आजादी का कत्लेआम (भाग 5)

Self-Published

20-फरवरी-1947 के दिन, इंग्लैंड की पार्लियामेंट में एक घोषणा की गयी की मॉन्टबत्तेन (Mountbatten) भारत के आखरी वाइसराय होंगे जो की अंग्रेज सरकार का नेतृत्व करेगे, इसी के साथ यह भी घोषणा की गयी की मॉन्टबत्तेन (Mountbatten) की मुख्य जवाबदारी होगी की ये सकुशल और सही सलामत सरकार की सारी गतिविधियों को, भारत सरकार को सौप कर, भारत देश को आजाद कर दे, लेकिन इसी के साथ इसकी समय सीमा जून 1947 भी निश्चित की गयी. लेकिन, भारत देश की मुख्य दो पार्टिया कांग्रेस और मुस्लिम लीग, के बीच का असंतोष और मुस्लिम लीग द्वारा धर्म के आधार पर हिंदुस्तान और पकिस्तान, दो देशों की मांग जिसे अभी तक के कार्यरत वाइसराय सुलझा नही पाये थे, ये Mountbatten के लिये सबसे बड़ी चुनोती थी. (मिशन ऑफ़ Mountbatten, पेज 1) इस ऐलान के साथ भारत देश में, जो की पिछले 200 साल से अंग्रेज हकूमत की गुलामी कर रहा है और ना जाने आजादी के लिये कितने आंदोलन हुये, फांसी से लेकर कालेपानी की सजा हुई, स्वभाविक रूप से इस घोषणा के साथ, भारत देश और इसकी प्रजा में आनंद की लहर छा जानी चाहिये थी, हर्ष उल्लास का वातावरण होना चाहिये था, मिठाईया बाटनी चाहिये थी, लेकिन भारत देश, अपने बटवारे की और बढ़ रहा था और इसे निश्चित करने के लिये हिंदू और सिख एक तरफ खड़े थे और मुस्लिम समाज दूसरी तरफ, हाथो में हथियार लाजमी थे, लगता था की ये बटवारे की लकीर एक दूसरे के खून से लिखेगे. लेकिन यँहा भी एक आम आदमी ना होकर, आरएसएस, अकाल फ़ौज और मुस्लिम लीग नेशनल गार्ड, एक दूसरे के सामने हिंदू, सिख और मुस्लिम का मखोटा पहन के खड़े थे. आग लगी हुई थी, शहर में कर्फ्यू था और छुरेबाजी की घटना आम हो गयी थी.

