उम्मीद अभी बाकी है……

Posted by naresh koshyari Koshyari
August 6, 2017

Self-Published

अपनी उम्मीदों से निखरकर दुनिया की सोच को समझकर आगे बढ़ने की चाहत क्या  हमें अपने आँसमा तक पहुँचा पायेगी , ये सोचना आज हमारे लिए कीमती हो चुका हैं । हम जिस आजादी के पल को जीने के सपने आज भी अपने मन में पाल  कर जी रहे है क्या वो पल आ पायेगा? शायद मुश्किल हैं।  पर मुश्किलें तो हमारे उन बहती हुई धाराओं की तरह हैं जो हमेशा हमें अपनी ओर खिचती हैं।

मुझे हमेशा याद आती हैं उन धाराओं की गूँज जो हमेशा कहती थी कि ” तुम वो शक्स हो जो बहती धाराओं के विरूप चलकर उनकों पार कर सकते हो” ओर वो मुझे हमेशा जोश दिलाती थी पर अब साथ चलने की आदत हो चुकी थी । साथ ही साथ उन लोगों को देखकर जो मिटट़ी के टीलों में रहकर दिन गुजार रहें हैं। पर जो भी हो इन झोपड़ियों  में रहने वाले लोगों की हिम्मत देख मैं हमेशा दंग रह जाता हूँ ,सुबह उठते है तो अपने अन्दर जोश का एक दीपक जला के उठते है। और उनमे भावनाओं का महत्व नहीं दिखता ,जोश के साथ रहना ही शायद इनका जीवन है। पर कैसे ,ये सोचकर मैं हमेशा परेशान रहता हूँ।

बचपन से ही मैं उन वादियों में रहा जहाँ सुबह कड़कड़ाती ठंड ,कोयल  की कूके, हवा के फुहारों की बरसात होती थी पर इसके वावजूद भी मैं वो  जोश पैदा नहीं कर पाया । शायद उनमे कोई अन्दरूनी ताकत थी जो उनको आगे बढ़ाती थी । साथ ही उनकी परम्पराएँ ,ईश्वर पे विश्वास देखने लायक था। धीरे-धीरे समय बीतता गया नई पीड़ियाँ आती रही और उनकी ताकत कमजोर पड़ने लगी ,आज वो अपनी परम्पराओं को आगे बढ़ाने में अपने आप को पीछे हटता देख रहे है । शायद उन्हें भी ये आराम की जिन्दगी अपनी और खींचने लगी है । अब शायद ये निष्कियता उन्हें अपने आँसमा तक नहीं पहुँचा पायेगा।

आखिर क्यों वो अपने आसमा से दूर हो रहे है ये सोचना अति आवश्यक है , क्या वो उन वादियों की हवाओं के अनुरूप नहीं चल पा रहे ? क्या उनका जमीर अब उन्हें नहीं बुलाता ,या वो अपनी आशाओं को खो चुके है ?    ये सब सोच के मैं कभी-कभी रो पड़ता हूँ कि क्या मैं इनकी सोच को जगा सकता हूँ । शायद अभी तक नहीं पर मैं हमेशा कोशिश करता रहूँगा……….

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