आजादी का कत्लेआम (भाग 8)

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23-जून-1947, को पंजाब के विभाजन पर मोहर।लग गयी थी, इससे ठीक कुछ दिन पहले बंगाल भी विभाजन को मंजूर कर चुका था, लेकिन नार्थ वेस्ट फ्रंटियर वेस्ट में रेफरेंडम से ये तय होना था की जनता चुनाव के माध्यम से बताने वाली थी की वह पाकिस्तान में शामिल होना चाहती है या नही, दिलचस्प कथन ये रहा की इस रेफरेंडम का कांग्रेस ने बायकाट विरोध किया, सरल शब्दो में कहे तो हिस्सा ही नही लिया, कांग्रेस का मानना था की यँहा एक रिमोट जगह पर किस तरह शाशन किया जा सकता है, लेकिन यँहा कांग्रेस की बहुत मजबूत पकड़ थी, अगर कांग्रेस यँहा हिस्सा लेती तो नतीजन ये हिस्सा भारत का हो सकता था.  यँहा बहुत सी आबादी को ये कहकर वोट नही डालने।दिया गया।कि इनके सगे संबधी अफगानिस्तान में भी है, कुल 17% मतदातों ने वोट दिया जिसमे 51% पाकिस्तान के साथ जाना चाहते थे और 49% इसका विरोध कर रहे थे, इसी समय NWPF के गांधीवादी नेता खान अब्दुल गफ्फार खान जो की गांधी जी के बहुत करीब थे, उनका मशहूर बयान गांधी जी को कहते हुये आया था ” की आपने हमैं कुत्तो के सामने फैक दिया”, ये वही खान साहिब है जिन्हे आजाद भारत में बतोर पाकिस्तानी, भारत सरकार ने 1967 में जवाहर लाल नेहरू अवार्ड और  1987 में भारत रत्न से सम्मानित किया था. (http://creative.sulekha.com/nehru-s-blunders-stopping-nwfp-north-west-frontier-province-from-joining-india_600451_blog)
(https://scroll.in/article/810564/with-brexit-a-reality-a-look-back-at-six-indian-referendums-and-one-that-never-happened)

खेर ये बात एक आश्चर्यजनक है की जिस तर्ज पर आज भारत सरकार कश्मीर को अपने साथ रखने की जद्दोजेहत कर रही है वह किस तरह नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस को इस तरह छोड़ सकती है ? खेर, सिंध और बलचुस्तिआंन, पकिस्तान में जा रहे थे वही आसाम के एक बहुसंख्यंक मुस्लिम जिला, सिल्हेत रेफरेंडम के बाद ईस्ट पाकिस्तान में शामिल होने जा रहा था और बाकी का आसाम हिंदुस्तान में. यँहा भी विभाजन के पक्ष और विरोध का अनुपात बहुत कम था, यँहा भी कहा जाता है कि कांग्रेस ने ये रेफरेंडम अपनी समता के अनुरूप पूरी ताकत से नही लड़ा था. कांग्रेस की क्या कमजोरी थी जो वह विभाजन को रोकने में खुद को असमर्थ पेश कर रही थी, कांग्रेस कही भी अपनी जनशक्ति की ताकत को भुना नही पा रही थी, नार्थ ईस्ट फ्रंटियर प्रोविंस में कांग्रेस का अलग होना, सिल्हेत में कांग्रेस का बहुत हल्के अनुपात से हारना, उस तथ्य को बल दे रहा था जंहा गांधी और कांग्रेस पर हिंदू विचारधारा को अपनाने का दोष लगता था, इस कथन को और बल मिलता है जब आजादी के बाद नेहरू के पहले मंत्री मंडल में हिंदू सभा से जुड़े श्यामा प्रशाद मुखेर्जी को बतोर कैबिनेट मंत्री शामिल किया गया, जिन्हे इंडस्ट्रीज और सप्लाई मंत्रालय का पद भार दिया गया, ये वही श्यामा प्रसाद मुखेर्जी है जिन्होंने बाद में 1953 में आरएसएस के राजनीतिक विंग के तौर पर भारतीय जन संघ की नींव रखी जो बाद में भारतीय जनता पार्टी के रूप में उभर कर आयी.

खेर, 23-जून-1947, पंजाब के विभाजन पर मोहर लगने के बाद अब ये तय था कि कौन सा हिस्सा पाकिस्तान में होगा और कौन सा हिस्सा हिंदुस्तान में लेकिन इस लकीर को खिचना इतना आसान नही था बहुत सी पैचिदिगिया इसमे आ रही थी और सबसे जरूरी वक्त बहुत कम था. 16-अप्रैल-1947 के दिन जब अकाली दल ने पंजाब के विभाजन पर मोहर लगाई थी तब इसका ये भी प्रस्ताव था की आबादी के साथ साथ जायदाद, व्यपार, इतिहास से जुडी जगह और समुदायों की रेवेन्यू को भी एक आधार बनाया जाये, लेकिन 23-जून के बाद जुबानी जंग शुरू हो गयी थी, मुस्लिम लीग अंबाला को छोड़ कर जमुना तक अपना क्षेत्र बता रहा था वही अकाली चिनाव तक अपना पंजाब होने की हामी भर रहे थे, बस ये बयान दोनों ही पार्टीयो द्वारा अपने अपने समुदाय और वोटर बैंक को एक तसल्ली देने की तरह था लेकिन दोनों ही दलों को ये पता था की ऐसा होना नामुमकिन की तरह है, इस बयान बाजी में कांग्रेस ज्यादा गंभीर नही थी और ना ही बढ़ चढ़ कर हिस्सा  ले रही थी. लेकिन गोर करने वाली बात थी की अभी हिंसा रुक गयी थी लेकिन समाज में अभी भी तल्ख मौजूद थी.