मार्च 1947 की शुरुआत में ही, पंजाब सरकार को भंग कर दिया गया था और मुस्लिम लीग को किसी भी तरह ना तो अकाली दल और ना ही Unionists Party भी मुस्लिम लीग को अपना समर्थन नही दे रही थी, नतीजन गवर्नर रूल को पंजाब में लगा दिया गया, दोनों पक्षो से राजनीतिक बयानबाजी रुकने का नाम नही ले रही थी, मुस्लिम लीग पाकिस्तान की मांग पर अड्डा हुआ था और सिख अकाली दल इसका पूरे जोर विरोध कर रहा था, अब माहौल इस तरह था की कानून व्यवस्था का कोई भी मालिक नही था और जो था वह अंग्रेज कुछ ही महीनों बाद भारत छोड़ने की अपनी नीति पर काम कर रहा था, मसलन एक तरह से ऐसा वातावरण था, जँहा अपराध पनप सकते है और ऐसा हो भी रहा था, पंजाब के जगह जगह अमृतसर, लाहौर, लुधियाना, जालंधर, इत्यादि जगह पर कुछ एक ही समय और एक ही तरह से छुरेबाजी और आगजनी की घटनाओं में एकदम से इजाफा हो गया था (http://www.sikhiwiki.org/index.php/MARCH,_1947), इसी तरह भीड़ को शांत करवाने की कोशिश में, अकाली दल के सर्वोच्च नेता बाबु लाभ सिंह की किसी ने छुरा मारकर हत्या कर दी और इल्जाम एक मुस्लिम नोजवान पर आया, अब सिख और मुस्लिम समुदाय दोनों एक दूसरे के खिलाफ आग उगल रहे थे, जंहा एक दूसरे समुदाय की महिलाओं को उठाने की और मर्दो और बच्चो को मारने की धमिक्या दी जा रही थी, यँहा आवाज सुनाई देती थी ना की कोई चेहरा दिखाई देता हो, इसी सिलसिले में दोनों तरफ फैक्ट्री में हथियार बनाये भी जा रहे थे और नोजवानो में बाटे भी जा रहे थे, अब रावलपिंडी से लेकर लुधियाना तक पूरा पंजाब जल रहा था.  मार्च 5 से लेकर 13 मार्च तक हजारो की तादाद में जाने गयी, खास कर पश्चिम पंजाब में रावलपिंडी, सरगोधा, इत्यादि जगह पर, सिख और हिंदू समुदाय के नागरिकों का कत्ल, बलात्कार, धर्म परिवर्तन जैसी घटनाओं को अंजाम दिया गया, हद तब हो गयी जब एक भी मुस्लिम लीग के नेता ने इस कत्लेआम की निंदा तक नही की, रोकने की कोशिश तो दूर की बात है. (http://www.sacw.net/article2843.html) यँहा पुलिस बेबस की तरह खड़ी थी, सुचना का एक ही स्रोत था रेडियो जिस पर यकीन किया जा सके, कॉलेज और स्कूल बंद कर दिये गये थे और इन्हे रिफ्यूजी कैंप में बदल दिया गया था, अब यँहा घर से बेघर हुये हिंदू, मुसलमान और सिख, एक तरह आर्थिक, सामाजिक, हर लिहाज से शून्य हो गये थे. (https://books.google.co.in/books?id=TcgDAQAAQBAJ&pg=PT60&lpg=PT60&dq=babu+labh+singh+1947&source=bl&ots=B9_jSvsOsF&sig=gFGyDnxljiN8UOtrox1SN-OCeNg&hl=en&sa=X&ved=0ahUKEwj4pO3v0d3VAhUBtI8KHSa5DpYQ6AEIYTAN#v=onepage&q&f=false)

वही राजनीतिक गलियारों में कुछ और ही चल रहा था, 08-मार्च-1947 को कांग्रेस की वर्किंग कमेटी ने एक रेसोलुशन पास कर दिया जिसमे ये कहा गया था की मौजूदा हालात को देखते हुये, जंहा हिंसा बेथाम जारी है, इस को रोकने के लिये कांग्रेस पंजाब को मुस्लिम और गैर-मुस्लिम में बाटने का प्रस्ताव पारित करती है, इसका विरोध सिख राजनीतिक पार्टियों ने किया और 11-मार्च-1947 को एंटी पाकीस्तान डे मनाने का ऐलान किया गया, जंहा सिख, हिंदू और तो और कांग्रेस के कार्यकर्ता भी जुड़े, यहाँ मुस्लिम लीग भी इस बटवारे का विरोध कर रही थी लेकिन इसका अपना एक तर्क था की पूरे पंजाब को पकिस्तान में शामिल कर दिया जाये, जिन्हा का इस मांग के पीछे का कथन भी था की 1947 मार्च तक, पंजाब के सभी लगभग सभी जिल्लो में या तो मुस्लिम आबादी बहुताय थी या समांतर, ऐसे बहुत कम जिल्लै थे जंहा मुस्लिम आबादी अलप समाज में थी. (https://www.google.co.in/url?sa=t&source=web&rct=j&url=http://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/2087/14/14_chapter%25202.pdf&ved=0ahUKEwjpzNXl7t3VAhXBQo8KHatfCsAQFgiAATAQ&usg=AFQjCNHxhenWah_tfM9BBDSJ5_Ic2V2mDw) पेज 52, 53, 54 इसी बीच नेहरू ने एक और उपाय सुझाया, 24-मार्च-1947 को, नेहरू ने कहा की मौजूदा पंजाब को तीन हिस्सों में बाट देना चाहिये मुस्लिम बहुसंख्यक, गैर मुस्लिम बहुसख्यंक और मिक्स आबादी, लेकिन ये उपाय भी ज्यादा कबूल नही हुआ, इसी बीच, मुस्लिम आबादी को देखते हुये, अब पकिस्तान की मांग को ठुकराया नही जा सकता, इस कथन को समझते हुये शिरोमणी अकाली दल की वर्किंग कमेटी ने 16-अप्रैल-1947, को पंजाब के बटवारे के कांग्रेस के रेसोलुशन को स्वीकार कर लिया, अब दरियाई सूबा, पंजाब में बटवारे की लकीर का लिखना लगभग तय हो गया था, इसी के दबे लब्जो में कांग्रेस ने पकिस्तान की मांग को भी स्वीकार कर लिया था (https://www.google.co.in/url?sa=t&source=web&rct=j&url=http://www.global.ucsb.edu/punjab/sites/secure.lsit.ucsb.edu.gisp.d7_sp/files/sitefiles/journals/volume14/no2/kamran.pdf&ved=0ahUKEwjpzNXl7t3VAhXBQo8KHatfCsAQFghvMA4&usg=AFQjCNG4nUXgSv8g_zeMizSkTfa9zlTR6g) पेज 194. लेकिन 24-मार्च-1947, को मॉन्टबत्तेन (Mountbatten)  के वाइसराय बनते ही, मार्च के आखिर तक कांग्रेस द्वारा पंजाब के विभाजन की स्वीकृति को इंग्लैंड की सरकार के पास विचार के लिये भेज दिया था.

