क्या एक बड़ी मंडी मात्र है गरीबी का सबसे निचला स्तर?

Posted by Masood Rezvi in Hindi, Human Rights, Society
July 21, 2017

दुनिया में गरीबी और भुखमरी के विषय पर अथॉरिटी हैं हावर्ड बिजनेस स्कूल के ग्लोबल पावर्टी प्रोजेक्ट के प्रोफेसर कस्तूरीरंगन। उनके साथ प्रोफेसर जॉन क्वेल्च इत्यादि की टीम ने विश्व में भुखमरी का गहन अध्ययन किया है। सन 2007 में हावर्ड बिजनेस स्कूल से एम्मनस कुछ इस प्रकार रिपोर्ट करते हैं-

“विश्व बैंक के अनुसार दुनिया की करीब आधी आबादी – कोई 2.8 बिलियन लोग, प्रतिदिन 2 डॉलर या उससे कम पर गुज़ारा करते हैं। धन के पिरामिड की चोटी के मुट्ठीभर लोगों के विपरीत पिरामिड के तल पर मौजूद भारी जनसंख्या वह सबसे विस्फोटक सामाजिक व आर्थिक संकट है जिसका आज की दुनिया को सामना करना है।”

अपनी इसी रिपोर्ट में आगे चलकर वे प्रोफ़ेसर कस्तूरीरंगन के विचार कुछ इन शब्दों में प्रस्तुत करते हैं:

“बिज़नेस के लिए दुनिया भर की उभरती हुई मंडियों का सबसे बड़ा भाग पिरामिड के धरातल पर है, इसलिए ये बिज़नेस की अच्छी सूझबूझ भर है, इसके पीछे उनका भला करने का कोई इरादा नहीं है।”

वेल्थ पिरामिड एक परिकल्पना है कि यदि दुनिया में सबसे गरीब लोगों की संख्या को देखा जाए तो वह सबसे अधिक है। इसका अर्थ ये है कि धन के मामले में सबसे निचली सतह पर सबसे अधिक लोग हैं। जैसे-जैसे धन बढ़ता जाता है वैसे-वैसे लोगों की संख्या कम होती जाती है, जो सबसे धनी हैं वह गिने-चुने लोग हैं। इसलिए हम इस परिस्थिति की कल्पना मिस्र के पिरामिड के आकार की कर सकते हैं जिसका धरातल चौड़ा और शिखर बिल्कुल पतला है।

बहुत ही सुखद एहसास होता है यह सोच कर कि दुनिया के सर्वोच्च बिज़नेस स्कूल यानी हावर्ड बिज़नेस स्कूल ने परिस्थिति का संज्ञान लेते हुए इस पर शोध शुरू कर दिया है। साथ ही प्रोफेसर रंगन इत्यादि द्वारा बिज़नेस मेन को दिए गए इस परामर्श से उम्मीद सी बनती है कि बिज़नेस वाले अब इस पिरामिड की सबसे निचली सतह की ओर भी ध्यान देंगे जिससे शायद स्थिति में सुधार हो पाए।

पर ज़रा सोचकर देखिएगा। धर्मार्थ पुण्य अर्जन की भावना रहित अच्छी बिज़नेस सूझबूझ क्या हो सकती है? अधिक माथापच्ची करने की जरूरत नहीं है, इस प्रश्न का उत्तर विस्तार के साथ अमेरिका के नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री प्रोफैसर मिल्टन फ्रीडमैन द्वारा दिया जा चुका है। वह विस्तार के साथ कहते हैं कि किसी भी बिज़नेस मैनेजर का केवल और केवल एक ही उद्देश्य होना चाहिए और वह है अंश धारियों (शेयर होल्डर्स) के धन में अधिकाधिक बढ़ोतरी। पर अंश धारियों (शेयर होल्डर्स) के धन में वृद्धि कैसे संभव है?

