आजादी का कत्लेआम (भाग 7)

Self-Published

तारीख 03-जून-1947, के ऐलान में दो बाते एहम कही गयी थी, अब अंग्रेज हकूमत भारत देश को दिनाक 15-अगस्त-1947 के दिन आजाद कर देगी, मसलन ऐलान के कुछ 73 दिनों बाद, क्या 200 साल की हकूमत, 73 दिनों के अंदर, शांतिमयी तरीके से भारत को आजाद कर सकती थी ? ख़ुफ़िया रिपोर्ट, लगातार इस बात का प्रमाण दे रही थी, की भारत के कई इलाकों में जंहा बटवारे की गुंजाइस है वहाँ साम्प्रदायिक तनाव गहराता जा रहा है, क्या इन सभी तथ्यों से जानकार अंग्रेज सरकार, 15 -अगस्त-1947, को भारत के सवैधानिक आजाद होने के बाद अगले कुछ महीनों तक मसलन जून 1948 (जिसे अंग्रेज सरकार ने भारत को आजाद करने की आखरी तारीख तय की थी) तक, सुरक्षा बल, फ़ौज और न्याय प्रणाली को अपने अधीन रख सकती थी, जिससे बहुत ज्यादा शांतिमयी तरीके से भारत को आजाद किया जा सकता था और खासकर बटवारे की सूरत में ये उपाय बहुत कारगर था, लेकिन जमीनी हकीकत से वाकिफ, अंग्रेज सरकार ने क्यों आँखे बंद कर रखी थी, इस सवाल का कही ठोस जवाब नही मिलता.

03-जून-1947, के दिन एक और एहम ऐलान किया गया कि बटवारे की सूरत में एक बाउंडरी कमीशन बनाया जाएगा जो की 1941 की जनसंख्या के आधार पर हिंदुस्तान और पकिस्तान के बीच की लकीर मसलन जमीनी सीमा को तय करने के साथ दोनों देशों की हदो को भी निर्धारित करेगा, 03-जून-1947 के ऐलान के बाद सिख समुदाय कसमकस में था, पंजाब में तकरीबन 60 लाख की आबादी रखने वाला सिख समाज, रावलपीडी, ल्यारपुर से लेकर दिल्ली, यमुनानगर तक फैला हुआ था, पंजाब की आबादी का ये कुल 20% की हिस्सेदारी रखने वाला सिख समुदाय राजनीतिक गलियारों से लेकर व्यपारिक संसधान तक अपनी पकड़ रखता था, खासकर खेती के व्यवस्याय में पंजाब में सिख समुदाय सबसे अग्रिम था, मेहनत कस ये कोम, जो की शुरू से एकजुट थी, अब हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच खुद को उलझता हुआ देख रही थी, और सिख समुदाय को ये निश्चित हो चूका था की हिंदुस्तान और पकिस्तान के बटवारे के मध्यनजर, सिख समुदाय को बाटा जा रहा था. (Mission of Mountbatten, पेज 137.) तारीख, 09-जून-1947, को मुस्लिम लीग नै भी भारत के विभाजन पर अपनी मोहर लगा दी थी लेकिन, पंजाब और बंगाल के विभाजन पर लीग का विरोध था, ये दोनों परस्पर विरोधी ब्यान थे, अब तक लीग भी ये समझ चुकी थी की पंजाब और बंगाल का बटवारा तय है लेकिन किसी ना किसी माध्यम से लीग बाउंड्री कमसिन पर अपना दबाव

इसी बीच, Mountbatten का दफ्तर आने वालों दिनों की तैयारी कर रहा था, बहुत से मसले आ रहे थे जैसे की भारत देश के विदेशो में डिप्लोमैट कोन होंगे और किसकी मर्जी से होंगे, नेहरू की बहन श्रीमती पंडित  को मॉस्को में भारत का डिप्लोमैट बनाने का मामला काफी चर्चा का विषय बना था जिसका लियाकत अली ने विरोध किया था (Mission of Mountbatten, पेज 132.) इसी बीच, बटवारे को लेकर गांधी ने भी अपनी स्वीकृती दे दी थी, याद रहे, अगर यँहा गांधी अपने जिद्दी स्वभाव का उदाहरण देते और इस प्लान पर अपनी सहमती ना देते तो आज तारीख कुछ और हो सकती थी.  (Mission of Mountbatten, पेज 138.) खेर, अब वह दिन नजदीक आ रहे थे जब पंजाब और बाकी सूबे के विधायक को ये तय करना था की वह अविभाजित रहना चाहते है या अपने बीच बटवारे की लकीर को अंजाम देना चाहते है.

