बेंगलुरू की घरेलू महिलाओं की कहानी जो सेक्स वर्क से चला रही हैं अपना घर

Posted by 101reporters in Hindi, Sex Work, Staff Picks
July 10, 2017

मैं अनपढ़ हूं और ना मेरे पास कोई खास हुनर है। परिवार चलाने के लिए मुझे पैसे चाहिए। अब यही (सेक्स वर्क) मेरा काम है और मुझे इसपर गर्व है क्योंकि परिवार के लिए मैंने काफी कुछ कुर्बान किया है। जया प्रभा (बदला हुआ नाम) ये सबकुछ बेहद ही शांत और साहसी मुद्रा में बता रही थी।

जया के लिए सेक्स वर्क से बड़ा पाप अपने बच्चों को भूखा मरते देखना है।

जया बेंगलुरु के उन हज़ारों महिलाओं में से एक हैं जो अपनी और अपने परिवार की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए सेक्स वर्क करती हैं। इस शहर में कोई भी सेक्सवर्कर एक दिन में ₹500 से ₹3,000 तक कमा सकता/सकती है। इस काम में ज़्यादातर महिलाएं अनपढ़ और आर्थिक रूप से कमज़ोर बैकग्राउंड से आती हैं।

कमला नाईक (बदला नाम) के पास पति के एक्सिडेंट के बाद सेक्स वर्क के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं था। उसके पति ने भी उसके फैसले का समर्थन किया। शायद इसके अलावा उस परिवार के पास पेट भरने का कोई और चारा नहीं था।

लेकिन कमला बताती है कि सेक्स वर्क पैसे कमाने के लिए उसकी पहली पसंद नहीं थी। 2010 में एक्सिडेंट के कारण डिसेबल्ड होने की वजह से कमला का पति काम पर दुबारा नहीं जा सकता था। कमला सिलाई में माहिर थी इसलिए सबसे पहले एक कपड़ा फैक्ट्री में नौकरी की। लेकिन 5 हज़ार महीने की नौकरी पेट भरने और शरीर ढकने के लिए काफी नहीं थी।

उसकी एक दोस्त सेक्स वर्कर थी और महीने का 10 से 12 हज़ार रुपया कमा लेती थी। कमला को पैसों की काफी ज़रूरत थी और इसलिए कमला ने अाखिरकार नौकरी बदल ली।

वो बताती है ”सेक्स वर्कर की तरह काम करने पर ना सिर्फ मैंने अपने पति का मेडिकल बिल चुका दिया बल्कि मेरे पास उनका ख़याल रखने के लिए काफी समय भी बचने लगा।”

लक्ष्मी (बदला हुआ नाम) की कहानी कमला से अलग है। उसके परिवार में ये बात किसी को नहीं पता है कि वो एक सेक्स वर्कर है। लक्ष्मी का घर बेंगलुरु में नहीं है लेकिन उसका काम बेंगलुरु में ही है। हर दिन वो लगभग 30 किमी का सफर तय कर बेंगलुरु के मजीस्टिक बस स्टैंड पहुंचती हैं। वहां वो अपने ग्राहकों से मिलती है और 2.30 बजे तक अपना काम खत्म कर लेती है ताकि वक्त पर घर पहुंचा जा सके।

38 साल की लक्ष्मी कहती हैं ”मेरे पति और बच्चों को लगता है कि मैं शहर जाकर घरेलू काम करती हूं। सिर्फ मेरे ग्राहक और दूसरे सेक्स वर्कर्स को ये हकीकत पता है। ये दोहरा जीवन मैं लगभग 8 सालों से जी रही हूं। मैंने ये प्रॉफेशन अपनाया क्योंकि मैं अपने तीनों बच्चों को अच्छी शिक्षा देना चाहती हूं।

मैं ग़रीबी से बहुत डरती हूं, मेरे पति बढ़ई का काम करते हैं और महीने का 12 हज़ार कमाते हैं, जो की 5 लोगों के परिवार के लिए काफी नहीं है।

घर चलाना कठिन काम है

ट्रांसजेंडर अधिकारों के लिए लड़ने वाली निशा गुलुर सेक्स वर्कर के साथ काफी काम करती हैं और उनका कहना है कि दरिद्रता ऐसा अभिशाप है कि एकबार ये महिलाएं पैसा कमाना शुरू कर देती हैं तो परिवार और समाज से इन लोगों को इज़्जत मिलने लगता है।

