आस्था बनाम सामाजिक सुरक्षा -प्रत्युष प्रशांत

Posted by Prashant Pratyush
August 31, 2017

बाबा राम रहीम को बलात्कार के मामले में दोषी पाए जाने के बाद हिंसा को देखते हुए कुछ सवाल बार-बार अपनी जगह बना रहे हैं। सवाल है कि धर्म, जो व्यक्तिगत आस्था और विश्वास का विषय है, वह एकाएक इतना ताकतवर कैसे बन सकता है कि लोगों की व्यक्तिगत आस्था उसे हिंसा और आगजनी करने से नहीं रोक पाती है। धर्म के प्रति लोगों की आस्था लोकतंत्र में लोकतांत्रिक हितों से ऊपर कैसे स्थापित हो जाती है? मौजूदा समय में लोगों में धर्म के प्रति आस्था को किस तरह से देखा जाए?

हालिया मामले का विरोधाभास यह भी है कि समाज के जिन लोगों को महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा के लिए बलात्कारी व्यक्ति के विरुद्ध सड़क पर उतरना था वो अपनी आस्था या व्यक्तिगत हितों के प्रभाव में बाबा के समर्थन में हिंसा पर उतारू थे। वो महिलाओं के लोकतांत्रिक अधिकार को तार-तार करने की कोशिश में शिद्धत से जुटे थे। हालांकि यह अपने आप में पहली घटना नहीं है। इसके पूर्व भी कई मामलों में समाज और सामाजिक मूल्य महिलाओं के अधिकारों के साथ ऐसा करते रहे हैं।

केवल धार्मिक संस्थाओं ने ही नहीं, अन्य सामाजिक संस्थाओं ने भी महिलाओं की अस्मिता और सम्मान के साथ खिलवाड़ किया है। एक तरफ तमाम धर्मगुरूओं के यहां महिलाओं के यौन शोषण/उत्पीड़न की खबरें आती है। वहीं रूपन सिंह देओल और के.पी.एस. गिल का मामला हो, भंवरी देवी का मामला हो, तहलका पत्रिका के तरूण तेजपाल द्वारा महिलाकर्मी के यौनशोषण का मामला हो या परिवार के अंदर ही महिलाओं और बच्चियों के यौन शोषण के मामले हो। ज़ाहिर है कि निजी और सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं की सामाजिक सुरक्षा के सवाल पर गंभीरता से पुर्नविचार करने की आवश्यकता है।

अगर तमाम धर्मगुरूओं की बात करें तो इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता है कि धर्म गुरूओं के प्रति आस्था और विश्वास के दो कारण हैं। एक वो लोग हैं जो जातीय उत्पीड़न से तंग आकर अपने मान-सम्मान और अस्मिता की रक्षा के लिए बाबाओं की शरण में जाने के लिए विवश होते है। दूसरे वो लोग हैं जो व्यक्तिगत स्वार्थ के वशीभूत होकर धर्म का उपयोग शिखर तक पहुचंने की सीढ़ी के रूप में करते हैं। यह कोशिश धर्म को रूढ़ बना देने की होती है, इस माध्यम से आमजन के विवेक को कुंठित कर, उसके व्यवहार को भीड़ की मानसिकता से जोड़ दिया जाता है।

बाबाओं के साम्राज्य ने जनता के सामने वो विकल्प उपलब्ध कराए हैं, जो जनता के प्रति सरकारों की ज़िम्मेदारी थी। सरकार और सरकार की संस्थाओं की नाकामियों ने इन बाबाओं को धीरे-धीरे मजबूत किया है। मिसाल के तौर पर हिंदू या अन्य धर्मों ने भी कई समुदायों के लोगों के अस्तित्व और सम्मान की रक्षा लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ नहीं की और ना अपने अंदर लोकतात्रिक चेतना का विकास ही किया। इसलिए इन तबकों का विश्वास इन धार्मिक आस्थाओं के साथ अधिक होता गया।

बाबाओं के साम्राज्यों ने अपने अनुयायियों के मन में मिथकीय मूल्यों वाली एक नई संस्कृति के साथ-साथ एक एक तरह की सुरक्षा भावन का भी विकास किया है। ये एक ऐसी भावना है जो मुख्यधारा के किसी धर्मस्थल (जैसे -मस्जिद, मंदिर या गिरजाघर) में कभी पूरा नहीं हो सका। निश्चित तौर पर इन धर्मगुरूओं के प्रति आस्था लोगों को वो मुक्त वातावरण उपलब्ध करा सकी है जो एक जमाने से वंचित समुदायों के लोगों की महत्वकांक्षा रही है।

हमें यह भी समझना होगा कि पिछले कुछ दशकों में मनोरंजन उद्योग ने भी बाबाओं के सम्राज्य को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। तमाम संचार माध्यमों ने वशीकरण और मारण मंत्र वाले बंगाली बाबा से लेकर झोलाछाप बाबाओं तक के विज्ञापन से कोई परहेज़ नहीं किया है। तमाम बाबाओं को इन माध्यमों से स्थापित करने के साथ-साथ उनसे जुड़ी सनसनी फ़ैलाने वाली खबरों का दोहन, टीआरपी रेटिंग के लिए किया जाता रहा है, जो अभी भी थमा नहीं है।

वास्तव में जनमानस की आस्थाओं का बाज़ारीकरण ही इन माध्यमों के द्दारा होता रहा है। मौजूदा समय में धर्म कम लागत में अधिक मुनाफा कमाने वाला सबसे भरोसेमंद कारोबार है, जिसमें घाटे की कोई संभावना नहीं है। जब कोई बाबा सोने के मुकुट और तलवार लेकर जनता के सामने आते है या चमत्कार करता है तो आमजन की भावनाओं का दोहन, धर्म का कारोबार चलाने में अपनी भूमिका निभाता है। उन्हीं के बूते समाज में अंधविश्वास फलता-फूलता है और मानवीय विवेक का क्षरण होता है।

बाबा राम रहीम के मामलें में उन महिलाओं के संघर्ष को स्वाहा करने का इससे अधिक अच्छा तरीका और क्या हो सकता है कि समाज में नैतिकता के तमाम ठेकेदार गुरमीत राम रहीम के उत्तराधिकारी की तलाश में लगे हुए हैं। एक तरफ न्यायव्यवस्था यौन शोषण के मामले में दोषी पाए जाने पर राम रहीम को सज़ा सुनाती है, तो दूसरी तरफ सरकार विवाहित बलात्कार को नये सिरे से परिभाषित करने की कोशिश कर रही है। इसे देखकर यही कहना सही होगा कि “उठो द्रौपदी उठो, वस्त्र संभालो, अब गोंविंद न आयेगे।”

 

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