इसका केवल एक ही उपाय है जिसे जानता है, वह है कि अधिक से अधिक मुनाफा कम से कम व्यय पर कमाया जाए। मतलब यह हुआ कि अपने माल की बिक्री पर अधिक से अधिक संभव धन प्राप्त किया जाए और उन दूसरे सभी संसाधनों को कम से कम भुगतान किया जाए जिन का भुगतान पहले से फ़िक्स होता है। यानी ज़मीन का किराया, मज़दूर की मज़दूरी और ऋणदाता का ब्याज। यही तो कारण है कि दुनिया में धन के वितरण ने मिस्र के पिरामिड का आकार धारण कर लिया है।

हर कोई जानता है कि पानी का बहाव ऊंची सतह से निचली सतह की ओर होता है। लेकिन धन की प्रवृत्ति इसके ठीक उलट है। मतलब ये कि यदि आप दो ऐसे समूहों के बीच धन प्रवाह का कोई माध्यम स्थापित करते हैं तो धन, कम धन वाले समूह से और भी धन खिंचकर अधिक धन वाले समूह की ओर चला जाता है। ऐसा तभी संभव है जब कोई शक्तिशाली पंप काम कर रहा हो, जिस तरह आप निचले स्तर से पानी खींच कर छत के ऊपर लगी टंकी में जमा करते हैं।

मैंने इस स्थिति को अपनी किताब “Tightening Noose of Poverty” मैं इस चित्र द्वारा समझने की कोशिश की है।

अब मान लीजिए कि पिरामिड के शिखर पर मौजूद पूंजीपति वर्ग, पिरामिड के तल पर स्थित ‘मंडी’ में केवल अच्छी बिजनेस सूझबूझ के तहत– बिना किसी डू-गुडिंग, चैरिटी, धर्मार्थ कार्य, समाज सेवा अथवा पुण्य की नियत के दिलचस्पी दिखाने लगता है और इस मंडी में बिजनेस सूझबूझ या दूसरे शब्दों में (जैसा कि फ्रीडमैन ने कहा है) केवल लाभ के उद्देश्य से, निवेश करता है।

मान लीजिए कि इस प्रकार किए गए निवेश की धनराशि को हम अंग्रेजी अक्षर D से दर्शाते हैं,  फिर यह राशि पिरामिड के तल पर स्थित मंडी में घूमती है और लाभ अर्जित करती है। अब मान लीजिए कि हम इस लाभ को अंग्रेजी अक्षर G से दर्शाते हैं। इस लाभ का जो हिस्सा वापस पूंजीपति वर्ग के पास पिरामिड के शिखर पर पहुंच जाता है उसे यदि U अक्षर से दर्शाएं, तो अचछी बिज़नेस सूझबूझ के लिए जरूरी होगा कि U, D से काफ़ी अधिक हो।

अब सवाल यह बचता है कि क्या G में से U घटा देने के बाद इतनी धनराशि बचेगी, जिससे पिरामिड के धरातल पर रहने वाले गरीबों की इतनी बड़ी संख्या के जीवन स्तर में कुछ बढ़ोतरी हो सके?

सामान सूझबूझ के आधार पर भी यह कहा जा सकता है कि ऐसा संभव नहीं नहीं है। होगा केवल यह कि पिरामिड के धरातल पर रहने वाले गरीब लोग और गरीब होते जाएंगे। नई रिपोर्टों से इस बात की पुष्टि भी होती है कि दुनिया के कुल संसाधनों का आधा भाग केवल 1% आबादी के कब्जे में है। बाकी 99% आबादी केवल बाकी 50% संसाधनों पर जीवन गुज़ारने पर मजबूर है।

यह पिरामिड सीधे-सीधे एक पिरामिड नहीं है बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि पिरामिड की चोटी पर एक नुकीला मीनार बना दिया गया हो, मानो शरीर के बाहरी भाग पर एक फोड़ा हो और उस फोड़े से एक कैंसर युक्त सूंड सी ऊपर की ओर बढ़ती चली जा रही हो।

मेरे विचार में इस परिस्थिति को बदलने के लिए फ्रीडमैन के फार्मूले को नकारना पड़ेगा। मानव का जीवन उद्देश्य केवल अधिकाधिक धन कमाना नहीं हो सकता। डू-गुडिंग, चैरिटी, धर्मार्थ कार्य, समाज सेवा अथवा पुण्य प्राप्त करने की इच्छा भी मानव जाति के धरती पर बाकी रहने के लिए अत्यंत अनिवार्य हैं, उनकी अनदेखी नहीं की जा सकती!

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