जब मैंने पहली बार मुंबई में समंदर देखा

किसका है ये शहर? इस सवाल के सही जवाब के लिए हमें पैसे, रुतबे या ज़मीन जायदाद से ऊपर उठकर इस शहर में एक घर को तलाश करना होगा जिससे हम खुद को जोड़कर देख सकें। दिल्ली के ये कुछ युवा हैं जो अपनी कहानियां इस कॉलम के ज़रिये हम सभी से साझा कर रहे हैं। दिल्ली एक ऐसा शहर जो संकरी गलियों से, चाय के ठेलों से और न जाने कितनी जानी अनजानी जगहों से गुज़रते हुए हमें देखता है, महसूस करता है और हमें सुनता है। इस कॉलम के लेखक, इन्हीं जानी-अनजानी जगहों से अंकुर सोसाइटी फॉर अॉल्टरनेटिव्स इन एजुकेशन के प्रयास से हम तक पहुँचते हैं और लिखते हैं अपने शहर ‘दिल्ली’ की बात।

नंदिनी:

 

पिछले हफ्ते ही सहेलियों से बात हो रही थी कि गर्मी की इन छुट्टियों में कौन कहां जा रही हैं? तब मैं झट से बोली थी कि समंदर देखने जाउंगी। मेरी इस बात पर सब हंसी थी! “आहना! कौन सा सपना देख रही है? समंदर देखने जाना इतना आसान है क्या? बहुत पैसा लगता है…” वगैरह-वगैरह। मैंने भी पता नहीं किस जोश में कह दिया था, “जाउंगी तो जाउंगी!” यह कहते ही मन के एक कोने में दस्तक हुई कि मैं हर बार तो छुट्टियां गांव में ही बिताती हूं, फिर समंदर कहां से बीच में आ गया? मैंने अपनी इस दस्तक को दरकिनार किया और खयालों मे ही समंदर के सपने देखने लगी।

मै समंदर के किनारे बैठी हूं, धीरे-धीरे लाल और गोल सूरज समंदर से बाहर निकल रहा है। रेत से मैं घर बना रही हूं और बहुत सारे खिलौनों को आस-पास सजा रही हूं। लहरें मेरे घर को छू कर जा रही हैं, समंदर की उठती-गिरती लहरों के साथ मैं गरम-गरम कॉफी के मज़े ले रही हूं।

शाम को मैं और कृति गली में बैडमिंटन खेल रहे थे। पापा ऑफिस से आते दिखे। हमने अपना खेल रोका और पापा के करीब आने का इंतज़ार करने लगे। करीब आने पर पापा बोले, जल्दी से ऊपर आ जाओ, कुछ कहना है। हमने अपना समान लिया और पापा के पीछे-पीछे चल दिए। पापा ऊपर पहुंचते ही बोले, “आज तुम सबको एक खुशखबरी सुनाऊं?” हमने हामी भरी। पापा चुप हो गए और मुस्कुराने लगे। हम एक साथ बोले, “पापा बताओ ना क्या खुशखबरी है?” हम अपनी बेताबी रोक नहीं पा रहे थे और पापा हमारी बेताबी के मज़े ले रहे थे। पापा ने चहकते हुए कहा, “अहना तेरा सपना पूरा हुआ, मुंबई जाने के टिकिट ऑफिस से आज मिल गये हैं, अब तुम समंदर देख सकती हो।” यह सुनते ही हम दोनों बहनें पापा से लिपट गईं।

“जल्दी-जल्दी अपना सामान पैक करो, तीन दिन बाद हमें जाना है।” पापा के इस आदेश पर हम चिल्ला पड़े, “तीन दिन बाद हुर्रे…”

खुशी के मारे मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। आज मैं ऊपर, आसमां नीचे…टाइप की फीलिंग हो रही थी। मैंने पापा का मोबाइल लिया और झट से नताशा को फ़ोन मिला दिया, “नताशा, मैं मुंबई जा रही हूं! मेरा सपना पूरा होने वाला है।” मैं खुशी से चीख रही थी। वह भी सुनकर खुश हो गई।

मैं और कृति प्लान बनाने लगे, कौन-कौन से कपड़े लेकर जाएंगे, कौन से नए खरीदने हैं, एक कैमरा भी रखना है इत्यादि। तैयारी की भागम-भाग में तीन दिन कब बीत गए, पता ही नहीं चला।

पापा, मम्मी, हर्ष और कृति के साथ मैं आखिरकार ट्रेन में बैठ ही गई। यकीन ही नहीं हो रहा था कि मैं सचमुच जा रही हूं। ट्रेन की खिड़की से बाहर देखना बहुत अच्छा लग रहा है। चाय वाले की आवाज़ कानों में आ-जा रही है, ऐसा लग रहा है जैसे जबरदस्ती चाय पिलाकर ही छोड़ेगा। लाल कपड़े पहने कुली सामान लिए चले आ रहे हैं, उनके चेहरे पर पसीना और थकान साफ़ दिख रही है।

