्श तो कभी अनचाहे स्पर्श का सुख भी पुरुष समाज हासिल करना चाहता है। लेकिन इसके बावजूद भी महिलाओं के यौन उत्पीड़न को रोकने के साथ-साथ उसके सम्मान और गरिमा को बनाए रखने की बात भी करता है।

हाल ही में न्यूयॉर्क टाइम्स ने सिलिकन वैली की महिलाओं के यौन उत्पीड़न की समस्या के बारे में बहुत-सी घटनाओं पर एक लंबी और विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की। टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री में काम करने वाली दो दर्जन से अधिक महिलाओं ने इस पर अपने विचार रखे और खुद को वहां असहज बताया। उन्होंने अनचाहा स्पर्श जैसे कंधे पर हाथ रखना, सर पर हल्की चपत लगाना, बांह में चूंटी काटना, कमर पर हाथ रखना या चपत लगाना, प्रेम निवेदन और सेक्स निवेदन आदि को इसी उत्पीड़न का हिस्सा बताया। कारण इन सभी का गलत तरीके से छूना समझा जाना हो सकता है।

महिला अधिकारों की बात करने वाले कार्यकर्ता मानते हैं कि अनचाहा स्पर्श और दूसरे यौन शोषण के मामलों से निपटने के लिए कड़े कानून के साथ नज़रिए में बदलाव की भी ज़रूरत है। वैसे देखा जाए तो कानून से ज़्यादा नज़रिए की बात होती है। मसलन जब देखेंगे नहीं तो फिर छेड़छाड़ होगी कैसे? ऐसा माना जाता रहा है कि देखकर ही वासना जागृत होती है।

पश्चिमी समाज में रेप या यौन उत्पीड़न की मानसिकता को लेकर काफी मुखरता है, वो लोग इन मामलों पर गंभीरता से विचार करते हैं। जबकि भारत में तो इतना कहकर ही मामला निपट जाता है कि क्या करें भीड़ है तो हाथ लग गया होगा! हां रेप के कारणों पर भारत में सबसे ज़्यादा लिखा जाता है। अंतर इतना है पश्चिम में रेप से पहले की घटनाओं पर अध्ययन होता है लेकिन यहां जब कोई रेप हो जाता है इसके दो-तीन दिन तक ज्ञान पेला जाता है- कम कपड़े, अकेली लड़की, कोई देखने के नज़रिए पर प्रश्नचिन्ह उठाता है तो कोई घटना की निंदा करके। पर सवाल यह है कि भारत जैसे देशों में ये ज्ञान उन तक पहुंचता भी है जो इस तरह के कार्यों को अंजाम देते हैं? क्योंकि अधिकांश रेपिस्ट उस समाज से आते है जहां पत्र-पत्रिकाएं, अखबार या अन्य जागरूकता के साधन मेरे हिसाब से नही पहुंच पाते। उनकी पहुंच सिर्फ मोबाईल में पोर्न मूवी तक होती है जहां से वो थ्योरी लेकर प्रयोग करने निकलते हैं। देखा जाए तो भारत में यौन शिक्षा का सबसे बड़ा महाविद्यालय पॉर्न मूवी ही हैं।

खैर, बहस का बड़ा मुद्दा है “अनचाहा स्पर्श” जिसे अक्सर यौन उत्पीड़न से थोड़ा कम खतरनाक माना जाता है। कई शिकायतों में ये कहा गया है कि अनचाहा स्पर्श हिंसक या खतरनाक नहीं होता लेकिन तंग करने वाला ज़रूर होता है। लेकिन यह बात पक्की है कि “ये तो लंबे समय से हो रहा है” बस तरीके बदलते रहे हैं। जब मैं छोटा था तो उस समय देखता था कि गांवों आदि में कुछ लोग प्रेम निवेदन के बजाय सीधा सेक्स निवेदन करते थे और वो भी सिर्फ एक वाक्य में होता था। जैसे राह में खड़े कुछ युवक आती-जाती लड़कियों को कहते कि “कब देगी” या दोअर्थी शब्दों में (हमारा भी कुछ भला कर दे)। कुछ इसे अनसुना कर देती थी और कुछ एक्शन लेकर इसके जवाब में बस यही कहती कि तेरे घर में मां-बहन नहीं है क्या? निवेदक कहो या अपराधी वो चुपचाप खिसक लेते थे।

लेकिन पिछले कुछ दशकों में देखा जाए तो सेक्स के लिहाज से मौजूदा समय मानव इतिहास का सबसे स्वतंत्र दौर कहा जा सकता है। बीते चार दशकों की तकनीक ने यौन संबंधों को स्वतंत्रता दी है, चाहे वो गर्भनिरोधक गोलियां हो, कंडोम हो, टिंडर जैसे एप हो या फिर लड़के-लड़की को साथ पढ़ने, खेलने, रहने की अनुमति या लिव इन रिलेशनशिप आदि। सब मिलकर यौन संबंधों को नया आसमान देते हैं। इतना ही नहीं सामाजिक मान्यताओं के लिहाज से भी समलैंगिकता, शादी से पहले सेक्स संबंध और एक साथ कई लोगों से यौन संबंध जैसे चलन अब तुलनात्मक रूप से ज़्यादा स्वीकार किए जा रहे हैं। लेकिन इसके बाद भी यौन उत्पीड़न की घटनाएं बढ़ ही रही हैं।

सवाल यह भी है कि क्या समाज पहले की अपेक्षा ज़्यादा कामुक हो रहा है? यदि इस प्रसंग में भारत की बात की जाए तो यहां सेक्स को अनैतिक विषय समझा जाता रहा है। इस विषय पर बात करना, इस विषय को उठाने का काम भला कोई सभ्य इन्सान कैसे कर सकता है? यह शर्मिंदगी सभी धर्म, नस्ल, क्षेत्र, शिक्षित और अशिक्षित सभी तरह के लोगों में देखने को मिलती है। यह धारणा इस कदर विकसित हो चुकी है कि यदि कोई लड़का या लड़की एक दूसरे को अच्छा बताने के साथ प्रेम का इज़हार कर दें तो इसे सेक्स का सीधा मौका समझा जाता है।

पिछले दिनों मार्च में, अमेरिकी शोधकर्ता जीन त्वेंगे, रायन शेरमान और ब्रुक वेल्स का एक शोध अध्ययन, आर्काइव्स ऑफ सेक्शुअल बिहेवियर में प्रकाशित हुआ था। इसके मुताबिक 1990 के दशक की तुलना में 2010 के दशक में लोग हर साल नौ बार कम सेक्स कर रहे हैं। आंकड़ों के हिसाब से इसमें 15 फीसदी की कमी देखी गई है। वो उनका शोध था, यदि यह शोध भारत में किया होता तो शायद आंख निकलकर बाहर आ जाती। यहां तो उनके सेक्स के आंकड़ों को हमारे देश के रेप के आंकड़े कच्चा खा जाते। रेप के भी ऐसे तरीके जिन्हें सुनकर सेक्स सायकॉलोजी पर पूरी किताब लिखने वाले हेव्लेक्स एलिस और फ्रायड जैसे मनोविश्लेषक भी चक्कर खा जाते।

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