आखिर और कितनी लड़कियों की हत्या का दोषी बनेगा यह समाज?

Posted by Rachana Priyadarshini
August 28, 2017

Self-Published

कभी सोचती हूं, तो यकीन कर पाना मुश्किल होता है कि आज भी हमारे सभ्य और शिक्षित कहे जाने वाले भारतीय समाज का एक बड़ा तबका भ्रूण हत्या जैसे घिनौने काम को समर्थन या अंजाम देता होगा. पर कुछ दिनों पहले मेरा सामना ऐसी ही एक कड़वी हकीकत से हुआ, जब मैं शहर के एक मशहूर गायनोकॉलोजिस्ट के पास किसी काम से गयी थी. जब मैं वहां पहुंची तो वहां पहले से ही काफी भीड़ लगी थी. इसके बावजूद डॉक्टर साहिबा सब मरीजों को एक-एक कर पर्याप्त समय देकर उनकी समस्याएं सुन रही थीं और उन्हें उचित सलाह दे रही थीं. इसी दौरान उनके पास एक औरत आयी. वह देखने में पढ़ी-लिखी और किसी ऊंचे घराने की लग रही थी. मंहगे कशीदाकारी का सलवार-सूट, पैरों में चमचमाती सैंडिल, हाथों में सोने के कंगन और हाथों में लटका पर्स उसकी आर्थिक स्थिति की  बखूबी गवाही दे रहा था. हालांकि चेहरे पर कोई खास रौनक नहीं थी. कमजाेर सी नजर आ रही थी. जब उसकी बारी आयी, तो डाॅक्टर ने उसकी रिपोर्ट देखते हुए पूछा – “कितने महीने का गर्भ है? “

महिला -“छह महीने.”

डॉक्टर (रिपोर्ट के अन्य पेज को पलटते हुए)-” इससे पहले भी चार बार अबॉर्शन भी करवा चुकी हो?”

महिला – “जी हां.”

डॉक्टर -“आखिर क्यों? क्या तुम्हें यह नहीं मालूम कि अबॉर्शन का औरत के शरीर पर कितना बुरा प्रभाव पड़ता है. तुम्हारी जान भी जा सकती थी.”

महिला- “जी पता है.”

डॉक्टर (आश्चर्य से)- “कमाल है. पता होते हुए भी तुमने ऐसा रिस्क लिया. क्या तुम्हें कोई प्रॉब्लम हो रही थी या गर्भ नहीं ठहर रहा था. आखिर जानबूझ कर ऐसा खतरा मोल लेने की वजह क्या थी. देखने में तो तुम पढी-लिखी और समझदार लग रही हो. फिर ऐसी बेवकूफी करने की वजह जान सकती हूं?”

महिला (सकुचाते हुए)- “मैडम मेरी पहले से दो लड़कियां हैं. इस बार मेरे पति को लड़की नहीं, बल्कि लड़का चाहिए था, इसलिए ऐसा करना पड़ा. पिछले तीन बार अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में पता चला कि गर्भ में लड‍़की है, तो इन्होंने अबॉर्शन करवा दिया.”

उस महिला का जबाव सुन कर केवल मैं ही नहीं, बल्कि शायद डॉक्टर भी अवाक रह गयीं. उन्होंने तुरंत ही उसके साथ आये उसके हसबैंड को अंदर बुलवाया और आते ही पूछा- देखने में तो आप पढ़े- लिखे और अच्छे घर से लग रहे हैं. आपको देख कर तो ऐसा नहीं लगता कि आप इतनी बड़ी बेवकूफी कर सकते हैं. क्या आपको अपनी बीवी से जरा भी प्यार नहीं है.

डॉक्टर के मुंह से अचानक ऐसी बातें सुनकर वह हड़बड़ा गया. पूछने लगा-“क्या बात है मैडम?” तब डॉक्टर ने उसे उसकी पत्नी का लगातार तीन बार अबार्शन करवाने के बारे में पूछा. महाशय का कहना था-“ऐसा है मैडम हम फैमिली प्लानिंग कर रहे थे.”

डॉक्टर ने कहा-“अगर ऐसी बात है, तो आपकी पहले से ही दो बेटियां हैं. आज के समय में लोग एक बच्चे ही चाह रहे हैं और आपके पास दो ऑलरेडी दो हैं.”

इस पर महिला के पति नेे जो कहा, उसे सुन कर तो मेरा पारा और भी गर्म हो गया. कहा-“मैडम फैमिली तो तभी कंप्लीट होगी न, जब बेटी के साथ-साथ बेटियां भी हों. बेटियों को तो एक दिन ससुराल ही चले जाना है. आखिरी समय में बुढापे का सहारा तो बेटा ही बनेगा न.”

डॉक्टर ने पूछा- “अगर इस बार भी गर्भ में लड़की हुई तो‍?”