ट्रेन ने एक हॉर्न दिया और झटके के साथ चल पड़ी। मेरे दिल की धड़कन बढ़ गई। हम भाई-बहन की लड़ाई होने लगी कि कौन खिड़की के पास बैठेगा। तभी एक ट्रेन तेजी से पास से गुजरी और हम सब को चौंका दिया।

रात का खाना खाकर हम सब सो गए। गाड़ी में लोगों की आवाज़ सुनकर मेरी आंखें खुली। बहुत सारे लोग दरवाजे पर सामान लिए खड़े थे, मुझे लगा मुंबई आ गया है, मैंने पापा को आवाज़ लगाई, “पापा चलो, स्टेशन आ गया।” और पापा बोले, “अरे, अभी तो 2 घंटे हैं, सो जा।” पापा यह कहकर फिर से सो गए। मुझे नींद ही नहीं आ रही थी, मुझे तो हर आहट से लग रहा था कि जैसे मुंबई आ गया।

और फिर सच में, मुंबई आ गया। इसे जादू की नगरी भी कहते हैं, क्या यहां जादू होता है? मैं मन ही मन सोची। काली टैक्सी लेकर हम सब पापा के साथ उस होटल गए जहां का पता ऑफिस से मिला था। रास्ते में बहुत ट्रैफिक था, इस ट्रैफिक में शायद कोई हीरो दिख जाए, इस खयाल से मन ही मन हंसी आ गई।

होटल का कमरा बहुत बड़ा था, एक पलंग, टेबल, टी.वी. और पंखे से लैस। होटल से समंदर दिख रहा था। ओह माय गॉड! इतना बड़ा और इतना सुंदर! पापा बोले कि हम लोग चौपाटी जा रहे हैं। “चौपाटी में क्या है पापा? समंदर…?” पापा की “हां” ने मन में एक उछाल भर दी। हम सब टैक्सी में बैठने के लिए तैयार हो गए। रास्ते में बहुत सारी बिल्डिंगें थी, लाल रंग की बसें चल रही थीं, लोग कुछ अलग भाषा बोल रहे थे। पापा ने बताया कि यहां के लोग मराठी बोलते हैं। मैं बोली, “पापा, यह तो हिन्दी की तरह लग रही है!” पापा बोले, “हां, सही पकड़े हैं।”

थोड़ी देर में चौपाटी आ गई, हमने भागना शुरू कर दिया। पानी के पास जाकर हमारे कदम रुक गए। रेत पैरों में चिपक गई, पैर रेत में धंसने लगे। लहर आई और पैरों को भिगोकर चली गयी। पानी का यह अहसास बहुत सुकून दे रहा था। हम एक-दूसरे का हाथ पकड़े आगे बढ़ते ही जा रहे थे, दिल कर रहा था और आगे, और आगे… तभी पापा की आवाज़ आई, “रुक जाओ।” हमारे कदम रुक गए। हम तीनों वहीं हाथ पकड़ के बैठ गए। हम एक-दूसरे पर पानी उछाल रहे थे। पीछे से मम्मी-पापा आए और हम पर पानी डालने लगे। उस समय मम्मी-पापा हम जैसे ही बच्चे लग रहे थे।

मैं वहीं किनारे पर लेट गई। पानी में अपने आप को डुबो देना अच्छा लग रहा था। तभी पैरों तले कुछ अहसास हुआ, छोटी-छोटी सीपियां थी। मैंने उन्हें झट से उठाया और कृति और हर्ष को दिखाने लगी, वे दोनों भी सीपियां ढूंढने लगे। अपनी सीपियों को मैंने जींस की जेब में डाल दिया। पता नहीं कितनी देर हम लोग वहां रहे। मम्मी जब चलने के लिए बोली तब हमने थोड़ी देर और रुकने के मना लिया। लेकिन कब तक… आखिर हमें उठना ही पड़ा। सूरज को इन दस दिनों में बहुत अच्छी तरह से निकलते और डूबते देखा, बिलकुल सपने की तरह।

जितने दिन वहां रहे, रोज़ाना समंदर के किनारे गए। रेत में घर बनाते और उन्हें तोड़ते और फिर बनाते। वे सारी सीपियां आज भी याद के तौर पर हमारे पास हैं।

नंदिनी, उम्र 13 साल।  राजकीय सह शिक्षा उच्च माध्यमिक विद्यालय, खिचड़ीपुर गाँव, नई दिल्ली, में आठवीं कक्षा की छात्रा हैं। अंकुर कलेक्टिव की नियमित रियाज़कर्ता है।

फोटो आभार: शारिब अली ;फोटो प्रतीकात्मक है।

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