आर्थिक आज़ादी इन महिलाओं का रुतबा बढ़ा देती है और एक महिला के तौर पर इनकी पहचान को और मज़बूत करती है। कपड़ा और अगरबत्ती फैक्ट्रियों में जहां जया की तरह गरीब महिलाएं ही काम करती हैं, दिन में काफी देर तक काम करवाया जाता है, और उसके एवज में पैसे नाम मात्र के दिए जाते हैं। शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न काम का एक हिस्सा बन जाता है। लगभग यही हालत घरेलू काम में हाथ बटाने वाली महिलाओं का भी है।

गुलुर कहती हैं, मैं ये दावा नहीं कह रही कि सेक्स वर्क में सब अच्छा है। ग्राहकों और पुलिस के द्वारा उत्पीड़न और हिंसा का रिस्क इस प्रोफेशन में पहले दिन से होता है।

गरीबी ही काम तय करती है

”इस फील्ड में मेरे लंबे अनुभव के दौरान मैं ज़्यादातर दलित और नीची जाति की महिलाओं से ही मिली हूं। और इसकी वजह साफ है, गरीबी। हालांकि लिंगायत और वोक्कालिगा जैसे मज़बूत समुदाय से भी महिलाएं इस फील्ड में हैं लेकिन वो बहुत कम हैं। हमारे पास कोई सटीक आंकड़ा नहीं है। इसलिए हम कर्नाटक के सेक्स वर्कर का जातिगत सर्वे करने की प्लानिंग कर रहे हैं।” –  भारती, कर्नाटक सेक्स वर्कर्स यूनियन (KSWU)।

कर्नाटक के राज्य AIDS नियंत्रण सोसायटी का कहना है कि राज्य में 85 हज़ार सेक्स वर्कर हैं। भारती, जिनकी संस्था सेक्स वर्कर्स को पहचान पत्र, सरकारी सुविधाओं  का लाभ दिलवाने और हिंसा के खिलाफ न्याय दिलाने का काम करती है वो बताती हैं कि KSWU के साथ जो थोड़ी सि सेक्स वर्कर्स महिलाएं रजिस्टर्ड हैं वो हाउस वाइफ हैं।

एक किताब है जिसका टाइटल है ”डेंजरस सेक्स, इनविज़िबल लेबर: सेक्स वर्क एंड द लॉ इन इंडिया” इस किताब में शादीशुदा भारतीय सेक्स वर्कर्स जो कि अपने परिवार और पति की जानकारी के बिना सेक्स वर्क से जुड़ी हैं की ज़िंदगियों के बारे में काफी विस्तार से लिखा गया है।  ये किताब डॉ. प्रभा कोटीस्वरण के द्वारा लिखी गई है। ये पुरस्कृत किताब कोलकाता और तिरुपती पर किये गए रिसर्च पर आधारित है।

बेंगलुरु में काम करने वाले एक और एक्टिविस्ट नागासिम्हा राउ इस बात पर और गंभीरता से बता रहे हैं कि ज़्यादातर शादीशुदा हाउसवाइफ ही क्यों सेक्स वर्क में आ रही हैं। ”शहरी गरीब परिवार में गृहणियों का काम बेहद मुश्किल होता है। उनमें से बहुत महिलाओं को पति की तरफ से काम करने की भी इजाज़त नहीं होती लेकिन उन्हें घर चलाना होता है, साथ ही साथ बच्चों की ज़रूरतों का भी ख़याल रखना पड़ता है। और भारत में मज़दूरी बहुत कम है, कम से कम ज़िंदगी कि ज़रूरतों को पूरा करने के लिए तो काफी कम। इसलिए घरेलू महिलाओं को सेक्स वर्क की तरफ आकर्षित करना ज़्यादा आसान होता है। यहां दिन भर काम किये बिना अच्छे पैसे कमाने की ज़्यादा संभावना है।”

एकबात तो साफ है कि सदियों से जाति, वर्ग, और आर्थिक दमन के कारण ही ढेरों हाउसवाइव्स ने इस काम को अपनाया है। और शायद इस सवाल का कोई बहुत आसान जवाब है भी नहीं। जैसा के जया के इस सवाल से ज़ाहिर है मैं इस धंधे से बाहर निकलना चाहती हूं, लेकिन नहीं निकल सकती। मैं क्या करुं? मुझे कौन एक अच्छी सैलरी वाली नौकरी देगा/देगी?

लेखक परिचय- मैत्रयी बोरुआ बेंगलुरु की एक फ्रीलांस पत्रकार हैं और 101Reporters.com की एक वरिष्ठ सदस्य हैं। मैत्रयी ह्यूमन राइट्स और समामाजिक विषयों पर काफी काम कर चुकी हैं।

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