बटवारे की लकीर खींचने से भी ज्यादा मसले थे जिसमे नदियों और नालो का बटवारा, बिजली क्षेत्र, रेल, यातायात, सेना, सुरक्षा बल, इत्यादि उन सभी चीजों का बटवारा होना था जो एक व्यवस्था को चलाने के लिये जरूरी है. इसके लिये एक मशीनरी पार्टीशन के नाम से आयोग बनाया गया जिसमे चार जज शामिल थे, जज ज़ाहिद और मिया मुमताज़ दौलताना, ये दोनों जज मुस्लिम लीग के कोटे से थे वही कांग्रेस के कोटे से हिंदू जज डॉ. गोपी चंद भार्गव थे वही जज स्वर्ण सिंह पंथिक (सिख)पार्टी से थे, मशीनरी पार्टीशन, ये शिक्षा, खेती, स्थानीय सरकार के विषय को क्षेत्रयी विषय मान कर चल रही थी जँहा पाकिस्तान और हिंदूस्तान दोनों अलग अलग थे, वही आर्थिक और सिचाई, जंहा सिचाई के संदर्भ में पानी, दरिया, नदिया, नाले, इत्यादि का समावेश था, और यँहा हिंदुस्तान और पाकिस्तान के दोनों के ही विषय जुड़े हुये थे, इसे जॉइंट विषय में रखा गया, यँहा गवर्नर ने दो मुस्लिम और दो गैर मुस्लिम मंत्रियों को चुना जो अपने अपने विचार गवर्नर से साँझा कर सकते थे,आगे चलकर कई ऐसे और सब विभाग बनाये गये जैसे की सुरक्षा, सर्विस, रिकॉर्ड इत्यादि और इनमे मुस्लिम और गैर मुस्लिम लोगो को जोड़ा गया.

लेकिन सबसे पेचीदा काम था बाउंडरी कॉमिशन का जो एक जमीनी लकीर को खींच कर भारत में से हिंदुस्तान और पाकिस्तान को अलग करने वाले थे, यँहा अगर 1941 की जनगणना के आधार पर आबादी को देखे तो मुस्लिम समुदाय मामूली रूप से गैर मुस्लिम समुदाय से ज्यादा था, इस तथ्य के हिसाब से 99089 स्क्वायर माइल्स में फैला पंजाब आधा आधा बाटा जाना चाहिये था मसलन 49,544 स्क्वायर माइल्स दोनों तरफ दिया जा सकता था, लेकिन कम से कम आधे पंजाब में मुस्लिम समुदाय बहुसंख्यंक था, सिख लाहौर, अंबाला और जालंधर पर पूर्वी पंजाब अर्थात हिंदुस्तान में शामिल करवाने की मांग कर रहे थे यँहा गैर मुस्लिम समाज अच्छी खासी आबादी में था, लेकिन अगर आबादी के विषय पर ही लकीर खिंची जानी थी तो ननकाना साहिब भी पूर्वी पंजाब में होना चाहिये था जंहा सिख समुदाय, 80% की आबादी में था और यही सबसे ज्यादा रेवेन्यू सिस्टम में योगदान करता था, लेकिन ये मुमकिन नही था क्योंकि बीच में आ रहे कई इलाकों में मुस्लिम समाज बहुताय था.

कई ऐसे पेचीदा सवाल थे जिनका जवाब पंजाब बाउंडरी कमीशन को खोजना था, इसी सिलसिले में बाउंडरी।कमीशन को गठीत किया गया जिसमे हाई कोर्ट के चार जज शामिल थे जिनमे से दिन मोहम्मद और जज मोहम्मद मुनीर, मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधि के तौर पर थे वही जज मेहर चंद महाजन और जज तेजा सिंह, हिंदू और सिख समाज के प्रतिनीधि के तौर पर शामिल थे. लेकिन सयुक्त बाउंडरी कॉमिशन के चैयरमैन के रूप में सर सायरिल रेडक्लिफ को नियुक्त किया गया जो पंजाब के साथ साथ बंग, नियुक्ति के समय रेडक्लिफ जनरल कौंसिल ऑफ़ इंग्लिश बार के वाईस चैयरमैन थे और इनका नाम इंग्लैंड के मोहरी वकीलों में लिया जाता था. लेकिन ये कभी भी भारत नही आये थे और ना ही भारत से परिचित थे, ऐसा कहा जाता है की रेडक्लिफ पहले इंग्लिश सेना में थे लेकिन इनकी नजर की कमजोरी के चलते इन्हे लेबर विभाग में ट्रांसफर कर दिया था, खेर एक।मोटी सी चश्मा पहन कर, सर सायरिल रेडक्लिफ तारीख 09-जुलाई-1947 को भारत आये, जंहा इन्हे पहले से ही कड़ा निर्देश था की विभाजन तारीख 15-अगस्त-1947, से पहले हो जाना चाहिये, मसलन रेक्लिफ़ के पास कुछ पांच हफ्ते, या कुछ 30 दिन थे, जंहा उन्हे नक़्शे पर बारीक़ लकीर खिंचनी थी जो आगे चलकर इतिहास लिखने वाली थी और इस लकीर को रेडक्लिफ लकीर से भी पहचान मिलने वाली थी.

जानकारी का श्रोत- The Unfolding Crisis of Punjab 1947: Key Turning points and British responses

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