इंसेफ़ेलाइटिस ने नहीं भ्रष्टलाइटिस ने मासूमों को मार डाला ।

Posted by Saurabh Arora
August 18, 2017

Self-Published

अभी हाल ही में यूपी के गोरखपुर में सरकारी अस्पताल में कई मासूमों की मौत हो गई या कहिए कि बच्चों का नरसंहार हुआ है। जब खुलासे होना चालू हुए और जांच रिपोर्ट सामने आई तो पता चला कि बच्चों की मौत बीमारी से नहीं आॅक्सीजन सप्लाई रुकने से हुई है। इसका कारण ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी का पेमेंट रोकना बताया गया। लेकिन उससे भी ज़्यादा दुख की बात ये थी कि सरकार और उसके मंत्री अपने आप को बचाने के लिए यह कहते दिखे कि अगस्त के महीने में तो बच्चों की मौत होती ही है। तो चाल, चरित्र और चेहरे की बात करने वाली पार्टी वालों का क्या यही है असली चेहरा?
6 महीने से वो कंपनी अपने पेमेंट के लिए 40 पत्र लिख चुकी थी जो बढ़ते-बढ़ते 63 लाख तक पहुंच गया था। आगे कंपनी अपनी जेब से और खर्च करने की असमर्थता जता चुकी थी और हादसे से 5 दिन पहले आखिरी लेटर के रूप में चेतावनी देते हुए पेमेंट नहीं करने की स्थिति में गैस सप्लाई रोकने की बात लिखी।
न्यू इंडिया का नारा दिया जा रहा है, डिजिटल इंडिया का नारा दिया जा रहा, स्टैंडअप इंडिया, स्मार्ट सिटी वगैरह-वगैरह, जाने कितनी बातें कही जा रही हैं। क्या ऐसे कांडों के बीच ये नारे बेमानी नहीं लगते, देश में डिजिटलिकरण होने के बावजूद भी रिश्वत लेना बंद नहीं हुआ बल्कि और बढ़ रहा है। कुछ दिन पहले ट्रासंपेरेन्सी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में बताया गया कि भारत में भ्रष्टाचार साल दर साल बढ़ रहा है। 2016 के मुकाबले 2017 में इसमें बढ़त हुई है, 69% लोगों के अनुसार उन्हें काम करवाने के लिए रिश्वत देनी पड़ी है। 73% गरीब तो 55% अमीर लोगों को रिश्वत देनी पड़ी है। सेंटर फाॅर मीडिया स्टडीज़ के अनुसार 20 राज्यों में इस साल लोगों को 6350 करोड़ रुपये रिश्वत में देने पड़े। इन आंकड़ो में सबसे ज़्यादा पुलिस के भ्रष्ट होने की बात सामने आई।पुलिस-85%, सरकारी अफसर-84%, बिज़नेस एग्ज़ीक्यूटिव-79%, पार्षद-78%, सांसद-76% और टैक्स आॅफीसर्स-74%.
इसके साथ ही रिपोर्ट में सामने आया कि कैसे बाबूओं की वजह से बिज़नेस करना या नया बिज़नेस खोलना भारत में बहुत मुश्किल है। कंस्ट्रक्शन की परमीशन से लेकर बिजली कनेक्शन, प्राॅपर्टी रजिस्ट्रेशन, लोन लेने- हर जगह रिश्वतें बढ़ी हैं। एक और मुख्य बात जो सामने आई है कि हर तीन में से एक भ्रष्ट अफसर पकड़े जाने के बाद बच निकलता है। 7217 घूस लेने वालों में से 2095 बच निकले, मतलब भ्रष्ट लोगों को दबोचने वाले और भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसियों वाले खुद जांच करते-करते रिश्वतखोरों को दबोचनें के बाद फिर इन भ्रष्ट लोगों से माल बटोर के केस रफा-दफा करवाकर इन्हें बचा ले जाते है।
