इस देश का मुसलमान और कितनी रातें डर-डर के गुजारेगा….?

Posted by Avdhesh Pareek
August 10, 2017

Self-Published

देश में फिर से कुछ दिनों बाद चुनावी बिगुल बजने को है, फिर से वो ही रैलियां, वो ही राजनेताओं के झूठे ना पूरे होने वाले वादों का एक नया सिलसिला शुरू होगा। पर क्या आपको नहीं लगता कि इस बार के चुनावी घमासान में सभी पार्टियों को अपने मेनिफेस्टो में इंसानियत का मुद्दा शामिल नहीं करना चाहिए। क्योंकि हाल ही के देश को जो हालात है उनको देखकर तो आप अपने राजनेताओं से यही उम्मीद कर सकते हैं। और सबसे ज्यादा जो तबका आज गुस्सा और प्रताड़ना झेल रहा है वो है इस देश का मुसलमान ।

एक तरफ हमारे देश के प्रधान सेवक जिस देश में भी जाते हैं वहां भारत के सेक्लूयर होने का ढ़ोल पीटते हैं। पर क्या इस देश में कहीं भी सेक्यूलिरज्म की कोई झलक देखने को मिलती है। जिस तरह से इस देश के ही एक नागरिक को मुसलमान कह-कह कर भरी सड़क पर जानवरों से भी बदतर हालत करके मार दिया जाता है, जिस तरह से एक चलती ट्रेन में एक 14 साल के नाबालिग लड़के को पैरों से कुचल दिया जाता है। तो इसे भी क्यों ना हम आतंकवाद ही कहें।

क्यों मुसलमानों के लिए है इतना गुस्सा?

भारत जैसा देश जहां अधिकांश जनसंख्या हिंदु है, और दिन-प्रतिदिन यहां होते आतंकवाद से उन सब में गुस्सा भरा हुआ है। एक तरफ तो हमारे नेता कहते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता है वहीं दूसरी तरफ उन्हीं के बनाए हुए कुछ धर्म के ठेकेदार बिना उनका नाम लिए आतंकवाद को मुसलमानों से जोड़कर देखते हुए उनके प्रति नफरत का माहौल बनाने में कोई भी मौका नहीं छोड़ते हैं।

क्यों इस देश के मुसलमान हर दिन खुद को देशभक्त साबित करना पड़ता है?

क्या इस देश के हर नागरिक के लिए उसका देश होने के मायने एक ही नहीं होने चाहिए। तो फिर ये हिंदुओं का देश बताने वाले और मुसलमानों से देशभक्त की गवाही मांगने वाले कौन हैं। अक्सर गंदी राजनीति किसी भी वक्त कुछ भी कर सकने में सक्षम है। वोट बैंक की इस राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं होता। आज जो जिसको गालियां निकाल रहा है कल वो आपको उसी की गोदी में बैठा हुआ मिले तो चौंकने वाली कोई बात नहीं है। चुनावी तारीखें पास आते ही सुलगाई हुई एक चिंगारी भी आग का रूप ले सकती है।
अगर ऐसे ही इस देश के इंसान को धर्म के नाम पर बीच सड़कों पर नंगा किया जाता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब सब एक दूसरे को निकालने की इस लड़ाई में खुद ही उस दलदल में ऐसे फंस जाएंगे कि फिर निकल पाना भी मुश्किल हो जाएगा।

बहरहाल जिन लोगों को दलीलें देनी हैं कि कश्मीरी पंडितों के साथ जो हुआ वो भी गलत था। तो आपको बता दें कि गलत, गलत ही होता है। उसको कोई झुठला नहीं सकता है। मगर ऐसी घटनाओं को धर्म की लड़ाई बना देना कहां तक सही है। ऐसे समय में उन लोगों को सामने आने की जरूरत है जो इंसानियत और एकता का प्रचार प्रसार करे। जिसकी कमी फिलहाल साफ देखी सकती है।

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