आजादी का कत्लेआम (भाग 6)

Self-Published

पंजाब, आखिर ये सूबा बटवारे में सबसे ज्यादा चर्चित सूबा क्यों बनकर उभरा था ? हर आम और ख़ास की यही दिलचस्पी थी की पंजाब किस और करवट लेगा, आज जब देश की आजदी को दशकों बीत गये है तब भी, बटवारे पर लिखी गयी बहुत सारी किताबो में पंजाब के विभाजन पर सबसे ज्यादा लिखा गया है, इसकी वजह थी पंजाब की भौगोलिक स्थिती, अगर हम 1947 के पहले का पंजाब नक़्शे में देखे, पंजाब की दिशा पर कश्मीर निर्भर करता था, मसलन जिस और पंजाब जायेगा वही देश, हिंदुस्तान या पकिस्तान, का एक तरह से कश्मीर पर कब्जा होना निश्चित था और इस सिथ्ती में कश्मीर से बहते सारे दरिया जो की पंजाब से होकर गुजरते थे, उस पर अधीकार भी उसी देश का होना था जिस का पंजाब पर कब्जा होगा. यँहा एक कथन पर गौर करने की जरूरत है 1947 से पहले का अभिभाजीत भारत कृषि प्रधान देश था और सारी व्यवस्था खेती पर ही निर्भर थी, मसलन जिस और पानी बहेगा उसी और हरियाली और खुशहाली होगी, यँहा पंजाब का मतलब अर्थ व्यवस्था भी था, यही वजह थी की जिन्हा पकिस्तान में अभिभाजीत पंजाब को शामिल करना चाहते थे वही पाकिस्तान की आड़ में हिंदू देश, हिंदुस्तान की रखी जा रही नींव में, कांग्रेस, आरएसएस और हिंदू सभा पंजाब का मोती जड़ना चाहते थे.

1947 का मार्च गुजर चुका था,भारत के नये बने वाईसराय Mountbatten ने कांग्रेस का प्रस्तावित पंजाब के विभाजन का मत्ता अपनी इंग्लैंड की सरकार को भेज दिया था, Mountbatten अपनी तय समय सीमा जून 1948 से पहले किसी भी हालत में भारत से ब्रटिश साम्रजाय को खत्म कर भारत को आजाद मुल्क बनाना चाहते थे और उनका इसी दिशा में पहला कदम बाल्कन प्लान फ़ैल हो चूका था, लेकिन अब सरकारी दफ्तरों में जिस प्लान पर चर्चा चल रही थी, वह इतिहास बनने वाला था, पकिस्तान और हिंदुस्तान के बीच, पंजाब एक सैंडवीच में मीट की तरह कटने वाला था, लेकिन शायद ही इस समय किसी को इस बात का अंदाजा होगा की इस सैंडवीच में कलम के माध्यम से खीचने वाली लकीर से, लकीर के दोनों तरफ बेतहासा खून बहैगा और लाखों की तादाद में लोग पलायन करेगे. खेर, करोड़ो पंजाबी समाज के सांझा हिंदू, मुसलमान और सीख की तकदीर इस समय लिखी जा रही थी.

इस से पहले की हम इस आखिरी और सर्वसमित्त, प्लान पर रौशनी डाले उस से पहले, एक शख्श के बारे में जानना बहुत जरूरी है, ये शख्श, एक भारतीय अफसर था जो इस समय Mountbatten की उस टीम में शामिल था जो बटवारे के संदर्भ में अपनी योजना बना रही थी और ये वही शख्श था जो आजाद भारत में पहली कैबिनेट में बतोर उप प्रधानमंत्री बने सरदार वल्लभ भाई पटेल के बहुत नजदीक रहा और पटेल के साथ मिलकर इस शख्श ने आजाद भारत में मौजूद सारी सियासतों को भारत में मिलाने के कार्य में अहम योगदान दिया, इस शख्श का नाम था वीपी मेनन, मुख्यतह केरल से सम्बंधित, मेनन ही एक मात्र भारतीय थे जो Mountbatten की टीम में शामिल थे और ऐसा भी कहा जाता है की जिस प्लान पर भारत, पकिस्तान का बटवारा हुआ और इन दोनों के दरम्यान पंजाब को बाटा गया, वह प्लान वास्तव में मेनन द्वारा ही Mountbatten को सुझाया गया था, लेकिन मेनन की कांग्रेस से निकटता पर, ये सवाल तो जरूर उठता है की इस प्लान को बनाने में गुप्तचर रूप में ही सही क्या कांग्रेस का भी योगदान था ?