आखिर वह दिन मुक्कमल हुआ 23-जून-1947 को, जब पंजाब के चुने हुये विधायक विभाजन पर अपना वोट देंगे की इन्हे पंजाब अविभाजित चाहिये या ये पंजाब के विभाजन पर अपनी मोहर लगाते है. ऐसा कहा जाता है की वोट के समय विधानसभा में दो कक्ष बनाये गये एक तरफ पश्चिम पंजाब के 17 जिले थे जंहा मुस्लिम आबादी बहुसंख्यंक थी और दूसरी तरफ पूर्वी पाकिस्तान जँहा 12 जिले थे, यँहा मुस्लिम समाज अलप मत में था, विधानसभा के पश्चिम भाग की अध्यक्षता पंजाब विधानसभा के स्पीकर दीवान बहादुर एस.पी. सिंघा कर रहे थे जो की धर्म से ईसाई थे, इस पक्ष में मुख्यतः मुस्लिम नेता थे और पूर्वी भाग की अध्यक्षता सरदार पूरन सिंह कर रहे थे जो की एक सिख नेता थे, इस तरफ बहुताय हिंदू और सिख विधायक थे, वोट हुई और पंजाब के बटवारे का परिणाम भी आ गया, पश्चिम पंजाब विभाग में जंहा मुस्लिम नेता बहुसंख्यक थे यँहा पंजाब को अविभाजित रखने के लिये 69 वोट गिरे और विभाजन के पक्ष में 27, यँहा मुस्लिम लीग और ख़िज़्र टिवाणा सहित सभी Unionist 7 मुस्लिम विधायको और सिंघा सहित सभी ने पंजाब को अविभाजित रखने पर अपनी वोट दी, लेकिन दूसरी तरफ पूर्वी कक्ष में पंजाब को बाटने पर मोहर लगा दी थी, यँहा कांग्रेस और अकाली दल के हिंदू सिख नेताओ ने पंजाब को बाटने के पक्ष में 50 वोट आये और इसके विरोध में, मसलन पंजाब को अविभाजित रखने के लिये कुल 22 वोट डाले गये. अगर दोनों कक्ष का कुल परिणाम देखे तो 91 वोट पंजाब को अविभाजित रखने के पक्ष में आये थे जिसमे 88 जिन्हा की लीग समेत मुस्लिम विधायको के वोट पड़े थे. और पंजाब को बांटने के पक्ष में कुल 77 वोट गिरे जिसमे अधिकतर हिंदू, सिख और दलित वर्ग के विधायक थे. मसलन पूर्वी कक्ष द्वारा पंजाब के बटवारे पर मोहर लगाई गयी और यँहा हिंदू और सिख पंजाब को बांटना चाहते थे और मुसलमान विधायक पंजाब को अविभाजित. (http://dailytimes.com.pk/opinion/25-Nov-14/did-s-p-singhas-vote-win-punjab-for-pakistan-in-1947).

यँहा एक और विश्लेषण करने की जरूरत है की क्यों सिर्फ मुसलमान पकिस्तान को बनाने के लिये जिम्मेवार नही है, इसमे हिंदू समाज का भी उतना ही योगदान है, Unionist पार्टी की नींव 1931 में रखी गयी थी एक तरह से ये मुस्लिम बहुसंख्यंक थी लेकिन इसमे बाकी धर्म के लोगो का भी एहम योगदान था सर छोटू राम इसी पार्टी से जुड़े हुये थे, इसी पार्टी ने 1946 से पहले हुये पंजाब विधानसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत प्राप्त किया था और ये पार्टी मुस्लिम लीग की कट्टर विचारधारा के विरोध में खड़ी थी और अलग से पकिस्तान बनाने का विरोध कर रही थी, इसी तरह खाकसार ग्रुप था जो मुस्लिम बहुसंख्यंक था ये भी पकिस्तान बनाने का पूरा कड़ा विरोध कर रहा था. 1943 में जिन्हा पर हुये कातिलाना हमले का शक भी इसी खाकसार ग्रुप पर था. खासकर ग्रुप, जिन्हा को कट्टर मुस्लिम मानता था और गांधी को कट्टर हिंदू. (Mission of Mountbatten, पेज 134), शिया, अहमदिया, वोहरा मुस्लिम, इत्यादि गैर सुन्नी समुदाय कभी भी पकिस्तान बनाने पर सहमत नही था, लेकिन फिर भी आज पकिस्तान बनाने का एक तरह से दोष मुस्लिम।समुदाय पर ही लगाया जाता है.

इस मतगणना से हमैं सिर्फ जिन्हा को दोष नही देना चाहिये की वह पकिस्तान की मांग कर रहे थे. वही, कांग्रेस के उस ब्यान को भी अस्वीकार कर देना चाहिये की वह देश को एक जुट रखना चाहती थी, मिशन ऑफ़ Mountbatten किताब में कई जगह लिखा गया है की कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता यँहा तक की नेतागण भी कम्युनल हो रहे थे, मसलन दोनों तरफ  धर्म के आधार पर देश बनाने की मांग को बल मिल रहा था, जिन्हा इसे सार्वजनिक रूप से कह रहे थे और कांग्रेस एक लाचार पार्टी के रूप में की अब पाकिस्तान को बनने से रोका नही जा सकता इसलिये हिंदुस्तान बन रहा है. खेर, कांग्रेस में राजनीतिक अनुभव की।कमी तो नही थी, फिर इन्होंने 1946 के चुनाव में जितने के लिये कोई राजनीतिक प्रयास किये हो ऐसा लगता नही है क्योंकि फरवरी 1946 के चुनाव ही आज बंगाल और पंजाब को बाट रहे थे.

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