इसी के बाद मॉन्टबत्तेन (Mountbatten) ने अपने सहयोगियों के साथ बटवारे का एक  प्लान बनाया जिसे डिकी बर्ड का नाम दिया, इस में कहा गया था ब्रिटिश हकूमत, भारत और पकिस्तान को आजाद करने से पहले उन सभी राजसी सक्ताओ को आजाद कर देगी जैसे मद्रास, बॉम्बे, पंजाब इत्यादि को सबसे पहले आजाद कर देगी और बाद में ये खुद तय करेगे की इन्हे आजाद रहना है या हिंदुस्तान या पकिस्तान में शामिल करना है, ये प्लान बिना नेहरू और जिन्हा, या किसी भी भारतीय नेता के साथ साँझा नही किया गया और सीधा ब्रिटैन में स्वीकृति के लिये भी भेज दिया गया था. एक शाम जब Mountbatten की रिहाइश शिमला में थी और नेहरू के साथ बाकी सभी भी Mountbatten के मेहमान थे, लेकिन सभी मेहमानों के जाने के बाद, जब सिर्फ नेहरू और Mountbatten ही रह गये थे, तब Mountbatten ने इस प्लान की चर्चा अपने इस मेहमान से की लेकिन इसे सुनते ही नेहरू को ये प्लान रास नही आया और उन्होंने उस प्लान के संदर्भ में अपनी नाराजगी और अस्वीकृति प्रकट की, जिसे सुनकर तुरंत Mountbatten ने इंग्लैंड सरकार को अपने इस प्लान के रद्द करने की जानकारी दी, ये प्लान कैंसल हो गया और इसी कारण इसका नाम प्लान बाल्कन भी रखा गया. अगर ये प्लान कही हकीकत बन जाता तो हो सकता है आज भारत और पकिस्तान के सिवा और भी देश होते लेकिन क्या आगजनी और कत्ल और पलायन ना होता, ये सवाल का शायद ही किसी के पास जवाब हो, खेर इसके बाद भारत को आजाद करने का एक और प्लान आया जिसने भारत की आजादी के साथ साथ इसका बटवारा कर पकिस्तान को भी एक देश होने हकीकत पर मोहर लगा दी. (https://www.gktoday.in/dickie-bird-plan-1947/)

इस लेख के लिये प्रेरणा स्त्रोत बने सरदार सुखदीप सिंह बरनाला Rising Punjab का तहदिल से धन्यवाद

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