मई के दूसरे हफ्ते जब नेहरू, Mountbatten के शिमला स्थित घर में मेहमान थे और चर्चा के दौरान बाल्कन प्लान पर नेहरू ने पहले जुबानी और बाद में लिखित रूप से इस प्लान का पूरे जोर शोर से विरोध किया, नेहरू के इस बर्ताव से Mountbatten परेशान भी थे और हैरान भी, खेर Mountbatten ने फौरन इंग्लैंड सरकार को इस प्लान के रद्द होने की जानकारी दी, इसी समय मेनन भी इस कक्ष में शामिल थे, और Mountbatten को मेनन द्वारा ड्राफ्ट किये गये प्लान की भी जानकारी थी, एक तरह से ये B प्लान था की अगर बाल्कन प्लान रद्द हो जाता है तो मेनन द्वारा प्रस्तावित इस प्लान पर चर्चा होगी, मेनन अपने इस प्लान पर नेहरू के साथ एक दिन पहले ही चर्चा कर चुके थे और इसी प्लान के संदर्भ में पटेल से भी कई महीनों पहले चर्चा कर चुके थे, इस शाम नेहरू शिमला से रवाना होने वाले थे और मेनन के पास कुछ ही घँटों का समय था जब ये अपने इस प्लान को ड्राफ्ट कर नेहरू को दिखा सकते, मेनन अपने होटल गये और कुछ ही पलों में अपने इस प्लान को नेहरू के सामने लिखित रूप में पेश कर दिया, नेहरू एक तरह से इस प्लान पर सहमत थे लेकिन उन्होंने इस प्लान पर कांग्रेस में चर्चा के पश्चात ही कुछ आस्वासन देने का भरोसा दिया, वही हरकत में आते हुये Mountbatten ने इस प्लान को फौरन इंग्लैंड की अंग्रेज हकूमत के पास मंजूरी के लिये भेज दिया, वास्तव में मेनन का ये मानना था की भारत को हिंदू और मुस्लिम की तर्ज पर हिंदुस्तान और पाकिस्तान के रूप में बाट देना चाहिये, अगर यँहा किसी भी हालात में अविभाजित भारत रहता है तो आने वाले समय में घरेलू हिंसा और सिविल वार जैसे कत्लेआम हो सकते है. इस प्लान के मुताबिक़ बहुसंख्यंक मुस्लिम इलाको को पकिस्तान में और बाकी देश को हिदुस्तान के रूप में स्वीकृती मिल जाये. (https://defence.pk/pdf/threads/v-p-menon-the-forgotten-architect-of-modern-india.424021/

मेनन ने इस प्लान का पूर्णतः ड्राफ्ट तारीख 16-मई-1947, के दिन तैयार कर लिया था जिसका नाम हेड्स ऑफ़ एग्रीमेंट दिया गया. सबसे पहले वाईसराय Mountbatten को ये ड्राफ्ट दिखाया गया और Mountbatten की मंजूरी के बाद, इसे नेहरू, पटेल, बलदेव सिंह, जिन्हा, लियाकत अली खान और मिएविल्ले को दिखाया गया, इसके पश्च्यात खुद Mountbatten ने इन तमाम भारतीय नेताओं से अपरोक्ष रूप से इस प्लान पर राय मांगी, जंहा एक तरह से ये विभाजन का ये प्लान एक तरह से सभी को स्वीकार था. तारीख 18-मई-1947 के दिन, Mountbatten मेनन को अपने साथ लंदन लेकर गये जंहा ब्रिटिश सरकार और विपक्ष से इस प्लान पर चर्चा के बाद स्वीकृति लेनी थी. और ब्रिटिश शाशन ने भी इस प्लान पर अपनी मोहर लगा दी और तारीख 31-मई-1947 को Mountbatten मेनन के साथ भारत वापस परत आये. मेनन की नेहरू और खासकर पटेल से नजदीकी संभंध होने से ये कयास लगाये जा सकते है की मेनन द्वारा लंदन में हो रही हर मीटिंग की जानकारी नेहरू और पटेल को दी जाती होगी. (https://defence.pk/pdf/threads/v-p-menon-the-forgotten-architect-of-modern-india.424021/)

