एक डरे हुए कैमरे से बयां की गयी एमरजेंसी की कहानी है इन्दु सरकार

Posted by Brajesh Singh
August 3, 2017

Self-Published

फ़िल्म: इन्दु सरकार
कलाकार: कीर्ति कुल्हाड़ी, तोता रॉय चौधरी, सुप्रिया विनोद, नील नितिन मुकेश, अनुपम खेर
निर्देशक: मधुर भंडारकर
रेटिंग: 2/5

कहानी:
विवादों से घिरे मधुर भंडारकर की बहुप्रतिक्षित फ़िल्म इन्दु सरकार की कहानी सन 1975 के इमेरजेंसी के दौर में जन्म लेती है। भारतीय राजनीति का काला अध्याय माने जाने वाले इमेरजेंसी के दौर में कई कहानियों का आग़ाज़ हुआ था। कुछ कहानियाँ छिपी रहीं, कुछ कहानियाँ लोगों के ज़ेहन में ज़िंदा रही, और कुछ कहानियों को ज़बरदस्ती ख़त्म कर दिया गया। मधुर भंडारकर ने उसी दौर की इक कहानी को इन्दु सरकार के नाम से कल्पना के चादर में लपेटकर बड़े परदे पर लाने की कोशिश की है। फ़िल्म के शुरुआत में ही दर्शकों को यह बता दिया जाता है की वो जो देखने जा रहे हैं वो बिलकुल काल्पनिक है और उसका सच्चाई से कोई सम्बंध नहीं है। आप इसे निर्देशक कि चालाकी, मजबूरी, डर या अपने हिसाब से जो सही लगे वो कह सकते हैं।

फ़िल्म की कहानी 1975 के इमेरजेंसी के दौर की एक अनाथ लड़की इन्दु की कहानी है। इन्दु कविताएँ लिखती है, शायरी करती है और अपने आँखों में शायर बनने का सपना पालती है। इमेरजेंसी के उस दौर में जब सरकार द्वारा चलाए गए नसबंदी कार्यक्रम की वजह से लोग ज़बरदस्ती परिवार नियोजन कर रहे थे और जब सरकारी फ़ाइलों पर नसबंदी की खानापूर्ति दिखाने के लिए छोटे उम्र के लड़कों की भी नसबंदी की जा रही थी, उसी दौर में इन्दु का प्रेम प्रसंग, इमेरजेंसी को अंधभक्तों की तरह समर्थन देने वाले सरकारी मुलाजिम नवीन सरकार से शुरू होता है। दोनो शादी कर लेते हैं लेकिन इन्दु ज़्यादा दिन तक नवीन के साथ नहीं रह पाती। जहाँ इन्दु तत्कालीन सरकार से नाख़ुश रहती है वहीं नवीन सरकार की अन्ध्भक्ति में लीं रहता है। इन्दु , नवीन को छोड़कर अनुपम खेर के संगठन में शामिल होती है और तत्कालीन सरकार के ख़िलाफ़ अपनी मुहिम शुरू कर देती है।

समीक्षा:
इस फ़िल्म में मधुर भंडारकर ने इमेरजेंसी के दौरान हो रही नसबंदी और मीडियाबंदी जैसे कई ज्वलंत मुद्दों पर रौशनी डालने का प्रयास किया है। फ़िल्म में मम्मीजी के किरदार के ज़रिए इंदिरा गांधी को तथा चीफ़ के तौर पर संजय गांधी को दर्शाने की कोशिश की गयी है। फ़िल्म इंटर्वल तक इन्दु और नवीन की कहानी को धीरे-धीरे खींचती है लेकिन इंटर्वल के बाद फ़िल्म रफ़्तार में आती है। फ़िल्म के संवाद, सिनेमाटोग्राफ़ी तथा अभिनेताओं का अभिनय फ़िल्म की कहानी में जान फूँकने की भूमिका निभाती है। मुख्य अभिनेत्री के रूप में कीर्ति कुल्हाड़ी का अभिनय शशक्त है। वहीं उनके पति का किरदार निभा रहे तोता रॉय चौधरी भी, नवीन सरकार की बख़ूबी निभाते नज़र आते हैं। चीफ़(संजय गांधी) का किरदार निभा रहे नील नितिन मुकेश का अभिनय चौंकाने वाला है। अपने अभिनय से वो संजय गांधी के किरदार को जीवंत करने में वो काफ़ी हद तक सफल रहे हैं। अनुपम खेर का कम भूमिका वाला किरदार फ़िल्म को एक तरह से कमज़ोर बनाता है।

कुल मिलाकर इन्दु सरकार इमेरजेंसी के दौरान घट रही तमाम कहानियों में से एक औरत की कहानी का सारांश है जो अंत तक अपने वजूद तक फुँच जाती है। इस फ़िल्म को इमेरजेंसी के दौरान बनी एक पोलिटिकल फ़िल्म समझकर देखना दर्शकों के लिए भूल होगी। फ़िल्म में इमेरजेंसी की सच्चाई से ज़्यादा नाटकीयता को ज़्यादा अहमियत दी गयी है। यह बताना कठिन है की निर्देशक ने ऐसा जानबुझ कर किया या उसे किसी मजबूरी वश करना पड़ा। यह फ़िल्म इस बात की ओर भी इशारा करती है की देश की सत्ता पर क़ाबिज़ शक्तिशाली शक्तियों की नुक्ताचीनी करने वाली फ़िल्मे बनाना अब भी बॉलीवुड के लिए मुश्किल काम है। हालाँकि इन्दु सरकार के माध्यम से मधुर भंडारकर की ये कोशिश आने वाले समय में निर्देशकों के लिए प्रेरणा का काम ज़रूर करेगी।

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