मतलब कि भ्रष्टाचार पे भ्रष्टाचारी बैठे हैं, अथाॅरिटी बढ़ती जाती है मतलब भारत में कोई निष्पक्ष जांच एजेंसी अभी तक नहीं है जिसकी गारंटी हो कि वो आखिरी अथाॅरिटी है और जो खुद भी जांच करने में रिश्वत वालों को दबोचकर बिना खुद रिश्वत खाऐं निष्पक्षता से जांच करेंगी,लेकिन अफ़सोस इन एजेंसियों के जांचकर्ता तो उन भ्रष्टाचारियों से भी ज्यादा संपत्तियों,धन के मालिक होते है जिनको दबोचने का ज़िम्मा होता है क्योंकि ज़िम्मा ही ऐसा जो खुद मलाई वाला विभाग कहलाता है जिसमें हर कोई पदस्थापना चाहता है तो ये है वर्तमान भारत की तस्वीर जहां रिश्वत के ऊपर रिश्वत है और जहां एक क्लर्क के यहां छापे में करोड़ों मिलते है और ऊपर पद वालों पर बढ़ते जाइए तो बात 50 करोड़ से लेकर अरबों तक भी पहुंच जाती है जैसा कि छापों में सामने आता भी है । आज गरीब को चाहें गरीबी कार्ड,राशन कार्ड बनवाना हो मृत्यु प्रमाण पत्र चाहिए हो,स्टूडेंट को यूनिवर्सिटी से मार्कशीट चाहिए हो या अन्य काम हो या सरकारी ठेकेदार को ठेके लेने से लेकर पेमेंट कराने तक रिश्वत देनी ही पड़ती है मोटा कमीशन फिक्स करना ही पड़ता है इन घूसखोरों को न गरीब से मतलब है न किसी से इन्हें तो अपनी जेब गरम करनी है धन संपत्तियां बढ़ानी होती है चाहें कोई मरे या जीयें कुछ कमा पाए या न कमा पाए चाहें रुपए देने में असमर्थ हो बूढ़ा हो विकलांग हो….आम आदमी भी अपने काम में कोई बाधा नहीं चाहता है और रिश्वत को सिस्टम का हिस्सा मानकर काम निपटवानें के लिए रिश्वत देने को मजबूर बन चुका है । ये हाल सरकारी तंत्र के बहुत बड़े हिस्से का है जहां आज ईमानदार तो बहुत ही कम प्रतिशत में है । लालफीताशाही के आतंक से आज हर कोई पीड़ित है ।
तो ऐसे न्यू इंडिया का सपना सरकार कैसे देखती है जो नौकरशाही पर शिकंजे कसने में नाकाम है । नई सड़के,बिल्डिंगे,आवास,सीवर,बिजली,पुल वगैरह-वगैरह के निर्माण वाले संबंधित हर विभाग में रिश्वत का बोलबाला है कमीशन फिक्स है तो ऐसे कैसे गुणवक्ता,शुद्धता की गारंटी सरकार सड़के टूट जाएंगी पुलों में फिर दरारें आयेंगी स्मार्ट सिटी तो जल्द फ्रेक्चर्ड सिटी में कन्वर्ट हो जायेगी,उससे भी बड़ी बात गरीब के आम आदमी के तरह-तरह के नए-नए टैक्स वसूली के पैसों की बर्बादी की साथ सरासर बेमानी होगी,धोखा होगा उससे भी ज्यादा जिस भ्रष्टाचार ने मासूमों की जान ली है क्या उसकों दूर करने का स्थाई हल तलाशा जाएगा कि बजाए किसी खास घटना के बाद फौरी कदम उठाएं जाते है थोड़े दिन बाद फिर वहीं हाल…जैसे अस्पताल की दवाईयों से लेकर उपकरण खरीदी तक भारी भ्रष्टाचार है जैसा कि अभी की घटना ने साबित भी कर दिया ऐसा सिर्फ गोरखपुर में ही नहीं पूरे भारत का हाल है,जहां भ्रष्टाचारियों ने मानवता तक बेच खाई है,ब्यूरोक्रेसी से लेकर मंत्री तक भ्रष्टाचार की छाया में कमीशन के खेल में लिप्त है तो न्यू इंडिया का सपना बिना भ्रष्ट तंत्र पर लगाम बिना रिश्वत कमीशन की रीड् की हड्डी तोड़े कैसे पूरा करेंगे कैसे आम आदमी के साथ न्याय होगा । न्यू इंडिया में भ्रष्टाचार मिटाने का नारा तो बहुत बुलंद हो रहा है लेकिन ज़मीनी सच्चाई कुछ और है । क्या सरकार वाकई नारों से इस भ्रष्टाचार को मिटा पाएगी भ्रष्टाचारियों को विरुद्ध कोई अभियान चलायेगी क्योंकि आम आदमी के तो नए-नए कानून नए-नए सेस,टैक्स लगाती जा रही है वहीं ब्यूरोक्रेसी और भ्रष्ट तंत्र पर लगाम लगाने में अभी भी कामयाब नहीं हुई है नोटबंदी बड़े निर्णय से कोई फर्क नहीं पड़ा है । कुल मिलाके बलि लेने वाले इस भ्रष्ट तंत्र पर लगाम लगाए बिन सरकार अगर न्यू इंडिया का सपना देख रही है तो फिर ये तो वाकई बेमानी होगा ।
SAURABH ARORA
9425770874

Youth Ki Awaaz is an open platform where anybody can publish. This post does not necessarily represent the platform's views and opinions.