लेकिन, अभी जिन्हा और बाकी गैर कांग्रेसी नेतागण से इस प्लान पर Mountbatten को चर्चा करनी बाकी थी जिस पर ब्रिटिश सरकार ने हामी भर दी थी, दिनाक 02-जून-1947 को निर्धारित किया गया, जंहा वाइसराय हाउस (राष्ट्रपति भवन ) के एक कमरे वाइसराय स्टडी में आयोजित किया गया, जंहा टेबल के चारो और नेता गण बैठे है और साथ में थे Mountbatten, यँहा कांग्रेस की और से नेहरू, पटेल और आचार्य जेबी किरप्लनी थे वही मुस्लिम लीग की तरफ से जिन्हा, लियाकत अली खान और अब्दुल रब निश्तर थे और एक और नेता थे सरदार बलदेव सिंह जो की सिख समुदाय की पैरवी कर रहे थे, यँहा Mountbatten, ने इस प्लान की जानकारी देने के साथ इस कथन को भी स्वीकार किया था की अगर कोई भी कांग्रेस, लीग या बलदेव सिंह इस प्लान पर अपनी अस्वीकृति को दर्ज करते है तो ये प्लान यही रद्द कर दिया जाएगा, Mountbatten इस प्लान की जानकारी सभी नेताओं को दी, और नेहरू जो की इस प्लान से पहले ही वाकिफ थे, अपने कांग्रेस के मित्रो के साथ विचार विमर्श कर कुछ समय बाद अपनी स्वीकृति इस प्लान को दे दी, इसी तरह जिन्हा ने भी लीग के बाकी सर्वोच्च नेताओ के साथ विचार विमर्श कर इस पर अपनी सहमती दे दी, सरदार बलदेव सिंह वह अकेले सिख समुदाय की पैरवी कर रहे थे, जाहिर है इन्होंने किसी भी और सिख नेता से विचार विमर्श किये बिना अपनी स्वीकृति इस प्लान को दे दी, और उसी शाम मेंबर ऑफ़ कौंसिल डिफेन्स के पत्र पर, सरदार बलदेव सिंह ने Mountbatten को इस बात के लिये लिखीत में आस्वस्त किया की इन्होंने बाकी सभी सर्वोच्च सिख नेतागण के साथ इस प्लान पर चर्चा की है और हम सभी को ये प्लान स्वीकार है.यँहा एक तथ्य गोर करने की जरूरत है की बलदेव सिंह नेहरू के प्रति अपनी वफादारी का सबूत दे रहे थे, जिसका सबूत आजाद भारत की आजाद सरकार के पहले कैबिनेट में मिलता है. यँहा मुस्लिम लीग को पनिस्तान मिल रहा था, कांग्रेस को हिंदुस्तान और सिख को सिर्फ भरोषा की आजाद भारत में ये अपनी धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक, व्यपार, इत्यादी जीवन के मुलभुत अधिकारों की आजादी को आनंद ले सकेगे. खेर, सभी पार्टी के नेताओ द्वारा Mountbatten से इस प्लान को अभी सार्वजनिक ना करने की अपील, की गयी जिसे फ़ौरन Mountbatten ने मान भी लिया.(http://www.indiaofthepast.org/contribute-memories/read-contributions/major-events-pre-1950/267-acceptance-of-indias-partition-by-indian-leaders-june-2-1947)