महिला का पति- “डोंट वरी मैम. इस बार लड़का है. हमने अल्ट्रासाउंड करवा लिया है. तभी आपके पास आये हैं. डिलीवरी आपके पास ही करवाना चाहते थे.” डॉक्टर ने उसके आगे बगैर कुछ बोले अपनी असिस्टेंट को उस महिला का मेडिकल केस रजिस्टर्ड करने को कहा और फिर कुछ केबिन से बाहर निकल गयीं. उस वक्त मेरा मन तो किया कि मैं भी बाहर जाऊं और उस महिला के पति को खींचकर उसके गाल पर जोर के आठ-दस तमाचें जड़ दूं.

भारत में लड़कियों की हत्या कोई नयी बात नहीं है. गर्भ में आने से पहले ही इसे मारने की प्लानिंग शुरू हो जाती है. अगर किस्मत से गर्भ से निकल आयी, तो फिर कभी बलात्कार करके उसकी आत्मा को मारने की कोशिश की जाती है, तो कभी दहेज के कारण उनका शरीर जला दिया जाता है. पर कितने शर्म की बात है न कि पढ़-लिखे लोग भी आज तक इस पूत्रमोह के पूर्वाग्रह से मुक्त नहीं हो पाये हैं. इनसे तो लाख गुना  अच्छे वैसे रिक्शा-ठेला चलानेवाले या फिर मजदूरी करनेवाले लोग हैं, जो कई बार ऐसे ऊंचे घरानों से फेंके गये मासूमों को अपने गरीबी के आंचल में पनाह देते हैं. मुझे आज भी याद है वह दिन जब मेरी सबसे छोटी और पांचवी बहन पैदा हुई थी (निश्चित रूप से मेरे माता-पिता के पुत्रमोह की ख्वाहिश में). उस रोज मम्मी के हॉस्पिटल से वापस आने पर मेरे पड़ोस में रहनेवाले अंकल ने पापा से पूछा था-“क्या हुआ भइया?” मेरे पापा ने रूआंसे स्वर में जबाव दिया- “वही पुराना रिजल्ट है.” उनके मुंह से इस बात को सुन कर मेरा खून खौल उठा था. मैं पापा से खूब लड़ी थी उस वक्त कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा. इसका मतलब वे हम बाकी चारों बहनों से प्यार नहीं करते? क्या हमारे होने का भी उन्हें अफसोस है? इसी गुस्से में कई दिनों तक मैंने पापा से बात नहीं की थी. बाद में उन्हें खुद भी अपनी गलती का एहसास हुआ, तो उन्होंने अपने कहे पर अफसोस भी किया. वह दिन और आज का दिन फिर पापा ने कभी ऐसा नहीं कहा. ना ही बेटी होने की वजह से उन्होंने हमाारे परवरिश में कभी कोई कमी छोड़ी. हमें खूब पढ़ाया-लिखाया और इस काबिल बनाया कि आज हम सभी बहनें अपने-अपने पैरों पर खड़ी हैं और अपने जीवन के निर्णयों को लेने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र हैं. फिर भी आज भी जब कोई उनसे इस बारे में सवाल-जबाव करता है, तो उनके चेहरे पर यह टीस मुझे साफ दिख जाती है.

समझ नहीं आता कि आखिर क्यूं और कब तक लोग इस पुत्रमोह के पूर्वाग्रह से पूरी तरह मुक्त हो पायेंगे? क्या गुनाह है गर्भ में पल रही उन नन्हीं कलियों का, जिनका बीजारोपण लोग अपनी खुशी और वासना के आवेग में करते हैं और फिर दुनिया में आने से पहले ही अपने मतलब के लिए बेदर्दी से उनका कत्ल कर देते हैं. आज कहने को हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं. तकनीक और सभ्यता के मामले में निरंतर आगे बढ रहे हैं, पर हमारे विचार, हमारी सोच पर आज भी पिछड़ेपन की मुहर क्यूं लगी है? क्यूं हर साल 2000 से भी ज्यादा मासूमों को जन्म लेने से पहले ही मार दिया जाता है? सिर्फ इसलिए कि ऐसे लोगों को अपनी वंशबेल बढ़ाने और मोक्ष दिलवाने के लिए एक अदद बेटा चाहिए. छि…..! लानत है ऐसे लोगों पर और उनके ऐसे घटिया सोच पर. आज बेटियां हर कदम पर मां-बाप का साथ निभा रही हैं.  जीते-जी बुढापे में उनका सहारा ही नहीं बन रही, बल्कि मरने के बाद उनकी अर्थी को कांधा भी लगा रही हैं और उनके मोक्ष के लिए तर्पण भी कर रही हैं, इसके बावजूद बेटों की ऐसी निर्मम चाह क्यूं? लोग यह क्यों नहीं समझने को तैयार हैं कि बेटा या बेटी होना उनके अपने वश में नहीं हैं. यह तो पूरी तरह से एक प्राकृतिक जैविकीय प्रक्रिया है और अगर हम प्रकृति के खिलाफ जायेंगे, तो एक न एक दिन प्रकृति तो अपना बदला लेगी ही-फिर चाहे वह बाढ़, आकाल, आंधी, तूफान के रूप में ले या फिर घटते लिंगानुपात के रूप में….

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