इसी शाम 02-जून-1947 को Mountbatten, विशेष कर महात्मा गांधी से मिलने उनके आश्रम गये, इस दिन सोमवार होने से गांधी अपने निर्धारित मोन व्रत पर थे जिसे वह तभी तोड़ते थे जब कोई बीमार उनके आश्रम आ जाये या कोई बहुत अत्यंत जरूरी कार्य हो, इस दिन महात्मा ने अपना मोन व्रत नही तोडा और लिखकर Mountbatten से बात की, कहा जाता है की गांधी ने तीन अलग अलग पेज पर लिख कर Mountbatten के साथ सवांद किये जिसमे एक ही पेज सार्वजनिक है, जंहा आखिर में गांधी लिखते है की उन्हे Mountbatten से अत्यंत जरूरी दो कथनों पर विचार विमर्श करने है लेकिन आज नही. (http://www.indiaofthepast.org/contribute-memories/read-contributions/major-events-pre-1950/267-acceptance-of-indias-partition-by-indian-leaders-june-2-1947) अब ये तो संदेह करना भी गलत होगा की पटेल और नेहरू ने मेनन के प्लान के बारे में गांधी जी को पहले जानकारी नही दी होगी. लेकिन गांधी जी ने इस दिन   Mountbatten के प्लान पर कोई विचार विमर्श नही किया, यँहा ना भी नही थी लेकिन गांधी अक्सर सार्वजनिक सभाओं में कहा करते थे की देश का विभाजन उनकी लाश पर होगा, वह जिंदा रहते आखरी समय तक विभाजन का विरोध करेगे. इस समय 1946 और 47 में जब भारत देश साम्प्रदायिक तनाव में था, अगर गांधी जी चाहते तो वह विभाजन के खिलाफ कोई आंदोलन खड़ा कर सकते थे या अंशन के माध्यम से, लेकिन ऐसा हुआ हो ऐसा मेरी व्यक्तिगत जानकारी में नही है, इस समय भी, मसलन 1947 के जून में हिंदू, मुस्लिम, सिख समाज पर गांधी जी की बहुत गहरी पकड़ थी और अगर वह विभाजन के खिलाफ किसी भी मुहीम को आगाज करते तो निसंदेह पूरा देश उनके साथ खड़ा होता, पर अफ़सोस ऐसा हुआ नही. (https://thewire.in/118963/gandhi-message-mosque-temple/)

खेर, इस प्लान पर सभी की स्वीकृति के बाद, तारीख 03-जून-1947, को इस प्लान की घोषणा कज गयी. जंहा आल इंडिया रेडियो से Mountbatten, नेहरू, जिन्हा और बलदेव सिंह ने इस घोषणा में हिस्सा लिया और अपनी स्वीकृती के संदर्भ में अपना अपना पक्ष रखा. इस प्लान के मुताबिक, पंजाब और बंगाल के चुने हुये विधानसभा के सदस्य वोट द्वारा ये तय करेगे की बटवारे के पक्ष में है या नहीं, इसी तरह सिंध को अधिकार दिये गये. यँहा अगर बटवारे के पक्ष में वोट आते है तो 1941 की जन गणना के आधार पर मुस्लिम बहुसंख्यंक आबादी के इलाको को पकिस्तान में और बाकी इलाको को हिंदुस्तान में शामिल किया जायेगा. नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोवेंस में आम चुनाव रेफरेंडम द्वारा ये पता लगाया जायेगा की ये विभाजन के पक्ष धर है या नहीं. इसी तरह रेफरेंडम का मौका आसाम के सिल्हेत जिले को दिया जाएगा जंहा मुस्लिम आबादी बहुसंख्यंक है, ब्रिटिश बलचूसितांन पर गवर्नर जर्नल हालात का जायजा लेगे की यँहा किस तरह विभाजन के पक्ष और अपक्ष पर फैसला किया जा सकता है. अब प्लान बन गया था, अंग्रेज मेनन के इस प्लान पर, जिसे कभी ये स्वीकृती नही मिली की ये मेनन का प्लान है, मसलन एक भारतीय द्वारा सुझाये गये प्लान पर भारतीय मुसलमान, हिंदू और सिख ये फैसला स्वयं लेगे की उन्हे साथ रहना है या नही, इस प्लान से अंग्रेज सरकार ने इतिहास के पन्नो पर खुद को पाक साफ कर लिया, अब जो भी नतीजा आयेगा उसका अच्छा बुरा, उसके लिये दक्षिण एशिया के लोग खुद जिम्मेवार होंगे, इतिहास भी इन्ही के नाम से लिखा जाएगा. (http://www.indiaofthepast.org/contribute-memories/read-contributions/major-events-pre-1950/263-acceptance-of-indias-partition-by-indian-leaders-june-3-1947)

इस लेख के लिये प्रेरणा स्त्रोत बने सरदार सुखदीप सिंह बरनाला Rising Punjab का तहदिल से धन्यवाद

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